दलित राजनीति में कोई नहीं कर सका मायावती का सामना

दलित राजनीति में कोई नहीं कर सका मायावती का सामनामायावती (प्रतीकात्मक फोटो)

लखनऊ। दो जून 1995 को राजधानी के मीराबाई मार्ग स्थित स्टेट गेस्ट हाउस में जो मायावती समाजवादी पार्टी के कुछ नेताओं से घिरी हुई थीं, उस घटना के बाद राज्य की सियासत में सबसे बड़ी दलित नेता बन कर उभरी हैं। मायावती के अकेले दम पर बसपा ने राज्य में 25 से 30 फीसदी वोटों पर हमेशा कब्जा जमाये रखा। कुल 31 फीसदी दलित वोट का अधिकांश हिस्सा मायावती को मिलता रहा है। जिसमें लगभग 23 फीसदी जाटव बिरादरी मायावती को छोड़ कर कहीं भी नहीं जाती है। इसलिए प्रदेश में 80 से 100 सीटों पर तो माया अपने ही इन्हीं वोटों के दम पर मजबूत हैं, बाकी उनको सहारा अपने 100 मुस्लिम और 25 के करीब ब्राह्मण को दिये गये टिकटों पर भी है। जिससे वे प्रदेश की सत्ता में बसपा के पूर्ण बहुमत का समीकरण बना रही हैं।

25 साल से माया का एकाधिकार

प्रदेश में पिछले करीब 25 साल से दलित राजनीति में मायावती का सामना कोई भी नेता कर सका। अनेक बार मायावती से टूट कर अलग हुए नेताओं ने अपने दम से कुछ करने की कोशिश की, मगर माया दलितों की देवी की तरह हमेशा शिखर पर बनी रहीं। माया से दीनानाथ भास्कर, बरखूराम वर्मा, आरके चौधरी सहित कई नेता पूर्व में अलग हुए। जबकि इस बार स्वामी प्रसाद मौर्य, आरके चौधरी के अलावा अयोध्या पाल छोड़ गए हैं। इसके बावजूद बसपा के खुद के वोटों पर कोई असर ये सारे मिल कर डाल पाएंगे, इसको लेकर बड़ा शक बना हुआ है।

लोकसभा में सीटें शून्य मगर वोट नहीं घटे

लोकसभा चुनाव में बसपा को बुरी हार का सामना करना पड़ा था। उसको एक भी सीट पर कामयाबी नहीं मिली थी। इसके बावजूद बसपा ने 30 फीसदी के लगभग वोट पाये थे। उसका वोट बहुत अधिक नहीं कटा था। दलितों के बीच में मायावती के समीकरणों को कमजोर कर पाने वाला नेता अब तक यूपी में नहीं आ सका। 31 फीसदी दलित वोटों में से माया का कम से कम 23 से 24 फीसदी वोटों पर हमेशा कब्जा रहा। ये वोट उनको हर हाल में 80 से 100 सीटें जिताने की क्षमता रखते हैं। ऐसे में मुसलमानों और सर्वणों का पांच से छह फीसदी का बसपा की ओर रुझान उनको पूर्ण बहुमत तक ले जा सकता है।

कांशीराम ने दिया पद, भाजपा ने किया मजबूत

मायावती को सबसे पहले बसपा संस्थापक कांशीराम ने मुख्यमंत्री पद दिलवाया था। सपा के साथ हुए गठबंधन के दौरान कांशीराम ने माया को मुख्यमंत्री का पद दिलवाया था। उस समय कांशीराम बीमार थे। जबकि माया जब मुख्यमंत्री बनी और हटीं, उसके बाद में भाजपा ने उनको दोबारा समर्थन देकर सीएम बनवाया था। तब कलराज मिश्र और लालजी टंडन समर्थन के अगुआ बने। इसके बाद दो बार माया की सरकार भाजपा के सहयोग से बनी। माया फिर जीत का मंतर सीखीं और सतीश मिश्र व बृजेश पाठक की मदद से सोशल इंजीनियरिंग का जोर चला। सवर्णों का वोट माया को मिला तो उन्होंने 207 सीटें जीत कर 2007 में 1991 के बाद पहली बार पूर्ण बहुमत की सरकार बना ली थी।

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