यूपी चुनाव में कहां खड़ी हैं मुस्लिम पार्टियां  

Ashwani NigamAshwani Nigam   18 Oct 2016 7:00 PM GMT

यूपी चुनाव में कहां खड़ी हैं मुस्लिम पार्टियां  प्रतीकात्मक फोटो

लखनऊ। उत्तर प्रदेश में चुनावी बिगुल बजने के पहले ही राजनीतिक पार्टियां मैदान में कूद पड़ी हैं। सियासी समीकरण को साधने के लिए क्षेत्र, धर्म और जाति का कार्ड भी चलना शुरू हो गया है। ऐसे में राज्य के मुसलिम वोटों को अपने पक्ष में करने के लिए राज्य में सत्तारूढ़ सपा से लेकर कांग्रेस और बसपा में घमासान मचा है। सभी अपने को एक-दूसरे से ज्यादा मुसलिम हितैषी साबित करने में जुट गई हैं। इन सबके बीच मुसलमानों की हिमायत करने वाली मुसलिम पार्टियां भी अपनी खोल से बाहर निकल गई हैं।

अजीत सिंह से बढ़ी तौकीर रजा की नजदीकी

विधानसभा चुनाव की घोषणा भले ही नहीं हुई है, लेकिन रैली से लेकर नए-नए गठबंधन और चुनावी साथी की ढूढ़ने में मुसलिम पार्टियां आगे आ गई हैं। बरेलवी पंथ के मुसलमानों के बीच बड़ी दखल रखने वाली इत्तेहाद-ए-मिल्लत काउंसिल के राष्ट्रीय अध्यक्ष मोलाना तोकीर रजा जहां राष्ट्रीय लोकदल के अध्यक्ष अजीत सिंह के साथ गलबहियां करते नजर आ रहे हैं, वहीं दूसरी मुसलिम पार्टियां इस बार एक मंच पर आकर चुनाव लड़ने की वकालत कर रही हैं।

एक मोर्चा बनाकर चुनाव लड़ने का किया था ऐलान

पिछले दिनों राजधानी लखनऊ में 10 छोटी मुसलिम पार्टियों ने एक मार्चा बनाकर चुनाव लड़ने का ऐलान भी किया। इत्तेहाद फ्रंट के अध्यक्ष मोहम्मद सुलेमान की पहल पर आयोजित हुई इस सभा में उलेमा काउंसिल, इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग, मुस्लिम मजिलस, मुस्लिम लीग, इंडियन नेशनल लीग, वेलफेयर पार्टी आफ इंडिया, सोशल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ इंडिया, परचम पार्टी और मुस्लिम सियासी बेदारी फोरम के नेता भाग लिए। लेकिन इन पार्टियों के सामने सबसे बड़ा संकट यह है कि इनका मुस्लिम समाज में आधार भले ही है, लेकिन बात चुनाव की जब आती है तो मुसलमान इनको वोट नहीं देते हैं।

पिछले विधानसभा चुनाव में देखने को मिली झलक

इसकी बानगी साल 2012 के विधानसभा चुनाव में भी देखने को मिली। जब इत्तेहाद मिल्लत काउंसिल को मात्र एक सीट मिली, जबकि कुछ साल पहले की अस्तित्व में आई डा अयूब की पीस पार्टी को चार सीटें मिली। बाकी मुस्लिम पार्टियों का खाता तक नहीं खुला। इसके पहले साल 2007 के विधानसभा चुनाव में यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट के बैनर तले मुसलिम पार्टियां चुनाव लड़ी, लेकिन उनको एक सीट ही मिली थी। यह हाल तब है जब प्रदेश की 18 प्रतिशत आबादी मुस्लिम की है और 403 सीटों में से 124 सीटों पर मुस्लिम वोट निर्णायक हैं। यह बताता है कि मुस्लिम पार्टियों का मुसलमानों के बीच कोई बड़ा जनाधार नहीं है।

पार्टियों ने चला दांव

उत्तर प्रदेश में सुन्नियों के देवबंदी और बरेलवी मसलक के धर्मगुरुओं से लेकर शिया मुसलमानों में मुस्लिम नामधारी पार्टियों को लेकर एक आम राय नही हैं। देवबंदी मुसलमानों के सबसे बड़े संगठन जमीअत उलेमा हिंद का झुकाव जहां कांग्रेस की तरफ रहता है, वहीं बरेलवी मसलक का सपा और बसपा के बीच वोट बंटता है। विधानसभा चुनाव में मुसलमान वोटों को अपने पाले में करने के लिए जहां बहुजन समाज पार्टी ने 100 सीटों पर मुस्लिम उम्मीदवारों को ऐलान कर दिया है, वहीं समाजवादी पार्टी ने सरकार से लेकर संगठन में मुसलमानों को बड़ी हिस्सेदारी देकर अपना दांव चल दिया है।

लोग गंभीरता से नहीं लेते

मुस्लिम पार्टियों के इस हालात पर देश के जानेमाने पत्रकार जावेद नकवी कहते है कि यूपी में मुसलमान के नाम पर पार्टी बनाकर राजनीतिक करने वाले मुस्लिम नेताओं को चुनाव के समय लोग गंभीरता से नहीं लेते हैं। देश में अगर मुस्लिमों की पार्टियों के सफलता पर बात की जाए तो करेल में इंडियन यूनियन मुसलिम लीग और असम में बदरुद्दीन अजमल की पार्टी आल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट ने ही कुछ सीमित सफलता पाई है। इसी साल हुए असम विधानसभा चुनाव में एआईयूडीएफ को 13 सीटें मिली हैं, जबकि 2011 में उसे 18 सीटें मिली थी यानि उसकी लोकप्रियता में भी भारी गिरावट है। वहीं केरल में इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग का भी जनाधार घट रहा है।

पार्टी बनाने के खिलाफ बड़ा तबका

मुस्लिम समाज का एक बड़ा तबका मुसलमानों के नाम पर पार्टी बनाने के खिलाफ है। मुस्लिम धर्मगुरु मौलाना हबीब हैदर कहते हैं कि देश में अल्पंख्यक लोग अपने धर्म की पार्टी बनाएंगे तो बहुसंख्यक आबादी भी उनके खिलाफ बना सकते हैं। ये धर्म के नाम पर बांटने की सियासत होगी। जब-जब ऐसा हुआ है, या होगा, तो सांप्रदायिक ताकतें ताकतवर होंगी। धर्म पर और जाति पर जमा होना न मुल्क के फायदे में है और न ही उस समुदाय के फायदे में है। ऐसे में यूपी में आगामी विधानसभा चुनाव में मुसलिम पार्टियों की डगर बहुत कठिन दिख रही है।

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