यूपी चुनाव : विरासत संभालने के लिए चुनावी मैदान में नई पीढ़ी

यूपी चुनाव : विरासत संभालने के लिए चुनावी मैदान में नई पीढ़ीअब्बास अंसारी मऊ के घोंसी विधानसभा से और अदिति सिंह रायबरेली के सदर सीट से इस बार चुनाव लड़ रही हैं

लखनऊ (आईएएनएस)। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कई पुराने धुरंधर नेताओं व बाहुबलियों की विरासत संभालने के लिए उनकी अगली पीढ़ी इस बार चुनावी मैदान में उतर आई है।

उत्तर प्रदेश के बाहुबली विधायक मुख्तार अंसारी का नाम अनजाना नहीं है। वह खुद तो मऊ सदर से चुनाव लड़ रहे हैं, साथ ही इस बार वह अपने बेटे अब्बास अंसारी को भी टिकट दिलाने में कामयाब हो गए हैं। अब्बास घोंसी विधानसभा से चुनाव मैदान में हैं।

मुख्तार अंसारी पर कई गम्भीर मामले दर्ज हैं। उन पर गाजीपुर जिले की मोहम्मदाबाद सीट से भाजपा विधायक कृष्णानंद राय की हत्या का आरोप भी है। हालांकि इस मामले की सुनवाई अभी अदालत में चल रही है।

खेल और राजनीति दो अलग-अलग चीजें हैं। मुझे राजनीति के साथ ही शूटिंग का भी शौक है। राजनीति के साथ ही इस शौक को आगे बढ़ाऊंगा और देश का नाम रोशन करूंगा।
अब्बास अंसारी, सपा प्रत्याशी, घोंसी विधानसभा

अब्बास अंसारी की छवि अपने पिता के विपरीत है। अब्बास नेशनल शूटिंग चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीत चुके हैं। अब्बास कहते हैं, ‘खेल और राजनीति दो अलग-अलग चीजें हैं। मुझे राजनीति के साथ ही शूटिंग का भी शौक है। राजनीति के साथ ही इस शौक को आगे बढ़ाऊंगा और देश का नाम रोशन करूंगा।’

बिजली, पानी, सड़क और सामाजिक व्यवस्था मेरे चुनावी मुद्दे हैं। मेरे पिताजी ने लंबे समय तक जनता के बीच काम किया है। अब उनके ही काम को आगे बढ़ाने के लिए मैं क्षेत्र में हूं।
अदिति सिंह, कांग्रेस प्रत्याशी, रायबरेली सदर सीट

प्रियंका से प्रभावित होकर राजनीति में आई हैं अदिति

यूपी की चर्चित रायबरेली सदर सीट पर कांग्रेस के अखिलेश सिंह का हमेशा सिक्का चलता है। वह यहां से जब भी चुनाव लड़े, उन्हें जीत मिली। वह इस सीट से निर्दलीय भी जीत चुके हैं। इस बार वह इस सीट से अपनी बेटी अदिति सिंह को कांग्रेस का टिकट दिलाने में कामयाब हो गए हैं। हालांकि उनकी बेटी काफी पढ़ी-लिखी हैं। उन्होंने अमेरिका से एमबीए किया है। अदिति ने कहा कि वह प्रियंका वाड्रा से प्रभावित होकर राजनीति में आई हैं। अदिति कहती हैं, ‘बिजली, पानी, सड़क और सामाजिक व्यवस्था मेरे चुनावी मुद्दे हैं। मेरे पिताजी ने लंबे समय तक जनता के बीच काम किया है। अब उनके ही काम को आगे बढ़ाने के लिए मैं क्षेत्र में हूं।’

अदिति से यह पूछे जाने पर कि आपके पिता रायबरेली सदर सीट से 25 वर्षों से विधायक हैं और इस इलाके में उनकी छवि बाहुबली की है। उन्होंने कहा, ‘नहीं मेरे पिता की छवि बाहुबली की नहीं है। वह लोकप्रिय हैं, इसीलिए 25 वर्षों से विधायक हैं। उन्होंने बहुत अच्छे काम किए हैं।’

आपराधिक मामलों वाले नेता के बेटे उतर रहे राजनीति में

भाजपा सांसद ब्रजभूषण शरण सिंह के बेटे प्रतीक भूषण सिंह को भी इस बार टिकट मिला है। वह गोंडा सदर सीट से चुनाव लड़ रहे हैं। ब्रजभूषण शरण सिंह पर हालांकि कई आपराधिक मुकदमे दर्ज हैं। इस बार वह अपने बेटे का राजनीति में प्रवेश करा रहे हैं। प्रतीक ऑस्ट्रेलिया के डियाकिन विश्वविद्यालय से प्रबंधन की डिग्री हासिल कर चुके हैं। पूर्वाचल के बाहुबलियों में शुमार पूर्व सांसद उमाकांत यादव के बेटे दिनेश कांत यादव इस बार राष्ट्रीय लोकदल से शाहगंज विधानसभा सीट से चुनाव लड़ रहे हैं। उमाकांत पर भी कई गम्भीर मुकदमे हैं। यह पहला मौका है, जब उनका बेटा चुनाव लड़ रहा है।

आजमगढ़ की फूलपुर सीट से अरुण यादव प्रत्याशी

पूर्व बाहुबली सांसद रमाकांत यादव के बेटे अरुण यादव इस बार भाजपा प्रत्याशी के तौर पर चुनाव मैदान में हैं। लोकसभा चुनाव में रमाकांत यादव ने सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव के खिलाफ चुनाव लड़ा था। आजमगढ़ से वह 63 हजार मतों से चुनाव हार गए थे। भाजपा ने उनके बेटे अरुण को इस बार आजमगढ़ की फूलपुर सीट से प्रत्याशी बनाया है। अपने बेटे को जिताने के लिए रमाकांत पूरा जोर लगा रहे हैं।

अरुण यादव ने कहा, ‘मीडिया ने मेरे पिता की गलत छवि बना दी है। उन्होंने हमेशा ही काम के बल पर अपनी साख कायम की है। यहां समाज का हर वर्ग उनका सम्मान करता है। आज के बदलते परिवेश में यदि आप जनता की उम्मीदों पर खरा नही उतरेंगे तो लम्बे समय तक सियासी पिच पर टिक नहीं पाएंगे।’

यादव ने कहा कि इस बार जनता अखिलेश यादव को करारा जवाब देगी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नीतियों और साहसिक फैसलों की वजह से उप्र में भाजपा की पूर्ण बहुमत की सरकार बनने जा रही है।

अपनी सियासत बचाने के लिए युवा पीढ़ी के सहारे नेता

राजनीतिक विश्लेषक, वरिष्ठ पत्रकार, विजय शंकर पंकज के अनुसार, ‘बाहुबलियों की युवा पीढ़ी के मैदान में आने के दो कारण हैं।’ उन्होंने कहा, ‘पहला यह कि वे अपने पिता की राजनीतिक विरासत को आगे ले जाएंगे लेकिन दूसरी दिलचस्प बात यह है कि इन बाहुबलियों के खिलाफ आपराधिक मुकदमे भी हैं। उन्हें डर है कि कहीं इन मुकदमों में उन्हें जेल भी जाना पड़े तो कम से कम समय रहते अपनों के हाथ में सियासत की बागडोर पहुंच जाए।’

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