चुनावी वक्त में फिर “तलाक, तलाक, तलाक” का सवाल     

Rishi MishraRishi Mishra   6 Feb 2017 7:38 PM GMT

चुनावी वक्त में फिर “तलाक, तलाक, तलाक” का सवाल      पारंपरिक वेशभूषा में मुस्लिम महिलाएं। फोटो साभार इंटरनेट।

लखनऊ तीन तलाक का संवेदनशील मुद्दा ठीक चुनाव से पहले उठने से मुसलमानों की सियासत में एक बार फिर से हचलच बढ़ गई है। चुनाव के वक्त तीन तलाक के मसले को उठा कर भाजपा मुसलमानों के वोट पर पहली बार निशाना साध रही है। बीजेपी शिया मुसलमानों का एक बड़ा वर्ग और सुन्नी महिलाओं में तीन तलाक को लेकर भाजपा के रुख का समर्थन है। ऐसे में चुनावी वक्त में इस मुद्दे को हवा देकर बीजेपी मुस्लिमों का दो फीसदी तक वोट हथियाने की फिराक में लगी हुई है। मगर विपक्षी दल इस मामले में भाजपा को घेरने में लग गए हैं।

देश में हर साल में कम से कम एक लाख मुस्लिम महिलाओं के साथ ऐसा होता है। 2011 की जनगणना के हिसाब से मुसलमानों की संख्या भारत में लगभग 20 करोड़ है, जो अब तक बढ़ कर लगभग 23 करोड़ तक पहुंच चुकी है। तीन तलाक अब देश भर में एक बड़ा सवाल बन गया है। सुप्रीम कोर्ट में चल रहे सायरा बानो केस के मामले में मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने स्पष्ट कर दिया है कि इस मामले में कोई भी कानूनी बदलाव बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। मगर दूसरी लखनऊ में बृहस्पतिवार को एक बड़े बदलाव के तहत तीन तलाक को शिया पर्सनल लॉ बोर्ड की ओर से गैर वाजिब करार दे दिया गया। आल इंडिया शिया पर्सनल लॉ बोर्ड सुप्रीम कोर्ट में चल रहे सायरा बानो केस में तीन तलाक के खुल कर विरोध में आ गया है। देश के करीब चार करोड़ शियाओं के प्रतिनिधित्व का दावा करने वाली संस्था की ओर से स्पष्ट कहा गया कि तीन तलाक वाजिब नहीं है। ये उसी तरह की सामाजिक बुराई है, जैसे सती प्रथा थी। इसलिए सुप्रीम कोर्ट के समक्ष शिया समुदाय की ओर से याचिका दायर की जाएगी कि अदालत अपनी राय इस रखे और सभी को ये मंजूर हो। भाजपा के वरिष्ठ नेता और केंद्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने रविवार को हुई प्रेस वार्ता में इस संबंध में एक सवाल के जवाब में केंद्र सरकार की राय रखी थी। उन्होंने कहा कि, “केंद्र सरकार चुनाव के बाद इस संबंध में बड़ा फैसला लेगी। तीन तलाक मुस्लिम महिलाओं के लिए न्यायसंगत नहीं है।”

भारत में उठ रहीं हैं तीन तलाक के खिलाफ आवाजें

भारत में एक साथ तीन तलाक की व्यवस्था को खत्म करने की आवाज तेज होने लगी है। इस व्यवस्था को खत्म करने के लिए एक ऑनलाइन याचिका पर करीब 50,000 मुस्लिम महिलाओं ने हस्ताक्षर किए हैं। मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों की पैरवी करने वाले संगठन भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन (बीएमएमए) ने इस मामले में राष्ट्रीय महिला आयोग का सहयोग मांगा है। बीएमएमए ने महिला आयोग की अध्यक्ष ललिता कुमारमंगलम को लिखे पत्र में कहा कि उसने अपने अभियान के पक्ष में 50,000 से अधिक हस्ताक्षर लिए हैं और सहयोग के लिए अलग-अलग प्रांतों के महिला आयोगों को भी लिख रहा हैं। संगठन ने पत्र में कहा, 'हमने यह पाया है कि महिलाएं मौखिक-एकतरफा तलाक की व्यवस्था पर पाबंदी चाहती हैं। 'सीकिंग जस्टिस विदिन फैमिली' नामक हमारे अध्ययन में पाया गया कि 92 फीसदी मुस्लिम महिलाएं तलाक की इस व्यवस्था पर पाबंदी चाहती हैं।' वहीं राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष ललिता कुमारमंगलम ने कहा कि आयोग सुप्रीम कोर्ट में शायरा बानो के मुकदमे का समर्थन करेगा। देहरादून की रहने वाली शायरा ने 'तीन बार तलाक' के चलन को खत्म करने की सुप्रीम कोर्ट में गुहार लगाई है। कुमारमंगलम ने कहा, 'राष्ट्रीय महिला आयोग पहले से ही इस मुकदमे का हिस्सा है। हम इस महीने सुप्रीम कोर्ट में अपना जवाब दाखिल करेंगे। हम इस मांग का 200 फीसदी समर्थन करते हैं। जो भी बन पड़ेगा, हम करेंगे।' वह बीएमएमए की मांग पर प्रतिक्रिया जाहिर कर रही थीं। बीएमएमए का कहना है कि 'तीन बार तलाक' की यह प्रथा 'गैर-कुरानी' है।सुप्रीम कोर्ट हाल ही में 35 साल की सायरा की उस याचिका पर सुनवाई के लिए तैयार हुआ है, जिसमें मुस्लिम पर्सनल कानून में मौखिक तौर पर और एकतरफा तरीके से तलाक की प्रथा खत्म करने की मांग की गई है।

मगर पर्सनल लॉ बोर्ड को नहीं तीन तलाक से गुरेज

जहां एक ओर लखनऊ में मरहूम मौलाना अतहर के बनाए हुए शिया पर्सनल लॉ बोर्ड का ये मानना है, वहीं तीन तलाक के मामले में ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल किया है। हलफनामे में बोर्ड ने कहा कि पर्सनल लॉ को सामाजिक सुधार के नाम पर दोबारा से नहीं लिखा जा सकता। तलाक की वैधता सुप्रीम कोर्ट तय नहीं कर सकता है। पहले कई मामलों में सुप्रीम कोर्ट ये मामला तय कर चुका है। मुस्लिम पर्सनल लॉ कोई कानून नहीं है जिसे चुनौती दी जा सके, बल्कि ये कुरान से लिया गया है। ये इस्लाम धर्म से संबंधित सांस्कृतिक मुद्दा है। बोर्ड ने हलफनामा में कहा, तलाक, शादी और देखरेख अलग-अलग धर्म में अलग-अलग हैं। एक धर्म के अधिकार को लेकर कोर्ट फैसला नहीं दे सकता है। कुरान के मुताबिक तलाक अवांछनीय है लेकिन जरूरत पड़ने पर दिया जा सकता है। इस्लाम में ये पॉलिसी है कि अगर दंपती के बीच में संबंध खराब हो चुके हैं तो शादी को खत्म कर दिया जाए। तीन तलाक को इजाजत है क्योंकि पति सही से निर्णय ले सकता है, वो जल्दबाजी में फैसला नहीं लेते। तीन तलाक तभी इस्तेमाल किया जाता है जब वैलिड ग्राउंड हो।

“तीन तलाक हमारे लिए चुनावी मुद्दा नहीं है।इस संबंध में जब रविशंकर प्रसाद से सवाल पूछा गया तब उन्होंने कहा कि, “केंद्र सरकार का स्पष्ट रुख है तीन तलाक गलत है। इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट में केंद्र अपना पक्ष पहले ही रख चुका है। हम चुनाव के बाद इस संबंध में एक बड़ा फैसला लेंगे।”ये ही सरकार हमेशा से रुख रहा है। यही भाजपा का रुख है।”शलभमणि त्रिपाठी, प्रदेश प्रवक्ता, भाजपा

“हम तीन तलाक को पूरी तरह से गैर वाजिब मानते हैं। जिस तरह से सती प्रथा को कानून बना कर खत्म किया गया था, ठीक उसी तरह से तीन तलाक को लेकर कानून बना कर महिलाओं के सम्मान की रक्षा होनी चाहिये।” मौलाना यासूब अब्बास, प्रवक्ता,आल इंडिया शिया पर्सनल लॉ बोर्ड

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