किन्नर बोले- समाज में बराबरी का हक चाहिए भीख नहीं

किन्नर बोले- समाज में बराबरी का हक चाहिए भीख नहींचुनाव आयोग की चौथी सूची के अनुसार 1,032 थर्ड जेन्डर मतदाता बढ़े। 

लखनऊ। विधानसभा चुनाव होने वाले हैं, लेकिन जिस एक बात की अब तक चर्चा नहीं हुई वो है इस चुनाव में किन्नरों की भूमिका और उनकी सरकार से क्या मांगे हैं। जहां एक ओर सभी दल लोगों के बीच जाकर लोकलुभावन वादे कर वोट मांग रहे हैं वहीं दूसरी ओर कोई भी दल किन्नरों की बात नहीं कर रहा है।

हमको लगता है सभी किन्नरों को वोट देना चाहिए मगर अभी तक किसी भी दल का प्रत्याशी हमारे पास वोट के लिए नहीं आया है। समाज में हमें बराबरी का हक चाहिए। सरकार से हम भीख नहीं मांग रहे हैं।
कजरी (30 वर्ष) , किन्नर, लखनऊ

कजरी (30 वर्ष) बताती हैं, "हमको लगता है सभी किन्नरों को वोट देना चाहिए मगर अभी तक किसी भी दल का प्रत्याशी हमारे पास वोट के लिए नहीं आया है। समाज में हमें बराबरी का हक चाहिए। सरकार से हम भीख नहीं मांग रहे हैं।”

काजल (24 वर्ष) बताती हैं, "हमने ऐसी कोई पढ़ाई-लिखाई नहीं की, जिससे हमें काई अच्छी नौकरी मिले। इस चुनाव में हम चाहते हैं कि सरकार हमको मौका दे हम भी कुछ करना चाहते हैं। हमारी भी कुछ आवश्यकताएं हैं। हमें इज्जत की रोटी खाना अच्छा लगता है। जहां जाते हैं वहां गालियां ही मिलती हैं।"

वोट सबको देना चाहिए। वोट देंगे तभी सरकार से अपनी बात कहेंगे। 2019 में लोकसभा का चुनाव हम लड़ेंगे और मेरे मुद्दे गरीब लोगों के कल्याण और पागल औरतों पर हो रहे अन्याय, शराब बन्दी रहेंगे। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि बुनियादी सुविधाओं से साथ ही किन्नरों को अल्पसंख्यक के रूप में रोज़गार और शिक्षा में दिया जाने वाला आरक्षण दिया जाए।”
पायल सिंह, पायल फाउंडेशन की अध्यक्ष

उत्तर प्रदेश में किन्नरों की संख्या 6,983 है। चुनाव आयोग की चौथी सूची के अनुसार इस बार 1,032 थर्ड जेंडर मतदाता बढ़े हैं। बहुत से थर्ड जेंडर ऐसे हैं, जिनके पहचान पत्र नहीं बने हैं। देश में तक़रीबन 20 लाख किन्नर हैं।

मोहिनी सिंह (28 वर्ष) कहती हैं, "बड़े शहरों में किन्नरों का जीवन तुलनात्मक रूप से आसान होता है, लेकिन छोटे शहरों में हमारी समस्याएं काफ़ी अलग हैं। जब तक हम जवान हैं तब कोई दिक्कत नहीं होती लेकिन कुछ समय बाद शरीर साथ नहीं देगा तब सरकार हमको पेंशन देनी चाहिए।" कानपुर से आई किन्नर सुमन सिंह कहती हैं, “हम वोट देने के ख़िलाफ़ नहीं हैं लेकिन उन्हें किसी राजनीतिक दल में कोई भरोसा नहीं है, ये सरकार ने जब इतने वर्षों में हमारे लिए कुछ नहीं कर पाई तो आगे क्या करेगी? मुझे नहीं लगता है कि वो कभी हमारे बारे में सोचेंगे।”

कोमला कानपुर देहात शिवली गाँव की रहने वाली कोमल बताती हैं, "गाँवों और छोटे कस्बों में लोग आज भी हमें ब्याह-शादी में पैसे के लिए नाचने-गाने वाला समझते हैं। यहां के लोग हमें वेश्यावृत्ति करने वाला भी मानते हैं। सरकार को हम वोट देते हैं पर बदले में सरकार क्या देती है। इसलिए मुझे वोट देने का कोई उत्साह नहीं, चुनाव बड़े शहरों के लिए एक अच्छी सी चीज़ है। क्या कोई सोचता है कि हम गाँवों में अपनी जीविका कैसे चलाएंगे।"

मुरादाबाद की रहने वाली कशिश (33 वर्ष) बताती हैं, हम भी मनुष्य हैं, हम भी इस समाज के सदस्य हैं।" अब सुप्रीम कोर्ट ने भी हमें पहचान दी है, सुप्रीम कोर्ट ने किन्नरों को तीसरे जेंडर के रूप में मान्यता दी।" वहीं मौजूद रोनक कहती हैं, “वो स्कूल नहीं जा सकीं क्योंकि पुराने लोगों को लगता है कि किन्नरों का काम केवल नाचना-गाना है, पढ़ना नहीं। वे चाहती हैं कि सरकार किन्नर की पढ़ाई के लिए कोई विशेष योजना बनाए। इस चुनाव में हम वोट जरूर देंगे।”

देश में तक़रीबन 20 लाख किन्नर हैं, सरकार किन्नरों के लिए अलग से एक बजट बनाए। सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का पालन हो। थर्ड जेंडर को मुख्यधारा से जोड़ने पर जोर दिया जाए। जो किन्नर जैसा जीवन जीना चाहता हो उसके लिए वैसी व्यवस्था हो। जो किन्नर पढ़ाई-लिखाई व रोजगार करना चाहते हैं।
लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी, महामंडलेश्वर, किन्नर अखाड़ा

सुप्रीम कोर्ट ने किन्नरों को अल्पसंख्यक का दर्जा

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला लिया, जिसके अर्न्तगत किन्नरों को 'तीसरे लिंग' के रूप में मान्यता देने के लिए कहा है। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि किन्नरों को अल्पसंख्यकों की मान्यता दी जाए।

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