मुलायम के उदय ने कांग्रेस को किया अस्त

मुलायम के उदय ने कांग्रेस को किया अस्तप्रतीकात्मक फोटो

लखनऊ। उत्तर प्रदेश में 27 साल बाद वापसी की राह देख रही कांग्रेस के सामने एक बार फिर मुलायम सिंह यादव ही सबसे बड़ी चुनौती हैं। प्रदेश की राजनीति में मुलायम सिंह का कद एक तरफ जहां तेजी से बढ़ता गया तो दूसरी ओर कांग्रेस हाशिए पर जाती रही। कांग्रेस के पुराने नेता भी स्वीकार करते हैं कि कांग्रेस ने शुरूआत में मुलायम सिंह यादव को गंभीरता से नहीं लिया। जिसका नतीजा है कि सरकार बनाना तो दूर पिछले 25 साल से कांग्रेस 50 का आंकड़ा नहीं छू पा रही है।

यूपी में बोलती थी कांग्रेस की तूती

अतीत में देखें तो अस्सी के दशक में यूपी में कांग्रेस की तूती बोलती थी। 1980 में हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में प्रदेश की 425 सीटों में से 309 सीटों पर कांग्रेस ने विजय का पताका फहराया था। लेकिन पांच साल बीतते-बीतते कांग्रेस की लोकप्रियता में कमी आना शुरू हुआ और साल 1985 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को 269 सीटें मिली और पार्टी को 40 सीटों का नुकसान हुआ। उसी चुनाव के समय से कांग्रेस पार्टी का मुसलिम और अति पिछड़ा वोट सोशलिस्ट ओर पिछड़ों की वकालत करने वाली पार्टियों के पास खिसकना शुरू हो गया। लेकिन यूपी कांग्रेस के नेताओं ने इस पर ध्यान देना उचित नहीं समझा।

तब तेजी से उभर रहे थे मुलायम सिंह

बीबीसी से लंबे समय तक जुड़े रहे वरिष्ठ पत्रकार रामदत्त त्रिपाठी का कहना है कि ये वही साल थे, जब यूपी की राजनीति में मुलायम सिंह तेजी से उभर रहे थे। इसके बाद साल 1989 का वह समय भी आया, जिसने कांग्रेस को अर्श से फर्श तक पहुंचा दिया। साल 1989 के विधानसभा चुनाव में 269 सीटों से कांग्रेस 94 सीटों पर आ गई। कांग्रेस के मुख्यमंत्री रहे नारायण दत्त तिवारी कांग्रेस के आखिरी मुख्यमंत्री साबित हुए। इस चुनाव में जनता दल को रिकार्ड 208 सीटें मिलीं। बीजेपी भी पचास का आंकड़ा पार करते हुए 57 तक पहुंची और बसपा भी अपनी जगह बताते हुए 13 सीटों पर पहुंची। इसी चुनाव में मुलायम सिंह यादव पहली बार राज्य के मुख्यमंत्री बने, लेकिन वह ज्यादा दिनों तक नहीं रह पाए। उनका कार्यकाल 05-12-1989 से 24-06-1991 तक रहा।

कांग्रेस नेताओं को लगा झटका

कांग्रेस को मिली इस हार से प्रदेश के कांग्रेस नेताओं को झटका तो लगा, लेकिन कांग्रेस के केन्द्रीय नेतृत्व के ठुलमुल रवैये से कोई फेरबदल नहीं हुआ। इसके बाद कांग्रेस में टूट फूट मची रही। राजीव गांधी जैसा विजनरी नेता भी कांग्रेस को मिला, लेकिन यूपी में हुए मध्यावधि चुनाव में कांग्रेस इसका लाभ नहीं ले पाई और पार्टी पचास के आंकड़े से नीचे आ गई। यह वही चुनाव था जब रामलहर पर सवार बीजेपी 221 सीटों के साथ सत्ता में आ गई और कांग्रेस 46 पर पहुंची गई।

सपा और बसपा की दोस्ती ने कांग्रेस की तोड़ी रीढ़

उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के दुर्दिन दिनों की सबसे बड़ी शुरुआत का साल तो 1993 रहा। जब दलित और पिछड़ी राजनीति के दो दिग्गज नेता बसपा के कांशीराम और सपा के मुलायम सिंह यादव ने गठबंधन करके चुनाव में गए। इस चुनाव में इस गठबंधन को 176 सीटें मिलीं, जिसमें सपा को 109 और बसपा को 67 सीट मिली। इस चुनाव में कांग्रेस 28 सीटों पर सिमट गई। मगर बसपा-सपा की दोस्ती टूटी, लेकिन इसका लाभ भी कांग्रेस नहीं ले पाई। इसके बाद साल 1996 का वह साल भी आ गया, जिसमें मुलायम सिंह प्रदेश की राजनीति के सबसे बड़े नेता के रूप में अपनी जगह बनाई। इसी साल अपने दम पर अपनी समाजवादी पार्टी खड़ी की। इस विधानसभा चुनाव में समजावादी पार्टी को जहां 110 सीटें मिली, वहीं कांग्रेस को 33 सीटें मिली। इस चुनाव में बसपा ने भी कांग्रेस के दलित वोटों पर कब्जा करके 67 सीटों को अपने नाम किया। बीजेपी इस चुनाव में भी 174 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनी।

सपा के बढ़ते ही कांग्रेस पहुंच गई 25 पर

कांग्रेस पार्टी को सबसे बड़ा झटका यूपी विधानसभा के साल 2002 के चुनाव में लगा जब पार्टी को केवल 25 सीटें मिलीं। वहीं, इस चुनाव में मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी ने 143 सीटों पर कब्जा जमाया। इस चुनाव में बसपा को 98 और बीजेपी को 88 सीटें मिली। दोनों पार्टियों ने मिलकर मायावती के नेतृत्व में सरकार बनाई, लेकिन यह सरकार ज्यादा दिनों तक नहीं चली और 29 अगस्त 2003 से लेकर 13 मई 2007 तक मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री रहे।

कांग्रेस के वोट बैंक पर बसपा का कब्जा

जिस ब्राम्हण, दलित और मुस्लिम के समीकरण पर कांग्रेस ने प्रदेश में कई दशकों तक राज किया, उसी समीकरण को बसपा प्रमुख मायावती ने साधते हुए साल 2007 के विधानसभा चुनाव में अपने दम पर पूर्ण बहुमत की सरकार बना ली और कांग्रेस पार्टी 25 सीटों से 22 सीटों पर सिमट गई। इसके बाद साल 2012 के चुनाव में सपा ने राज्य में 224 सीटों के साथ पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई। इस चुनाव में भी कांग्रेस को मात्र 28 सीटें मिली। ऐसे में जल्द ही होने जा रहे विधानसभा चुनाव में 27 साल बाद वापसी के लिए पसीना बहा रहे कांग्रेस उपाध्क्ष्य राहुल गांधी की मेहतन कितनी रंग लाती है, यह चुनाव रिजल्ट में पता चलेगा।

First Published: 2016-10-15 21:46:08.0

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