प्रदेश को सबसे ज्यादा मुख्यमंत्री देने वाले पूर्वांचल में अग्नि परीक्षा आज

प्रदेश को सबसे ज्यादा मुख्यमंत्री देने वाले पूर्वांचल में अग्नि परीक्षा आजप्रदेश को सबसे ज्यादा मुख्यमंत्री देने वाले पूर्वांचल में एक बार फिर सभी पार्टियों की निगाहें हैं।

लखनऊ। प्रदेश को सबसे ज्यादा मुख्यमंत्री देने वाले पूर्वांचल में एक बार फिर सभी पार्टियों की निगाहें हैं। पूर्वांचल के कुल 28 जिलों में से 170 विधानसभा सीटें सभी दलों के लिए काफी मायने रखती हैं। उत्तर प्रदेश की राजनीति में कहावत है कि जिसने पूर्वांचल जीता उसने लखनऊ की कुर्सी पर कब्जा जमाया। साल 2012 के विधानसभा चुनाव में पूर्वांचल में 106 सीटें जीतकर सपा ने लखनऊ की गद्दी पर पहुंचने का रास्ता साफ किया था।

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पूर्वांचल की राजनीति को पिछले कई दशक से देख रहे वरिष्ठ पत्रकार मनोज सिंह बताते हैं, "पूर्वांचल की सबसे बड़ी समस्या यहां की चीनी और काटन मिलों के बंद होने एवं परंपरागत और छोटे उद्योगों के दम तोड़ने कि वजह से रोजगार के लिए लोगों का दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों में पलायन करना है। लेकिन किसी भी सरकार ने इस पर ध्यान नहीं दिया।’’

उन्होंने कहा कि पिछले कई वर्षों से यहां की राजनीति में माफियाओं का बोलबाला हो गया है। उत्तर प्रदेश में कभी मुद्दों पर संघर्ष के लिए पहचाने जाने वाले इस क्षेत्र के नए नेता के रूप में बाहुबलियों का उदय हुआ है जिनका काम ठेकेदारी और रंगदारी है। जो राजनीतिक पार्टियों के संरक्षण में फल-फूल रहे हैं। वैचारिक राजनीति और देश को युवा तुर्क प्रधानमंत्री चंद्रशेखर और वीपी सिंह देने वाले इस क्षेत्र में अब राजनीति की पहचान फायर ब्रांड हिन्दू नेता गोरखपुर से बीजेपी सांसद महंत आदित्य नाथ और माफिया की छवि रखने वाले मुख्तार अंसारी, बृजेश सिंह, धनंजय सिंह और उनके जैसे दूसरे लोग हैं। जो सांसद और विधायक बनते रहते हैं।

विकास के पैमाने पर पिछड़ा पूर्वांचल

उत्तर प्रदेश की राजनीति में सबसे ज्यादा प्रभाव डालने के बाद भी विकास के पैमाने पर पूर्वांचल प्रदेश का सबसे पिछड़ा क्षेत्र है। पिछले कई दशक से जातीय समीकरण और सांप्रदायिक धुव्रीकरण का कार्ड पूर्वांचल में खेलकर सत्ता में आने वाली पार्टियों ने यहां के लिए कोई काम नहीं किया। यही कारण है कि शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, बिजली, पानी से लेकर कानून-व्यवस्था के मामले में प्रदेश के बाकी हिस्सों से यह काफी पिछड़ा है।

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