यूपी में कभी लंबी नहीं चल पाई गठबंधन की राजनीति

यूपी में कभी लंबी नहीं चल पाई गठबंधन की राजनीतियूपी विधानसभा। (साभार: गूगल)

लखनऊ। कांग्रेस, सपा, रालोद और अन्य छोटे दलों को मिला कर यूपी में महागठबंधन की तैयारी है। मगर इतिहास रहा है कि उत्तर प्रदेश में कभी भी गठबंधन की राजनीति बहुत लंबी नहीं चल सकी है। 1989 से ये दौर शुरू हुआ। जिसमें सपा-बसपा, भाजपा-बसपा, कांग्रेस-बसपा, रालोद-कांग्रेस जैसे अनेक गठबंधन हुए। मगर आपसी स्वार्थ के चलते कभी लंबे समय तक नहीं टिक सके। यहां तक कि लगभग हर बार ही गठबंधन की राजनीति ध्वस्त होती रही। लगभग 10 साल तक यूपी में मध्याविधि चुनाव का दौर इसी वजह से चलता रहा था, जिसका सिलसिला 2001 में रुका था।

कोई बड़ा दल ऐसा नहीं...

कांग्रेस, रालोद और सपा गठबंधन के जरिये करीब 46 फीसदी वोटों पर कब्जे की रणनीति बनाई जा रही है। पहले भी गठबंधन की राजनीति प्रदेश में तात्कालिक तौर पर तो कामयाब रही, मगर लंबे समय तक गठबंधन कभी नहीं चल पाए। कोई भी ऐसा बड़ा दल नहीं रहा जिसने कभी न कभी गठबंधन न किया हो मगर उसका नतीजा कुछ खास नहीं रहा।

तब बर्खास्त कर दी गई बीजेपी की सरकार

1989 में जब मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री बने थे, तब भाजपा का समर्थन उनके साथ था। वे संयुक्त मोर्चा से मुख्यमंत्री बने थे। इसके बाद 1990 में जब राम मंदिर आंदोलन के दौरान लालकृष्ण आडवाणी के रथ को रोका गया था, तब भाजपा ने केंद्र और राज्य सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया था। इसके बाद में 1991 की राम लहर में भाजपा की पूर्ण बहुमत की सरकार राज्य में बनी थी। मगर 1992 में जब विवादित ढांचा ध्वस्त हुआ तब कल्याण सिंह की बीजेपी की सरकार को बर्खास्त कर दिया गया था।

तब सपा समर्थकों ने घेरा था मायावती को

इसके बाद में 1993 में जब चुनाव हुए थे तब पहली बार बसपा और सपा का गठबंधन हुआ था। जिसमें छह-छह महीने के लिए सीएम बनाने का फार्मूला सामने आया। जिसमें पहली बार में मायावती मुख्यमंत्री बनीं। मगर 94 में जब मुलायम सिंह यादव के सीएम बनने का नंबर आया, तब मायावती ने उनसे समर्थन वापस ले लिया था। जिसके बाद में दो जून 1994 को वीआईपी गेस्टहाउस में मायावती को सपा के लोगों ने घेर लिया था। जहां से बीजेपी नेता ब्रह्मदत्त द्विवेदी ने उनको सुरक्षित बाहर निकाला था।

और जब कांग्रेस और बसपा के बीच गठबंधन हुआ

इसके बाद में बीजेपी के समर्थन से मायावती दोबारा मुख्यमंत्री बनी थी। यहां एक नया गठबंधन हो गया था। मगर कुछ समय बाद बसपा से 22 विधायक अलग हुए थे और तब उन विधायकों ने भाजपा को समर्थन देकर कल्याण सिंह को दोबारा सीएम बनाया गया। मगर ये गठबंधन भी लंबा नहीं चला। आखिरकार में 2001 में राजनाथ सिंह जब यूपी के मुख्यमंत्री थे, तब जब चुनाव हुए तो कांग्रेस और बसपा के बीच गठबंधन हुआ था। मगर बसपा कोई लाभ नहीं हुआ था। जबकि कांग्रेस ने चुनाव के बाद मुलायम सिंह यादव को समर्थन देकर उनकी सरकार बनवा दी। इसके बाद 2007 में और फिर 2012 में पूर्ण बहुमत की सरकारें प्रदेश में बनती रहीं। 2012 में रालोद और कांग्रेस के बीच गठबंधन हुआ था, मगर उसका कोई भी सकारात्मक परिणाम नहीं आया। दोनों दलों ने मिला कर मात्र 28 सीटें ही जीतीं।

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