बुंदेलखंड का दर्द: मुद्दे तो हैं लेकिन मुद्दों की राजनीति नहीं

बुंदेलखंड का दर्द: मुद्दे  तो हैं लेकिन मुद्दों की राजनीति नहींफोटो: विनय गुप्ता

महरौनी। विधानसभा चुनाव की सरगर्मी बढ़ गई है। सभी राजनैतिक पार्टियों के उम्मीदवार चुनावी मैदान में ताल ठोक रहे हैं और विजय पाने के लिए अलग-अलग हथकंडे अपनाने की जुगत में लग गए हैं, क्योंकि यहां पर जातिगत समीकरण हावी है। हाथ जोड़ो, पैर छुओ और चुनावी जीत लो, लेकिन जनता से जुड़े मुद्दों की बात कोई नहीं करना चाहता।

ये भी बन सकते हैं चुनावी मुद्दे

सड़क निर्माण की बात

कई वर्षों से महरौनी से नाराहट व महरौनी से सौजना के साथ-साथ छपरट से पठा तक दर्जनों मार्ग खस्ताहाल हैं। इससे जनपद के लगभग 70 गाँव प्रभावित हैं। इन सड़कों पर बरसात में चलना किसी चुनौती से कम नही है। ललितपुर से 60 किमी पूर्व उत्तर दिशा महरौनी विधानसभा छापछौल गाँव के इन्द्रजीत गौतम (28 वर्ष) बताते हैं, "एक दर्जन से अधिक खस्ताहाल सड़कें हैं, इन रास्तों पर राहगीर हमेशा चोटिल होते रहते हैं।"

नहरों का पानी टेल तक पहुंचाना

परियोजना पुरानी होने के कारण उपयोगिता कम हुई, जिस कारण नहरों का पानी टेल तक नहीं पहुंचता। हजारों किसान इससे प्रभावित हैं। समस्या पर प्रकाश डालते हुए दरौनी गाँव के अवनेश कुमार तिवारी (27 वर्ष) बताते हैं, "जामनी नहर का पानी बानपुर रजवाहा टेल तक नहीं पहुंचता, शिकायत पर अधिकारी संज्ञान नहीं लेते और नेता पैरवी को आगे नहीं आते, जिससे हजारों किसान प्रभावित हैं।"

भौरट बांध पुनरीक्षित परियोजना

परियोजना के 2008-09 की शुरुआत में आधा दर्जन से अधिक गाँवों के अन्नदाताओं की 182 हेक्टेयर भूमि अस्सी हजार से एक लाख रुपए प्रति हेक्टेयर पर अधिग्रहित की गयी। कुछ किसानों को उसी समय मुआवजा दे दिया गया, अब जबकि जमीन के दाम बढ़ गए हैं तो बचे हुए किसानों को बढ़ा हुआ मुआवजा नहीं मिल रहा। समस्या को बताते हुए भैरा गाँव के रामजी राजा (30 वर्ष) बताते हैं, "सैकड़ों किसानों ने कम रेट पर जमीन दे दी, अब बढ़ा हुआ मुआवजा अधिकारी देना नहीं चाहते। किसान बर्बादी की कगार पर हैं।"

बंडई बांध परियोजना में आदिवासियों का शोषण

जनपद के अंतिम छोर मध्यप्रदेश की सीमा के पास पूर्व दक्षिण दिशा में सकरा गाँव के सहरियों की भूमि बंडई बांध परियोजना में अधिग्रहित की गयी। निरक्षर आदिवासीयों को अधिकारियों ने अधिग्रहित जमीन का मुआवजा देने के बजाय ट्रैक्टर कम्पनी से साठगांठ कर ट्रेक्टर थमा दिए। अब आदिवासियों के पास ट्रैक्टर तो है, लेकिन जमीन नहीं। सकरा गाँव के रमेश बताते हैं, “मुआवजा पाने के लिए मजबूरन ट्रेक्टर लेना पड़ा, तब जाकर मुआवजा मिला, जिन्होंने ट्रैक्टर लेने से मना किया उन्हें मुआवजा नहीं मिला। उन्होंने आगे बताया कि रोजी-रोटी के लिए 25 किमी मड़ावरा लकड़ी बेचने जाना पड़ता है, तब जाकर शाम को चूल्हा जलता है। जमीन बची नहीं? ट्रैक्टर कहां चलाएं, पैसे भी नहीं हैं कि ट्रैक्टर का डीजल खरीद सकें।"

नीलगाय से हताश किसान

महरौनी विधानसभा क्षेत्र में सैकड़ों हेक्टेयर खेत में नीलगाय हैं, जिससे किसान परेशान हैं। फसल रखवाली के लिए किसानों को दिन-रात जागना पड़ता है, ये हालात छपरट, सौजना, कारीटोरन, नदनपुर, धोरीसागर, नाराहट, बालाबेहट, धौर्रा आदि क्षेत्रों के हैं। गगनियां गाँव के कमलेश (45 वर्ष) बताते हैं, "आसपास के ढाई सौ हेक्टेयर में नीलगाय हैं, एक दर्जन से अधिक गाँवों में लोग घर में नहीं खेतों में सोते हैं। अगर रखवाली नहीं की तो दर्जनों की संख्या में नीलगाय फसल चौपट कर देंगे। वो आगे बताते है, “रेंज की सीमा मे ऊंची तार बाउंड्री बन जाए या शासन नीलगाय को मारने की अनुमति दे दे तो कुछ हद फसल बच सकती है।"

रोजगार नहीं, पलायन बड़ी समस्या

ललितपुर जनपद में किसी सरकार ने स्थाई रोजगार बढ़ाने की कोई पहल नहीं की, पिछड़ा क्षेत्र होने के कारण यहां बेगारी के बादल मंडराते रहते हैं, जिस कारण किसानों पर सेठ साहूकारों व बैंकों का कर्जा 80 से 90 प्रतिशत है। धनीराम राजपूत (28 वर्ष) बताते हैं, "दर्जनों बांध, पावर प्लान्ट, सौर ऊर्जा प्लांट में हजारों हेक्टेयर भूमि अधिग्रहित होने से भूमिहीनों की संख्या बढ़ी है, जिस कारण पलायन यहां की बड़ी समस्या है, सरकारें अति पिछडे जनपद को स्थाई रोजगार की योजना नहीं बनाती, जिस कारण कर्ज, गरीबी, भुखमरी, जैसे हालात पैदा हो गए हैं।"

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