यूपी में सिर्फ एक बार सफल हुआ है चुनाव पूर्व गठबंधन, सपा-कांग्रेस को दोहराना होगा 1984 का इतिहास

यूपी में  सिर्फ एक बार सफल हुआ है चुनाव पूर्व गठबंधन, सपा-कांग्रेस को दोहराना होगा 1984 का इतिहासलखनऊ में रोड शो के दौरान अखिलेश यादव और राहुल गांधी।

लखनऊ। सपा कांग्रेस गठबंधन की सरकार बनी तो वह उत्तर प्रदेश की सियासत में गठबंधन राजनीति की कामयाबी का केवल दूसरा प्रमाण होगा। उप्र में चुनाव पूर्व गठबंधन की राजनीति के लिए इस बार का आम चुनाव बहुत ही चुनौतीपूर्ण है। इससे पहले साल 1994 में बसपा और सपा के बीच हुई चुनावी गठबंधन के बाद कभी चुनाव से पहले होने वाले गठबंधन कामयाब नहीं हो सके हैं। बसपा और सपा का ये गठबंधन छह महीने तक ही चला था। मगर इसको पूर्ण बहुमत मिला था। मगर इसके बाद इसको कभी नहीं दोहराया जा सका है। जबकि इनमें कांग्रेस, बसपा, कांग्रेस रालोद सहित कई अन्य छोटे बड़े गठबंधन हुए हैं।

1994 में सपा और बसपा के बीच में अद्भुत चुनावी गठबंधन हुआ था। तब तय हुआ था कि छह महीने मायावती और छह महीने मुलायम सिंह सीएम रहेंगे। विधानसभा चुनाव तब विवादित ढांचे के 1992 में ध्वंस के बाद हो रहे थे। कल्याण सिंह की सरकार को बर्खास्त किया गया था, जिसके बाद में भाजपा काफी मजबूत स्थिति में थी। तब प्रदेश में बेहतरीन गठबंधन हुआ था, जिसमें दलित, मुस्लिम, पिछड़ा वर्ग और सामान्य वर्ग के एक बड़े हिस्से ने वोट देकर भाजपा को हराया था। तब भाजपा 425 में 178 सीटों पर सिमट गई थी। जबकि सपा को 170 और बसपा को 65 सीटों के साथ पूर्ण बहुमत मिला था। पहले से तय व्यवस्था के तहत मायावती पहले मुख्यमंत्री बनीं। मगर छह महीने बीतने के बाद जब मुलायम सिंह के मुख्यमंत्री बनने का मौका आया तब मायावती ने सरकार से समर्थन वापस ले लिया था। पूर्ण बहुमत का ये गठबंधन जो बहुत आसानी से पांच साल तक जारी रह सकता था, वह छह महीने में ही टूट गया था।

इसके बाद में कभी भी यूपी में इतना बड़ा गठबंधन नहीं हुआ। इसके बाद कांग्रेस ने साल 2004 में बसपा के साथ और फिर 2012 में रालोद के साथ गठबंधन किया। इसके अलावा छोटे छोटे दलों में चुनाव के पहले गठबंधन होते रहे हैं। कोई भी कभी कामयाब नहीं रहा। आखिरकार एक बार फिर से कांग्रेस और सपा के बीच में मजबूत गठबंधन हुआ है।

कागजों पर दोनों दल एक साथ हों तो मजबूत

कांग्रेस की जीती और मजूबती से लड़ने वाली सीटों पर सपा न लड़े और सपा की सीटों पर अगर कांग्रेस न लड़े तो मुस्लिम और भाजपा विरोधी वोटों का बड़ा ध्रुवीकरण रुक जाएगा। कागजों पर 2012 के विधानसभा चुनाव के वोट प्रतिशत को देखा जाए तो सपा 29.13 और कांग्रेस ने 11.65 वोट हासिल किये थे। जिसका अर्थ है कि लगभग 41 फीसदी वोट दोनों दलों के पास था। अगर इसको बहुत कम किया जाए, तब इस चुनाव में ये 35 फीसदी तक होना संभव है। ऐसे में कांग्रेस से गठबंधन सपा के लिए काफी फलदाई होगा। जिसको लेकर हाल ही में सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव से कांग्रेस के रणनीतिकार प्रशांत किशोर मिले थे, जबकि मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने भी स्पष्ट कहा है कि वे गठबंधन के लिए तैयार हैं।

कांग्रेस से ही सपा ने छीने मुस्लिम वोट

1989 से 1992 के बीच राम मंदिर आंदोलन के दौरान कांग्रेस से उप्र के मुस्लिमों का मोह भंग हुआ था। जिसके बाद में मुसलमानों ने सपा को खुला समर्थन देना शुरू कर दिया था। मुलायम सिंह यादव तब से उनके बड़े नेता बन गए थे। 2007 के लगभग जब सपा ने कल्याण सिंह को अपने दल में शामिल कर लिया था, उससे मुसलमान बुरी तरह से नाराज हुए थे। जिसका नतीजा सपा को 2007 के विधानसभा चुनाव और 2009 के लोकसभा चुनाव में भुगतना पड़ा था। विधानसभा में सपा का मुस्लिम वोट बसपा ले गई थी। जबकि लोकसभा में ये वोट कांग्रेस को काफी मिला था। कांग्रेस ने शानदार प्रदर्शन करते हुए 21 सीटें जीती थीं। जिसके बाद में मुलायम सिंह ने अपनी रणनीति बदली और कल्याण सिंह को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाया। इसके साथ ही 2011 में उन्होंने मुसलमानों से सार्वजनिक माफी मांगी थी। मुसलमानों ने उनको माफ किया। 2012 में सपा को शानदार कामयाबी मिली।

मगर अब कांग्रेस और सपा दोनों कमजोर

अब हालात बदल रहे हैं। सरकार के विरोध और कांग्रेस की पतली हालत को देखते हुए सपा और कांग्रेस दोनों को एक दूसरे की जरूरत है। दोनों दलों के बीच 105 सीटों पर तालमेल हो गया है। जिसका सीधा असर 403 सीटों पर देखने को मिलेगा।

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