यूपी : पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के 93वें जन्मदिवस पर रिहा होंगे 93 कैदी

यूपी : पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के 93वें जन्मदिवस पर रिहा होंगे 93 कैदीपूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के 93वें जन्मदिवस पर रिहा होंगे 93 कैदी

लखनऊ। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी के आगामी 25 दिसम्बर को 93वां जन्मवोत्सव है, जिसे देखते हुए उत्तर प्रदेश सरकार ने सूबे के जेलों में बंद 135 सजायाफ्ता कैदियों में से 93वां कैदियों को रिहा किया जायेगा।

इस संबंध में सभी जेल अधिकारियों को प्रमुख सचिव कारागार अरविंद कुमार की तरफ से आदेश जारी कर दिया गया है। 24 दिसंबर को कैदियों की सूची को अंतिम रूप देकर सारी औपचारिकताएं पूरी कर प्रदेश सरकार इन्हें रिहा करने का आदेश जारी कर देगी। आदेश के मुताबिक इसमें उन बंदियों को चुना जाएगा जो कोर्ट द्वारा दी गई सजा काट चुके हैं, लेकिन जुर्माना न भर पाने के चलते जेल से रिहा नहीं हो पाये हैं। इन कैदियों का जुर्माना निजी संस्था की मदद से अदा करवाया जाएगा, जिसके बाद सजायाफ्ता कैदियों को काल कोठरी से रिहा होने का मौका मिलेगा।

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उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने पूर्व पीएम अटल बिहारी वाजपेयी के जन्मदिन पर सूबे के जेलों में बंद कई कैदियों को क्रिसमस का तोहफा दिया है। अटल बिहारी वाजेपयी का 93वां जन्मदिन होने के साथ-साथ उस दिन क्रिसमस का त्यौहार होता है। भारतीय जनता पार्टी की ओर से प्रथम प्रधानमंत्री रहे अटल बिहारी वाजपेयी का जन्मदिन जेलों में बंद कई कैदियों के लिए खुशियां लेकर आया है। वहीं दूसरी ओर पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई के जन्मदिन के अवसर पर भाजपा हर वर्ष सुशासन दिवस के रूप में मनाती आ रही है, जिसे वह इस वर्ष भी देश भर में धूमधाम से मनायेगी। इस अवसर पर भाजपा युवा मोर्चा की ओर से भी प्रदेश में कई आयोजन किए गये हैं।

कमजोर अभियोजन के चलते जेलों में जानवरों से बद्दतर जिंदगी

उत्तर प्रदेश की जेलों में क्षमता से अधिक कैदी बंद हैं, जिसमें बड़ी संख्या में फांसी सजा पाये कई कैदी भी हैं। प्रदेश की जेलों में क्षमता से अधिक भीड़ एक वजह अभियोजन की लचर व्यवस्था को भी माना जा रहा है। साथ ही न्यायिक व्यवस्था में तारीख पर तारीख और जजों की कमी से भी जेल में बंद विचारधीन कैदियों को सजा काटने को मजबूर हैं। यूपी की जेलें एक तरह से जानवरों का बाड़ा बन चुकी हैं, जहां क्षमता से अधिक कैदियों के भरे होने के कारण जेल प्रबंधन भी सुचारू रूप से व्यवस्था कर पाने में विवश है। इस संबंध में डीजी अभियोजन सुजानवीर सिंह का कहना है कि, ज्यादातर मामलों में अभियोजन पक्ष मजबूती से पैरवी करता है, जिससे किसी भी केस का फैसला जल्द आ जाये, लेकिन बीच में अवकाश या अन्य कारणों के चलते केस की तारिख आगे बढ़ जाती है।

जेल विभाग सरकार को कई दफा भेज चुका है ब्लू प्रिंट

उत्तर प्रदेश जेल विभाग की ओर से सरकार को कई बार योजनाएं भेजा जा चुका है, जिसके तहत जेलों में बंद वृद्ध कैदियों, महिला कैदियों, अच्छे आचरण वाले कैदियों और लंबे समय से जेल में बंद विचाराधीन कैदियों की रिहाई का ब्लू प्रिंट तैयार कर भेजा गया था। जेल प्रशासन इन बातों को अगर अमलीजामा पहना दिया गया होता तो आज मौजूदा समय में जेलों का बोझ कम हो सकता था।

प्रदेशों में जेलों का हाल

उत्तर प्रदेश के कारागार विभाग ने आधिकारिक तौर पर बताया था कि, सूबे के केंद्रीय कारागारों में 50 प्रतिशत अधिक कैदी रह रहे हैं। सरकारी आकड़ों की माने तो उत्तर प्रदेश के नैनी (इलाहाबाद), वाराणसी, फतेहाबाद, बरेली और आगरा के पांच केंद्रीय कारागारों में कुल 7438 पुरुष कैदी, 60 महिला कैदी और 120 अल्पवयस्क कैदियों के रखने की क्षमता है। इनमें नैनी जेल ऐसी अकेली सेंट्रल जेल है, जहां 60 महिलाओं और 120 अल्पवयस्क कैदियों के रखे जाने की व्यवस्था है। सबसे अधिक क्षमता नैनी जेल की है, जहां 2060 कैदी रखे जा सकते हैं।

इसके बाद बरेली केंद्रीय कारागार में 2053 कैदियों के रखने की व्यवस्था है। वाराणसी केंद्रीय कारागार में सबसे कम 996 कैदियों के रखने की क्षमता है। लेकिन हालत यह है कि इन पांच केंद्रीय कारागारों में 30 अप्रैल 2017 तक कुल 9353 सजायाफ्ता कैदी बंद थे, जिसमें 9290 पुरुष, 29 महिलाएं, सात अल्पवयस्क और 27 विदेशी कैदी थे। इनके साथ कुल 2117 विचाराधीन कैदी भी बंद थे, जिनमें 1921 पुरुष, 67 महिलाएं, 119 अल्पवयस्क तथा 10 अन्य कैदी बंद थे। इसके साथ ही महिला कैदियों के साथ 02 बच्चे और 01 बच्ची भी थी। यानि, इन पांच केंद्रीय कारागारों में कुल 11 हजार 470 कैदी थे, जिसमें 11 हजार 211 पुरुष, 96 महिला, 126 अल्पवयस्क, 27 विदेशी और 13 अन्य कैदी थे, जो इन कारागारों की क्षमता से 50 प्रतिशत अधिक है।

पांच केंद्रीय कारागारों, लखनऊ और बरेली के तीन विशेष कारागारों और उत्तर प्रदेश के 70 कारागारों को मिला दिया जाए, तो इन सब जेलों को मिला कर कैदियों को रखने की कुल क्षमता 58 हजार 111 है, जिसमें 51,839 पुरुष, 2,956 महिला और 3,316 अल्पवयस्क कैदियों को रखने की व्यवस्था है। इस साल 30 अप्रैल को यूपी में कुल 27,207 दोषसिद्ध कैदी थे, जिसमें 25,975 पुरुष, 1,079 महिलाएं, 83 अल्पवयस्क और 137 विदेशी कैदी थे। साथ ही महिला कैदियों के साथ 33 बच्चे और 34 बच्चियां भी थीं।

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उत्तर प्रदेश के सभी कारागारों में कुल 65,152 विचाराधीन कैदी थे, जिसमें 59,507 पुरुष, 2,706 महिलाएं, 3,001 अल्पवयस्क, 227 विदेशी और 115 अन्य कैदी शामिल थे। इसके अतिरिक्त महिला कैदियों के साथ 239 बच्चे और 165 बच्चियां भी थीं। 30 अप्रैल 2017 तक यूपी के कारागारों में कुल 92,830 कैदी थे, यानि करीब एक लाख कैदी। यह क्षमता से 60 प्रतिशत अधिक है। साथ ही विचाराधीन कैदियों की संख्या दोषसिद्ध कैदियों से ढाई गुणा अधिक है।

फांसी की सजायाफ्ता में यूपी अव्वल नम्बर पर

फांसी के सजायाफ्ता कैदियों के मामले में उत्तर प्रदेश की जेलें पूरे देश में अव्वल हैं। उत्तर प्रदेश की विभिन्न जेलों में कुल 69 ऐसे कैदी हैं, जिन्हें न्यायालय द्वारा फांसी की सजा सुनाई जा चुकी है। फांसी के सजायाफ्ता कैदियों में से ज्यादातर कैदियों ने अपनी सजा को ऊपरी अदालत में चुनौती दे रखी है। वहीं दूसरा स्थान महाराष्ट्र का है, जहां महाराष्ट्र की जेलों में 41 ऐसे कैदी बंद हैं, जिन्हें विभिन्न अदालतों से फांसी की सजा सुनाई जा चुकी है, लेकिन ऊपरी अदालतों में अपील के कारण यह मामले काफी समय लंबित चल रहे हैं।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आकड़ों की मुताबिक, देश की विभिन्न जेलों में कुल 325 कैदी फांसी के सजायाफ्ता कैदी हैं, जिन्हें विभिन्न अदालतों से मौत की सजा सुनाई जा चुकी है। इस सूची में उत्तर प्रदेश शीर्ष पर है। साथ ही मध्य प्रदेश में 38 और बिहार में 30 है। कर्नाटक की जेलों में 22 कैदी फांसी की सजा प्राप्त हैं, तो केरल में इनकी संख्या 16 है। दिल्ली की तिहाड़ जेल में मृत्युदंड पाए नौ कैदी बंद हैं।

जुर्माना ने भरने के चलते काट रहे थे सजा

नेशनल क्राइम रिकार्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के मुताबिक भारतीय जेलों में 3044 कैदी ऐसे थे जो जुर्माना न भर पाने की वजह से सजा पूरी होने के बाद भी जेल में थे। इनमें से 45.2 फीसद यानी 1375 कैदी छह महीने बाद तक सजा भुगत रहे थे। 33 फीसद कैदी छह महीने से दो साल तक रिहा नहीं हुए थे। दो से तीन साल तक अतिरिक्त सजा काटने वाले तीन सौ कैदी थे। तीन से पांच साल तक जेल में रहने वालों की संख्या सौ रही। 2013 में 240 कैदी ऐसे थे जो जुर्माना न भर पाने की वजह से सजा पूरी होने के पांच साल बाद तक रिहाई नहीं पा सके थे। एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक ऐसा सबसे ज्यादा 1770 कैदी उत्तर प्रदेश की जेलों में थे।

सलमान की एनजीओ ने भी सजायाफ्ता कैदियों का उठाया था बीड़ा

बॉलीवुड सुपर स्टार सलमान खान ने भी उन कैदियों के जुर्माने की राशि भर रहे हैं, जिनकी सजा तो खत्म हो गई है, पर जुर्माने की रकम जमा न कर पाने से वे अब तक जेल में हैं। सलमान ने उत्तर प्रदेश की 63 जेलों में बंद करीब 400 ऐसे कैदियों का बीड़ा उठाया था, जिनकी सजा तो खत्म हो चुकी है पर अब भी वे जेल में रहने को मजबूर हैं। सलमान के एनजीओ ने जेल प्रशासन को खत लिखकर उन कैदियों की मदद की इच्छा जताई थी। 400 कैदियों की रिहाई के लिए सलमान को करीब 40 लाख रुपए का हर्जाना भरना था।

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