गोरखपुर में बच्चों की मौत पर एक डॉक्टर का खुला ख़त 

गोरखपुर में बच्चों की मौत पर एक डॉक्टर का खुला ख़त गोरखपुर हादसा

गोरखपुर मेडिकल कालेज में हुई बच्चों की मृत्यु निश्चय ही हृदयविदारक घटना है । पर इसके लिए जिम्मेदार कौन है ? बच्चे, माँ बाप , इंसेफ़्लाइटिस, मेडिकल कॉलेज, ऑक्सीजन प्रदाता कंपनी, प्रसाशन, शासन, मीडिया या वो चिकित्सक ? बच्चों की कोई गलती नहीं थी ये उनके माता पिता की गलती थी ।

कोई माता पिता अपने बच्चों का बुरा तो नहीं चाहेगा उन्होंने अपने बच्चो के लिए सबसे निकटतम सबसे अच्छी व्यवस्था चुनी उनकी कोई गलती नहीं । इंसेफ़्लाइटिस कह भी नहीं देना इसका तो हमेशा यहाँ प्रकोप रहा है आपको बचना है तो बचीए सरकार ने तो दिखावटी काफी उपाय किये है और प्रयाशरत है । और अगर जिम्मेदार प्रभारी की बात मानें तो ये तो इस महीने हर साल मौतें होती है ।

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मेडिकल कॉलेज की तो कोई जिम्मेदारी नहीं है क्योंकि जब मरीज की हालत बहुत गंभीर हो जाती है तो लोग मेडिकल कॉलेज आ जाते है कब तक ये बोझ अकेले मेडिकल कॉलेज उठाता रहे वो भी जिम्मेदार नहीं हुआ । ऑक्सीजन प्रदाता कंपनी अरे अपने सोचा भी कैसे 70 लाख की बात है अपना कमीशन तो चव्वनी भी नही छोड़ते और हमे आखें दिखा रहे हैं। प्रसाशन इनका क्या लेना है इससे डॉक्टर और मरीज समझे हमारे पास करने के लिए बहुत कुछ है । हमसे सिर्फ इतना पूछो की कहा कमी निकालनी है ? फालतू की खबर कोई काम नहीं है लोगो को सरकार की कमी निकालने के अलवा और हमे कौन सा कुछ कमीशन मिल ही जा रहा है ।

शासन बस हमारी सरकार बनी नहीं की लोगो को मौका मिल गया इससे पहली सरकार से किसी ने क्यों नहीं पूछा ? कुछ तो समय दोगे, हमे भी करने के लिए । मीडिया जो किसी को भी कसूरवार सिध्द करने मे अपनी पत्रकारिता की पराकाष्ठा समझती है। इस दर्दनाक घटना के तह तक जाये बिना दोष साबित और मुल्जिम सबके सामने, पर वाकई धन्य है ये मिडिया । अब बचा कौन? चिकित्सक ! सस्पेंड करो फिर देखा जायेगा बाद में सब ठीक हो जायेगा लोग भी भूल जायेंगे कुछ समय बाद और अगर ससपेंड या टर्मिनेट भी हो जायेंगे तो कमा खा तो लेगा ही ।

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असल जिम्मेदार आपको वहां वही लोग मिलेंगे जो हाकिम बन कर चिकित्सकों की निष्ठा और उनकी कर्तव्यपरायणता पर आदेश फरमातें मिलेंगे । चिकित्सक कदापि नही । वें तो अभी तक अपने आवश्यक आवश्यकतों को भूल मरीजों के ईलाज मे व्यस्त हैं । आक्रोशित हूँ , क्योंकि असमर्थ हूँ वजह ? अंततः मैं भी एक चिकित्सक हूँ । पर अंधे और बधिर ये समझ ले सृजन और संहार हमारे लिए रोजमर्रा की बात है ।

काश तुझ पर भी लागु होता सूचना का अधिकार, ऐ जिंदगी, मुझे तुझसे भी कई सवाल पूछने हैं।

डॉ. रूपेन्द्र, स्वाध्याय फ़ाउंडेशन

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