इस गाँव तक नहीं पहुंची कोई भी सरकारी योजना

गाँव कनेक्शनगाँव कनेक्शन   29 April 2017 12:50 PM GMT

इस गाँव तक नहीं पहुंची कोई भी सरकारी योजनापरिवारों के पास अन्त्योदय कार्ड तो दूर की बात पात्र गृहस्थियों के भी कार्ड नहीं है।

अरविन्द सिंह परमार, स्वयं कम्यूनिटी जर्नलिस्ट

ललितपुर। जहां एक ओर सरकारें कागजों में हर गरीब को मूलभूत सुविधाएं और योजनाएं पहुंचाने का दावा करती हैं, वहीं जमीनी हकीकत कुछ और ही है। अशिक्षा के अभाव में आदिवासी परिवारों का आर्थिक शोषण होता है, लेकिन लाभ नहीं मिलता। ऐसा ही हाल ललितपुर जनपद से 80 किमी. पूर्व दक्षिण दिशा ब्लॉक मड़ावरा की ग्राम पंचायत पारौल के आदिवासियों का है।

2800 की मतदाता वाले पारौल गाँव में लगभग सात-आठ हजार की आबादी है, जिसमें आदिवासियों के लगभग ढाई सौ परिवार हैं। इन परिवारों के पास अन्त्योदय कार्ड तो दूर की बात पात्र गृहस्थियों के भी कार्ड नहीं है। यहीं हाल हरिजनों का भी है, हरिजन व सहरिया के लगभग दो सौ परिवारों में राशन कार्ड नहीं है। भारती बरार (38 वर्ष) बताती हैं, “एक इंच जमीन नहीं है। आठ लोगों के परिवार में पचास-साठ किलो गेहूं एक महीने में लग जाता है।

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मजदूरी रोज नहीं मिलती, बांस की डलिया बनाकर दिन गुजार रही हूं। पेट की खातिर अनाज तो लेना ही पड़ता है। वो आगे बताती हैं, “राशन कार्ड का फार्म भरा, लेकिन आज तक कार्ड नहीं मिला, हमें राशन नहीं मिलता है।” वहीं गाँव के सत्ती मुहल्ला में बैठे प्रकाश नारायण (45 वर्ष) कहते हैं, “गरीब लोगों की कोई नहीं सुनता। पुराने कोटेदार ने पैसे भी लिए थे। कई बार महरौनी गए, लेकिन गरीबों के राशन कार्ड नहीं बने, जिससे राशन की दुकान से कोटा नहीं मिलता, कोटेदार हड़का कर भगा देते हैं।” इसी गाँव की सावित्री सहरिया (45 वर्ष) का कहना है, "अगर हम लोगों को अन्त्योदय कार्ड मिल जाय तो कम से कम घर मे दो वक्त की रोटी तो मिल सके।”

अपात्रों को पात्र बनाकर दिया गया राशन कार्ड

“पंचायत में दो राशन की दुकाने हैं, जिस पर पात्र गृहस्थियों के 596 कार्ड व अन्त्योदय 51 कार्ड हैं, जिसमें लगभग 50-60 कार्ड डबल हैं।” उसी गाँव के प्रकाश ने बताया। वो आगे बताते हैं, “अधिकतर परिवार जो पक्के मकान वाले, वाहन स्वामी, ज्यादा जमीन वाले गाँव के अपात्र को राशन मिल रहा है, लेकिन पात्रों के पास कार्ड ही नहीं है।

आपके द्वारा मामला संज्ञान में आया है। डबल राशन कार्डों की जांच कराई जाएगी। पात्रों के राशन कार्ड बनवाकर उन्हें लाभान्वित किया जाएगा।
कृपा शंकर द्धिवेदी, पूर्ति निरीक्षक, महरौनी

35-40 परिवार बड़े शहरों में कर रहे मजदूरी

यहां के ज्यादातर परिवार बड़े शहरों में मजदूरी करने चले जाते हैं। राजस्थान से वापस आयी राधा रैकवार (33 वर्ष) कहती हैं, “एक साल से मनरेगा में मजदूरी नहीं मिली, ना ही मनरेगा का काम मिलता है। रोजी रोटी के लिए गाँव के 35-40 परिवार राजस्थान, दिल्ली में पलायन किए हुए हैं। जमीन नही है, यहां गुजारा नहीं चलता, राशन कार्ड भी नहीं बना है। कर्जा भी नहीं चुका पाए थे, वापिस लौट कर पांच हजार रूपया चुकाए हैं। घर देखकर फिर मजदूरी करने बाहर जा रही हूं।”

निराश्रित महिलाओं को नहीं मिलती पेंशन

निराश्रित महिलाएं लगातार प्रधान, सचिव का चक्कर लगाती रहती हैं, लेकिन उन्हें योजनाओं का लाभ नहीं मिल पाता है। अजानबाई सहरिया (45 वर्ष) बताती हैं, “महुआ बिन कर खर्च चलाती हूं, पति की मौत हो चुकी है। एक लड़का और एक लड़की है जो अभी छोटे हैं, कोई सुनने वाला नहीं है। मेरे जैसी दस-बारह विधवा महिलाओं को पेंशन नहीं मिलती है।”

15 वर्ष बाद भी पट्टे पर नहीं हो पाया कब्जा

सहरियाओं व हरिजनों को 15 वर्ष पहले पट्टे हुए थे, लेकिन आज तक उन्हें पट्टे पर कब्जा नहीं मिल पाया है। गाँव के गोरेलाल सहरिया बताते हैं, “हम जैसे 25 से 30 पट्टे धारकों के पट्टे आज तक नहीं नपे, गाँव के दबंग कब्जा किए हैं। शिकायत कई बार की, गरीब की कोई नहीं सुनता।”

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