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जानिए कौन हैं बाबूलाल दहिया, जिन्हें मिला है पद्म श्री पुरस्कार  

पद्म श्री पाने वाले मध्य प्रदेश के किसान बाबूलाल दहिया देसी बीज और जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए प्रयासरत हैं। इन्होंने धान सहित 200 किस्मों के देसी बीज एकत्रित कर लिए हैं।

Neetu SinghNeetu Singh   11 March 2019 9:00 AM GMT

जानिए कौन हैं बाबूलाल दहिया, जिन्हें मिला है पद्म श्री पुरस्कार   देसी बीजों को दिखाते किसान बाबूलाल दहिया 

लखनऊ। मध्यप्रदेश के 74 वर्षीय किसान बाबूलाल दहिया पर देसी बीज बचाने का जूनून कुछ इस तरह से सवार है कि उनके पास देसी धान की 130 किस्मे हैं। इन बीजों को इकट्ठा करने के लिए इन्होंने मध्यप्रदेश के 40 जिलों में यात्रा की और धान सहित 200 किस्मों के देसी बीज एकत्रित कर लिए हैं।

मध्यप्रदेश के सतना जिले से 12 किलोमीटर दूर पिथौराबाद गाँव में रहने वाले बाबूलाल दहिया कवितायें, कहानी, लेख, मुहावरें, लोक्तियाँ लिखने के बहुत शौकीन है। देशी बीजों के संग्रह को लेकर अपना अनुभव साझा करते हुए बताते हैं, "ज्यादातर कहावतें देसी बीजों से जुड़ी होती थी, मैंने सोचा देशी बीज विलुप्त होते जा रहे हैं तो मेरी कहावतें लिखने से कोई फायदा नहीं है, इसलिए वर्ष 2007 से बीज बचाने का काम शुरू कर दिया।" वो आगे बताते हैं, "शुरुआत में हमारे पास दो तीन किस्म के ही देशी बीज थे, धान सबसे अच्छी पैदा होती थी उसकी ज्यादातर प्रजातियां विलुप्त हो गयी थी, धान की किस्मों को बचाना हमारा मुख्य उद्देश्य था, अब धान के साथ-साथ 200 प्रकार के देशी बीज हमारे पास इकट्ठा हो गये हैं। हमे जहां भी देशी बीज होने की खबर मिलती है हम वहां पहुंच जातें हैं।"

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देसी धान की 130 प्रजातियां संरक्षित हैं इनके पास

बाबूलाल दहिया एक लेखक के साथ-साथ एक अच्छे किसान भी हैं। बचपन से ही इन्हें खेती करने के तौर तरीके पता थे, ये अपने पिता के साथ छुट्टियों में उनके साथ खेती के कार्यों में सहयोग करते थे। ये बताते हैं, "देशी बीज हमारे यहां की जलवायु में हजारों साल से रच बस गये हैं, जिनमे रोगों को सहन करने की क्षमता है, ये बीज कम पानी में भी हो जातें हैं इनमे ज्यादा पानी बर्बाद नहीं होता है।

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परम्परागत बीज में हजारों गुण धर्म मौजूद है, सत्तर के दशक में पूरे देश में एक लाख दस हजार देशी बीजों की प्रजातियाँ थी।" वो आगे बताते हैं, "देशी बीजों की हम बिक्री नहीं करते हैं, किसानों को बीज के बदले बीज देते हैं, 5/5 के भूखंडों में देशी बीज बोते हैं जिससे हर साल हमारे पास नया बीज होता है, कोदों, कुटकी, सावां, मक्का जैसे तमाम बीजों की कई किस्में हमारे पास हैं, हम एक दूसरे किसान से नये-नये बीज एकत्रित करते रहते हैं जिससे देशी बीजों की किस्मे लगातार हमारे पास बढ़ती रहें, हमारी कोशिश है किसान बाजार का हाइब्रिड बीज न खरीदें सिर्फ देशी बीज का ही इस्तेमाल करें।"

मध्यप्रदेश के 74 वर्षीय बाबूलाल दहिया को देसी बीज संरक्षित करने का है जुनून

वर्ष 1965 तक किसान देशी किस्म के ही बीज बोते थे, जबसे हरित क्रांति आयी किसानों की बाजार पर निर्भरता ज्यादा बढ़ गयी और धीरे-धीरे देशी बीज विलुप्त होते गये ऐसा किसान बाबूलाल दहिया का कहना है। इनका कहना है, "अगर किसान को आगे बढ़ना है और अपने परिवार का स्वास्थ्य बेहतर रखना है तो देशी बीजों का ज्यादा से ज्यादा से उपयोग करना होगा। देसे बीज में लागत कम होने के साथ ही हर प्रकार के मौसम को सहन करने की क्षमता होती हैं, इसलिए किसान ज्यादा से ज्यादा देशी बीज बचाएं इससे पर्यावरण के साथ-साथ मिट्टी भी सुरक्षित रहेगी।"

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