अब गाँवों को भी जला रहीं सांप्रदायिक तनाव की लपटें

Manish MishraManish Mishra   3 Oct 2017 11:21 PM GMT

अब गाँवों को भी जला रहीं सांप्रदायिक तनाव की लपटेंसांप्रदायिक बवाल में उजड़ गए आशियाने। 

बाराबंकी/लखनऊ। एक सड़क से दर्जन भर गाँवों के लोगों की ज़िंदगी शुरू होती थी, उसी रास्ते को लेकर एक दिन गाँव के लोगों ने तलवारें खींच लीं।

लखनऊ से 50 किमी पूरब में हाइवे से दाईं ओर बाराबंकी जिले के अहमदपुर गाँव जाने वाली सड़क पर एक अक्टूबर की रात से सिर्फ सायरन बजातीं पुलिस की गाड़ियां ही दिखाई दे रही हैं। क्योंकि यहां जुलूस निकालने को लेकर हुए सांप्रदायिक तनाव के बाद अहमदपुर, पारा इब्राहीम और न्यौछना समेत करीब एक दर्जन गाँवों में दहशत का माहौल है।

उत्तर प्रदेश के कानपुर, चंदौली और बाराबंकी समेत नौ शहरों में हुए सांप्रदायिक तनाव की घटनाओं में कई लोगों को चोटें आईं, दर्जनों लोगों को गिरफ्तार किया गया। लेकिन इस सब के बीच जो चिंता की बात है वो यह कि अब सांप्रदायिक उन्माद गाँवों को अपनी चपेट में ले रहा है।

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उपद्रवियों ने कई गाड़ियों में आग लगा दी। फोटो-शुभम कौल

"उधर से लोग मूर्ति विसर्जन से लौट रहे थे, इधर से एक दूसरा जुलूस निकल रहा था, जिसके बाद रास्ते को लेकर विवाद हुआ, और वबाल बढ़ गया, "काजी कलीमुद्दी अहमद निवासी अहमदपुर ने बताया, "हम गंगा-जमुनी तहजीब के लोग हैं, हमने मंदिर में चंदा दिया, तो हिन्दू भाइयों ने मस्जिद में मदद की। यह कुछ शरारती तत्वों की साजिश है, दोनों ओर से। इसमें सबसे बड़ी लापरवाही पुलिस की रही। जब रूट बदला गया था तो वापसी में ट्रैक्टर-ट्रालियों को गाँव में घुसने से पहले ही रोक देना चाहिए था।"

अहमदपुर गाँव से करीब 500 मीटर दूर देवकली चौराहे पर वसीम अपनी इलेक्ट्रानिक सामान की जली हुई दुकान दिखा रहे थे, कि तभी एक 15 साल के लड़के ने कहा, "हमारे पास वीडियो है (कुछ आपत्तिजनक) क्या-क्या हुआ था।" वीडियो दिखाते हुए कहा, "यह हम आप को देते हैं, चला दीजिएगा।" इसी बीच भीड़ से किसी ने कहा, "एक वीडियो फेसबुक पर भी अपलोड हुआ था, जिसे पुलिस ने हटवा दिया है।" ठीक ऐसे ही, मुजफ्फरनगर में हुए सांप्रदायिक तनाव के पीछे एक वीडियो था।

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दुकानों के साथ ही सपने हो गए खाक। फोटो-शुभम कौल

एक गाँव से शुरु हुआ बवाल के बाद जिन-जिन गाँवों से वह सड़क गुजरी उसके आसपास के गाँवों में रहने वाले लोग आपा खोते गए और बवाल बढ़ता गया।

देवकली चौराहे से करीब तीन किमी दूर न्योछना गाँव के सूरज गुप्ता का चाट का ठेला तीन दिन से घर से बाहर नहीं निकला। क्योंकि वह बाराबंकी के जिला अस्पताल में भर्ती हैं।

"मूर्ति विसर्जन के बाद कई गाँवों से लोग ट्रैक्टर-ट्रालियों से वापस आ रहे थे, कुछ ट्रालियां निकल आई थीं, जिसके बाद बात बिगड़ गई और यह बात दूसरे गाँवों तक पहुंच गई। जिन घरों के लोग ट्रैक्टर-ट्रालियों में थे वो इकट्ठा होकर पहुंच गए," सूरज गुप्ता (25 वर्ष) ने बताया, "करीब आधे घंटे में दर्जन भर गाँवों के लोग इकट्ठा हो गए, और तोड़फोड़ शुरु हो गई।"

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इस बारे में उत्तर प्रदेश के एडीजी (कानून-व्यवस्था) अभय प्रसाद कहते हैं, "सिर्फ दो ट्रालियां गलत रास्ते पर चली गईं, लेकिन दोनो समुदाय के लोगों को धैर्य रखना चाहिए था। पुलिस ने पूरा प्रयास किया कंट्रोल करने का, लेकिन आम लोगो को भी अपनी जिम्मेदारी निभानी चाहिए थी।"

एक रास्ते पर दो ट्रालियां निकलने को लेकर शुरु हुआ विवाद के बाद आज उस रास्ते के आसपास मौजूद गाँवों में कर्फ्यू जैसे हालात हैं।

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गाँवों में पसरा रहा सन्नाटा। फोटो-शुभम कौल

"पहले लोग एक दूसरे के ऊपर आश्रित होते थे, पर अब ऐसा नहीं है, लोग अपने में रिजर्व हो गए हैं। किसी को किसी से मतलब नहीं रह गया है। दक्षिण भारत में अभी भी गाँवों में एक दूसरे पर निर्भरता है, इसीलिए उन्माद उत्तर भारत से कम है," प्रो. सैय्यद जैनुद्दीन, समाजशास्त्री, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी बताते हैं।

फोटो-शुभम कौल

प्रो. जैनुद्दीन आगे कहते हैं, "गाँव क्या, घरों में भी लोग अब एक दूसरे से बात नहीं करते, सब फोन और लैपटाप में बिजी हो गए हैं। शिक्षा में ऐसे सांस्कृतिक कार्यक्रम शामिल करने होंगे कि इसमें हर धर्म के बच्चे शामिल हों। साथ ही पंचायतों में ऐसी व्यवस्था करनी होगी कि लोगों की एक दूसरे पर निर्भरता बनी रहे।"

फोटो-शुभम कौल

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