भिखारियों के लिए बनाया गया भिक्षुक गृह कर रहा भिखारियों का इंतजार

भिखारियों के लिए बनाया गया भिक्षुक गृह कर रहा भिखारियों का इंतजारजर्जर हालत में पड़ा भिक्षुक गृह।

स्वयंप्रोजेक्ट डेस्क

लखनऊ। प्रदेश में भिक्षुओं के लिए सरकार की ओर से आठ भिक्षुक गृह बनाए गए हैं, मगर इनमें एक भी भिखारी नहीं रहता है। सरकार ने इन भिक्षुक गृहों के जरिए भिक्षुकों को रहने-खाने, स्वास्थ्य और रोजगारपरक प्रशिक्षण देने, शिक्षण की व्यवस्था की थी, जिससे भिक्षुओं को मुख्य धारा से जोड़ा जाए और उन्हें रोजगार मुहैया कराया जाए। मगर इन भिक्षुक गृहों का सही क्रियान्वयन न होने से यह योजना सिर्फ हवाहवाई साबित हो रही है।

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भिक्षुक रवि कुमार (36 वर्ष) इंटर पास हैं और मूलरूप से लखनऊ के मड़ियांव के रहने वाले हैं। रवि बताते हैं, “चार साल पहले कुछ पारिवारिक झगड़ों की वजह से घर से निकल आया, कई दिनों तक जब मजदूरी नहीं मिली तो मजबूरी में भूख मिटाने के लिए रोड पर खड़े होकर भीख मांगी, तब शाम को खाना खाया।”वह आगे बताते हैं, “दिनभर भीख मांगकर रात को सड़क पर सोना होता था।

दिन के 50-60 रुपये मिल जाते हैं, अब तो चार साल से भीख ही मांग रहे हैं, मजदूरी खोजनी बंद कर दी है।”रवि कुमार की तरह देश के हजारों युवाओं को रोजगार न मिलने की वजह से भीख मांगने को मजबूर होना पड़ा। भिक्षावृत्ति आज भी देश की गंभीर समस्या बनी हुई है। हर दिन हजारों की संख्या में भिक्षु रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड, बाजार, मन्दिर और हर तिराहे के कोने पर कटोरा लेकर खड़े होते हैं। भिक्षावृत्ति में बच्चों से लेकर बुजुर्ग, महिलाएं सभी शामिल हैं।

यहां का भिक्षुक गृह पिछले कई वर्षों से जर्जर पड़ा है, शासन को बजट बनाकर भेजा गया है, पर अभी नये भवन का निर्माण शुरू नहीं हुआ है।
केएस मिश्रा, जिला समाज कल्याण अधिकारी , लखनऊ

लखनऊ में नैपियर रोड ठाकुरगंज चौक स्थित राजकीय प्रमाणित संस्था (भिक्षुक गृह) के अधीक्षक सुमित यादव बताते हैं, “मोहान रोड पर नया भिक्षुक गृह बनने की जगह चिन्हित हो गयी है, जबतक भिक्षुक गृह नहीं बनता, तब तक सभी लोग विभाग के दूसरे काम कर रहे हैं।”बता दें कि उत्तर प्रदेश भिक्षावृत्ति प्रतिषेध अधिनियम 1975 में बनाया गया, जिसके तहत उत्तर प्रदेश में सात जिलों में आठ राजकीय प्रमाणित संस्था (भिक्षुक गृह) का निर्माण कराया गया। इन भिक्षुक गृहों में 18-60 वर्ष तक के भिक्षुकों को रहने खाने, स्वास्थ्य तथा रोजगारपरक प्रशिक्षण देने तथा शिक्षण की व्यवस्था की गयी, जिससे भिक्षुओं को मुख्य धारा से जोड़ा जाए और उन्हें रोजगार मुहैया कराया जाए।

दो साल पहले हमारी यहाँ पोस्टिंग हुई है, भवन जर्जर पड़ा हुआ है, इसलिए यहां कोई भिक्षुक नहीं रहता है।”
सुमित यादव, अधीक्षक, राजकीय प्रमाणित संस्था (भिक्षुक गृह), लखनऊ

66 प्रतिशत से अधिक भिक्षुक वयस्क

लखनऊ में पिछले दो वर्षों से “भिक्षावृत्ति मुक्ति अभियान”चला रहे सामाजिक कार्यकर्ता शरद पटेल (28 वर्ष) बताते हैं, “लखनऊ शहर की तमाम जगहों पर 3000 से अधिक भिक्षकों पर रिसर्च किया तो पता चला कि 66 प्रतिशत से अधिक भिक्षुक व्यस्क हैं, जिनकी उम्र 18-35 वर्ष के बीच है, 28 प्रतिशत भिक्षुक वृद्ध हैं, पांच प्रतिशत भिक्षुक 5-18 वर्ष के बीच के हैं। शोध से ये भी निकल कर आया कि लखनऊ में भीख मांगने वालों में 71 प्रतिशत पुरुष हैं, जबकि 27 प्रतिशत महिलाएं इस व्यवसाय से जुड़ी हैं। इनके बीच अशिक्षा का आलम ये है कि 67 प्रतिशत बिना पढ़े-लिखे हैं, लगभग सात प्रतिशत भिक्षुक साक्षर हैं और 11 प्रतिशत पांचवी तक और पांच प्रतिशत आठवीं तक पढ़े हैं। चार प्रतिशत दसवीं पास, एक प्रतिशत स्नातक होने के बावजूद भीख मांग रहे हैं।“

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