निजी स्कूलों की सेटिंग से बच्चों का भविष्य हो रहा ख़राब समय से नहीं मिल पा रहीं किताबें

Meenal TingalMeenal Tingal   16 April 2017 1:53 PM GMT

निजी स्कूलों की सेटिंग से बच्चों का भविष्य हो रहा ख़राब समय से नहीं मिल पा रहीं किताबेंप्रतीकात्मक फ़ोटो

स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क

लखनऊ। स्कूलों द्वारा कमीशनखोरी के चलते स्टेशनरी के लिए सेट की गई दुकानों पर शिकंजा कसे जाने के बाद अभिभावकों को कुछ राहत तो मिली है, लेकिन एक नई समस्या सामने आ रही है। सेट दुकानों के बंद होने और किताबें बाजार में उपलब्ध न होने के कारण बच्चे बिना किताब के स्कूल जा रहे हैं। इसके चलते स्कूल में शिक्षक बच्चों को सजा देने के साथ स्कूल से लौटा रहे हैं।

कक्षा आठ की छात्रा शगुन वैश्य की मां दिव्या राजेश वैश्य (38 वर्ष) कहती हैं, “मेरी बेटी एमजीएम स्कूल में पढ़ती है। उसकी किताबें हर वर्ष जिस दुकान से लाने के लिए स्कूल द्वारा कहा जाता रहा है। वह इस समय छापेमारी के डर से बंद चल रही है। शहर के कई बाजारों के चक्कर लगा चुके हैं, लेकिन बाजार में वह किताबें मौजूद नहीं हैं।

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स्कूल में टीचर किताबें न होने के कारण बच्ची को सजा देती हैं। इसमें बच्ची या हम लोगों की क्या गलती है। शिक्षाधिकारियों को इसके लिए भी कुछ करना चाहिए।” लखनऊ में 611 वित्तविहीन मान्यता प्राप्त विद्यालय संचालित हो रहे हैं। इसके साथ ही ऐसे विद्यालयों की कोई गिनती नहीं है जो बिना मान्यता के संचालित हो रहे हैं। लगभग इन सभी स्कूलों द्वारा स्टेशनरी की वह दुकानें सेट की गई हैं जहां उनके द्वारा चयनित प्रकाशकों की किताबें बिकती हैं।

मेरी बहन की कई किताबें बाजार में नहीं मिल रही हैं। जिस दुकान से किताबें लेनी है वह दुकान इन दिनों बंद है, लेकिन स्कूल में किताबों को लाने के लिए बाध्य किया जा रहा है। जब किताबें मिलेंगी तब ही तो लाई जा सकेंगी। कुछ दिनों का समय स्कूल को देना ही चाहिए।
कलश, सेंट क्लेअर्स स्कूल में कक्षा नौ में पढ़ने वाली बच्ची के भाई

एक सप्ताह पहले निजी स्कूलों की मनमानी पर रोक लगाने के लिए जिला विद्यालय निरीक्षक उमेश त्रिपाठी ने सिटीजन चार्टर लागू किया था। इसके लिए 25 टीमें बनायी गई हैं। जो स्कूलों व स्टेशनरी की दुकानों पर छापा मारकर मनमानियों पर पाबंदी लगाने का काम कर रही हैं।

मैंने अभियान चलाकर उन दुकानों को बंद करवाने का काम किया जो कमीशन पर स्कूलों ने सेट कर रखी थीं। अब स्कूलों में बच्चों से कुछ न कहा जाए इसके लिए मैं क्या कर सकता हूं।
उमेश त्रिपाठी, जिला विद्यालय निरीक्षक

यह कहने पर कि स्कूलों को नोटिस जारी किया जाए कि बच्चों को किताबों के लिए 10-15 दिनों का समय दें। इस पर जिला विद्यालय निरीक्षक उमेश त्रिपाठी ने कहा, “स्कूलों को तो मैं कोई नोटिस इस सम्बन्ध में जारी नहीं कर सकता। हां, प्रकाशकों को एक नोटिस जारी जरूर कर दूंगा कि वह किताबों को जल्द से जल्द बाजारों में उपलब्ध करवाएं।”

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