गड़बड़झाला : बिकती गईं चीनी मिलें और बेजार हो गए लाखों लोग

गड़बड़झाला : बिकती गईं चीनी मिलें और बेजार हो गए लाखों लोगमुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने चीनी मिल कथित घोटाले की जांच कराने का आदेश ने दिया है।

चीनी मिल बिक्री मामले में बसपा के साथ-साथ सपा सरकार भी घोटाले के लिए जिम्मेदार है। सरकार इस मामले की निष्पक्ष जांच कराने जा रही है। जो भी दोषी होंगे, उन पर कार्रवाई होगी। -सुरेश राणा, गन्ना मंत्री, उत्तर प्रदेश

लखनऊ। मायावती राज में उत्तर प्रदेश राज्य चीनी मिल निगम की 21 सरकारी चीनी मिलों को निजी हाथों में बेचने और इसमें 1100 करोड़ रुपये के कथित घोटाले की जांच कराने का आदेश अब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने दिया है। इससे पहले अखिलेश यादव की पूर्व समाजवादी सरकार ने इस मामले को भी ठंडे बस्ते में डाल दिया था। मगर प्रदेश के दोनों सरकारों के राज में न सिर्फ गन्ना किसानों की जिंदगी कसैली हो गई, वहीं लाखों लोग चीनी मिलों के बंद होने से प्रभावित हुए।

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बता दें कि उत्तर प्रदेश की बसपा सरकार में साल 2010 से लेकर 2011 तक प्रदेश सरकार ने बड़ी संख्या में सरकारी चीनी मिलों की माली हालत को खराब बताते हुए बेच दिया था। सरकार के इस निर्णय की बहुत अधिक आलोचना हुई थी। आरोप लगाया गया था कि सरकार ने मुनाफा कमा रही चीनी मिलों को भी अपने औने-पौने दामों में बेच दिया था। इससे सरकारी खजाने को जहां बड़ा चूना लगा था, वहीं उत्तर प्रदेश सरकार ने चीनी मिलों की बिक्री में केन्द्र सरकार के विनिवेश काननू का उल्लंघन भी किया था। चीनी मिलों को खरीदने वाली निजी कंपनियों ने मिल लेते समय वादा किया था कि चीनी मिलों को अच्छे से चलाएंगी, लेकिन वह अपने वादों से मुकर गई। इसका खामियाजा चीनी मिलों में काम करने वाले कर्मचारी और गन्ना किसान आज भी भुगत रहे हैं।

अखिलेश सरकार ने भी मामले को डाल दिया था ठंडे बस्ते में

कुशीनगर जिले लक्ष्मीगंज चीनी मिल के कर्मचारी रहे रामसजीव सिंह ने बताया, ''चीनी मिले बंद होने से हम लोग भूखमरी के कगार पर पहुंच गए। इन चीनी मिलों को खरीदने वाली कंपनी ने आज तक इस चीनी मिल को चालू नहीं किया।'' साल 2012 में उत्तर प्रदेश की सत्ता में आने के बाद अखिलेश यादव ने अपनी कैबिनेट मीटिंग में बसपा सरकार में बेची गईं सरकारी चीनी मिलों की जांच की बात की थी, लेकिन उन्होंने पूरे पांच साल तक कुछ नहीं किया।

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भूखमरी के कगार पर श्रमिक

बाराबंकी के देवा मार्ग पर स्थित खंडहर बन गई उत्तर प्रदेश राज्य चीन निगम लिमिटेड की सरकारी चीनी मिल कभी इस क्षेत्र के हजारों लोगों को रोजगार देती थी। बसपा सरकार ने इसे बेच दिया। 12.51 करोड़ रुपए में बेची गई। इस चीनी मिल के सौदे को लेकर सवाल उठा था। इस चीनी मिल में काम कर चुके राकेश सिंह ने बताया, ''चीनी मिल बिकते ही कर्मचारियों का उत्पीड़न शुरू हो गया। कर्मचारियों का जबरन वीआरएस दिया जाने लगा। चीनी मिल परिसर के पास कर्मचारियों के लिए बनी कालोनी में बिजली और पानी की सप्लाई को बंद कर दिया गया। जिसका नतीजा है कि हम लोग आज बेरोजगार हैं।''

पूर्वी उत्तर प्रदेश के रामकोला के गन्ना किसान शेखर सरकारी चीनी मिलों की बिक्री को लेकर बताया, ''पहले से ही गन्ना किसान मुसीबत में थे, उन्हें मेहनत के बावजूद लागत का दाम नहीं मिल रहा था और ऐसे में बसपा की सरकार ने अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ कर हमें निजी कंपनियों के शोषण के लिए छोड़ दिया। जो चीनी मिलें चल रही थीं, वह भी बंद हो गई। क्षेत्र के हजारों लोग तो बेरोजगार हुए ही गन्ना किसान भी बदहाल हो गए।''

उत्तर प्रदेश में सक्रिय मानवाधिकार कार्यकर्ता और गन्ना किसानों के बीच काम करने वाले मनोज कुमार बताते हैं कि चीनी मिलों के निजीकरण से कृषि का मौजूदा संकट और बढ़ गया। गन्ना किसानों का चीनी मिलों पर जो रहा-सहा नियंत्रण है, वह भी खत्म हो गया। जो आशंका थी, वह सच साबित हुई। बड़ी निजी कंपनियां इस क्षेत्र में अपना आधिपत्य जमाकर मिलों की जमीन पर दूसरा काम शुरू कर दिया।

सीएजी रिपोर्ट में भी धांधली उजागर

सीएजी की रिपोर्ट की मानें तो अमरोहा की चीनी मिल जिसकी प्रतिदिन उत्पादन क्षमता 3000 टन की थी, वह वेब लिमिटेड को 17.10 करोड़ में बेची गई, जबकि उस मिल के अंदर रखी चीनी व शीरा का मूल्य ही 13.64 करोड़ का था। इस तरह 30.4 एकड़ जमीन और चल-अचल सम्पत्ति का निर्धारण केवल 4.07 करोड़ रुपए ही आंका गया। अमरोहा चीनी मिल शहर में स्थित है, उसका क्षेत्रफल 76 एकड़ है जिसमें 4 बड़े बंगले, 6 कालोनियां और 20 अन्य क्वाटर्स हैं। डीएम सर्किल रेट के अनुसार केवल जमीन का दाम 250 करोड़ रुपया था। चीनी उद्योग उत्तर प्रदेश का एक महत्वपूर्ण उद्योग है। उत्तर प्रदेश के लगभग 53 लाख किसान इससे जुड़े हुए हैं। प्रदेश में कभी 156 चीनी मिले हुआ करती थी। लेकिन अभी मात्र 116 चीनी मिले हैं जो चल रही हैं। प्रदेश में कुल 20.54 लाख हेक्टेयर में गन्ने की खेती होती है।

ज्यादातर सहकारी चीनी मिलें घाटे पर चल रही हैं।

अचल संपत्तियों के मूल्यांकन में भी भारी धांधली

मायावती सरकार की तरफ से बेची गई चीनी मिलों पर सीएजी की रिपोर्ट ने भी सवाल खड़े किए थे। सीएजी की रिपोर्ट के अनुसार, उत्तर प्रदेश सरकार ने चीनी मिलों की बिक्री में केन्द्र सरकार की ओर से निर्धारित विनिवेश नीति का उल्लंघन किया। चीनी मिलों की भूमि के अलावा संयंत्र, मशीनरी, फैक्ट्री के भवनों, चीनी गोदामों के साथ रिहायशी आवासों और अन्य अचल संपत्तियों के मूल्यांकन में भारी धांधली की गई। मूल्यांकन में बिना कारण बताए भूमि के मूल्य में और भवनों में 25 प्रतिशत की छूट दी गई। सर्किल रेट को अनदेखा करने के कारण स्टांप ड्यूटी में चोरी से 600 करोड़ से अधिक की क्षति हुई। सबसे दुर्भाग्यपूर्ण यह रहा कि जो चीनी मिलें लाभ में चल रहीं थी, उन्हें भी बेचा दिया गया। जरवलरोड, सहारनपुर ओर सिसवां बाजार चीनी मिलों ने 2008-09 में और खड्डा चीनी मिल ने वर्ष 2009-10 में लाभ अर्जित किया था, लेकिन इन्हें भी बेच दिया गया।

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