सरकारें बदलीं पर नहीं थमीं बच्चों की मौतें

सरकारें बदलीं पर नहीं थमीं बच्चों की मौतेंबीआरडी मेडिकल कॉलेज में शनिवार को 4 साल के इस बच्चे की बुखार से मृत्यु को गई।

लखनऊ। पिछले कई सालों में सरकारें बदलीं, निजाम बदले, लेकिन पूर्वांचल में बच्चों की मौत का सिलसिला नहीं रुका। पिछले चार दशकों में करीब 10 हजार बच्चों की मौत हो चुकी है। जो बच्चे बच गए उन्हें यह बीमारी एक तरह से दिव्यांगता देकर जाती है।

इंसेफ्लाइटिस पूर्वांचल के कई जिलों में नवजात बच्चों के लिए अभिशाप है। अकेले गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज के आंकड़ों के अनुसार 1978 से लेकर अब तक 39,100 इंसेफेलाइटिस के मरीज भर्ती हुए इनमें 9,286 बच्चों की मौत हो गई।

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बीआरडी कॉलेज के इंसेफेलाइटिस वार्ड के प्रभारी और असिस्टेंट हेड ऑफ डिपार्टमेंट डॉ. काफिल अहमद बताते हैं, “जापानी इंसेफेलाइटिस एक तरह से यहां पर महामारी का रूप ले चुका है। हर साल हजारों बच्चों की जान ले रहा है, लेकिन इस बीमारी की रोकथाम के लिए, जो काम होना चाहिए, वह नहीं हो रहा है।”

डॉ. काफिल अहमद बताते हैं, “दूषित पानी और मच्छर के काटने से फैलने वाली इस बीमारी ने 1978 में कई देशों में दस्तक दी थी, लेकिन अधिकतर देशों ने टीकाकरण और दूसरे प्रयासों से इस बीमारी पर काबू पा लिया, लेकिन पूर्वांचल में यह घटने की बजाय हर साल बढ़ रही है।”

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लगातार राजनीति में इंसेफ्लाइटिस का मुद्दे पर राजनीति हुई लेकिन ठोस उपाय नहीं खोजे जा सके। यही कारण है कि गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज में 200 किमी दूर तक के मरीज आते हैं, उनके पास कोई दूसरा चारा ही नहीं है।

इंसेफ्लाइटिस को पोलियो की तरह प्रदेश को मुक्त नहीं किया जा सका है। गोरखपुर में इंसेफ्लाइटिस के उन्मूलन के लिए लड़ाई लड़ रहे डॉ. आरएन सिंह कहते हैं, “हम लोग इसके लिए एक राष्ट्रीय कार्यक्रम बनाने के लिए लड़ाई लड़ रहे हैं।”

“वर्ष 2012 में यूपीए ने इसे राष्ट्रीय कार्यक्रम तो बना दिया, पर जमीन पर लागू नहीं किया। यह प्रोग्राम दिल्ली से टेक ऑफ ही नहीं हुआ।” वह आगे कहते हैं,अगर हम पिछले 10 साल के आंकड़ों पर गौर करें तो बच्चों की मौतें लगभग हर सरकार में बच्चों की मौतें लगभग उतनी ही रहीं। इस बीमारी पर रोक न लग पाने के पीछे व्यवस्था की खामी तो है ही, साथ ही लोगों की सोच में बदलाव न आना भी है।” यह गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों के बच्चों में ज्यादा पाई जाती है। जागरूकता नहीं है, पूर्वांचल का पानी भी दूषित है। जिस वजह से ज्यादा बच्चे चपेट में आ रहे हैं," बीएचयू में

इसके लिए गरीब तबके को जागरुक करना बहुत जरूरी है। आज पूर्वांचल में जापानी इन्सेफ्लाइटिस (जेई) से अधिक जलजनित बीमारी एक्यूट इन्सेफ्लाइटिस सिंड्रोम (एईएस) से हो रही हैं।
डॉ. वीके, समाजशास्त्री

पूर्वांचल में पेयजल में आर्सेनिक, फ्लोराइड आदि पाए जाने से यह भयंकर रूप लेती जा रही है। सबसे बड़ी समस्या है सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र और प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र पर उचित इलाज न मिल पाना भी है। बुखार के पहले दिन सही से इलाज नहीं मिल पाता। जिससे स्थिति और गंभीर हो जाती है। जब केस गड़बड़ा जाता है तो मेडिकल कॉलेज लेकर भागते हैं। इसके लिए सीएचसी और पीएचसी को मजबूत करना होगा।”

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गोरखपुर के ग्रामीण क्षेत्रों में कार्य करने वाली संस्था मानव सेवा संस्थान के निदेशक राजेश मणि बताते हैं, “जो जमीनी स्तर पर काम होना चाहिए नहीं हो पा रहा है। इसके लिए कोई एक विभाग नहीं जिम्मेदार होता, सभी को सामूहिक रूप से कार्य करना होगा।” मेरा सुझाव है कि इस तरह की दिक्कतों से निपटने के लिए सरकार को हर वार्ड में एक ऑक्सीजन कंसन्ट्रेटर जरूर लगवाने चाहिए। जो आक्सीजन को खींच कर सप्लाई करता है।

कभी अलर्ट जारी नहीं हुआ

गोरखपुर में इंसेफ्लाइटिस के उन्मूलन के लिए लड़ाई लड़ रहे डॉ. आरएन सिंह आगे कहते हैं, “चूंकि इसमें गरीबों के बच्चे मरते हैं, इसलिए सरकारों का इस ओर ध्यान ही नहीं गया। डेंगू और स्वाइन फ्लू से जहाजों में चलने वालों के बच्चे जब चपेट में आते हैं, तो हाय तौबा मच जाती है। इंसेफ्लाइटिस में मौतें गंदगी से होती हैं, इसके लिए न तो कभी अलर्ट जारी हुआ, न ही ध्यान गया।”

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