‘कंक्रीट के जंगल’ यूपी में हर साल निगल रहे 25-30 हजार हेक्टेयर खेती वाली जमीन

Ashwani NigamAshwani Nigam   7 May 2017 7:52 PM GMT

‘कंक्रीट के जंगल’ यूपी में हर साल निगल रहे 25-30 हजार हेक्टेयर खेती वाली जमीनलखनऊ के आस-पास तेजी से बढ़ रहा है आवासीय कॉलोनियों का दायरा। फोटो: विनय गुप्ता

लखनऊ। उत्तर प्रदेश में पिछले 5 सालों में खाद्यान्न उत्पादन को बढ़ाने के लिए चलाई गईं योजनाओं पर करीब 400 करोड़ रुपए खर्च किए गए, लेकिन उत्पादन के आंकड़ों में तब्दीली नहीं आई। यही नहीं खेती वाली जमीन भी इस बीच घट गई। कृषि विभाग की मानें तो शहरों के आसपास खड़े हो रहे कंकरीट के जंगल 25-30 हजार हेक्टेयर जमीन सालाना निगल रहे हैं।

जानकारों के अनुसार प्रदेश की राजधानी लखनऊ में कुछ साल पहले तक उत्तर दिशा में मड़ियांव और कुकरैल के आसपास बड़े पैमाने पर खेती होती थी, वहां अब हजारों घर बन गए हैं। इसी तरह हरदोई रोड़ पर काकोरी के आगे तक आम के बागों के बीच पक्की ईंटों की दीवारे नजर आने लगी है। सुल्तानपुर, कानपुर व रायबरेली रोड पर भी लखनऊ से 20-30 किलोमीटर जाने के बाद ही हरे-भरे खेत दिखते हैं।

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विशेषज्ञों का कहना है कि इन जमीनों पर धड़ल्ले से आवासीय कॉलोनियां और व्यावसायिक इमारतें खड़ी होने से खेत कंक्रीट के जंगल में तब्दील हो रहे हैं। प्रदेश की बड़ी आबादी खेती पर निर्भर है और ऐसे में कृषि योग्य जमीन घटने से सरकार की नींद उड़ी हुई है। हालात ऐसे हैं कि अब इसे रोकने प्रदेश सरकार ने भी पहल शुरू कर दी है। सूत्रों की माने तो खेती योग्य जमीन की रक्षा करने के लिए प्रदेश सरकार फिर से भूमि सेना योजना को प्रदेश के 65 जिलों में सक्रियता से लागू करने जा रही है। उत्तर प्रदेश के कृषि मंत्री सूर्य प्रताप शाही ने बताया, ''प्रदेश में कृषि योग्य जमीन घटने न पाए और कृषि उत्पादन बढ़े इसके लिए सरकार ने भूमि सेना योजना को और भी मजबूती के साथ लागू करने जा रही है। ''

12वीं पंचवर्षीय योजना में शुरू की थी योजना

कृषि योग्य जमीन की रक्षा करना और कृषि उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए उत्तर प्रदेश में 12वीं पंचवर्षीय योजना के तहत साल 2012-13 में पांच साल के लिए भूमि सेना योजना की शुरूआत की गई थी। यह योजना इसी 31 मार्च को पूरी हुई है, लेकिन इसका जो परिणाम मिलना चाहिए था वह नहीं मिला है। ऐसे में यह योजना एक बार फिर से उत्तर प्रदेश की सरकार नए सिरे से लागू करने जा रही है। इस योजना के तहत प्रदेश की बीहड़, ऊसर और बिना उपजाऊ भूमि को खेती सुधार करके जहां खेती योग्य बनाना है, वहीं खेती की जमीनों का इस्तेमाल अवैध रूप से बिल्डिंग बनाने में न किया जाए यह भी ध्यान रखा जाएगा।

पर्यावरण के लिए भी खतरे की घंटी

लखनऊ में चिनहट ब्लॉक में ककौली गाँव के किसान जयपाल यादव बताते हैं, पिछले 10-15 वर्षों में व के 50 फीसदी किसानों ने खेती बंद कर दी हैं। ज्यादातर किसानों ने प्रॉपर्टी वालों को खेत बेच दिए हैं, तो कुछ खुद प्लाट काटने लगे हैं।” वहीं खेती और किसानी को बचाने के लिए काम कर रहे किसान नेता और भारतीय किसान यूनियन के प्रवक्ता धर्मेन्द्र मल्लिक ने बताया, '' रियल स्टेट के कारोबारी अब शहरों को छोड‍़कर आसपास के गांवों का रूख कर रहे हैं। वहां पर किसानों से जमीने लेकर वे बिल्डिंगें बना रहे हैं। ये किसानी के साथ ही पर्यावरण के लिए भी खतरे की घंटी हैं।” वे आगे बताते हैं, ' ग्रामीण इलाकों में ज्यादातर निजी और अनधिकृत कॉलोनियां हैं, न उनमें पार्क होते हैं न हरियाली। यही नहीं ये लोग पानी का भी अधिक दोहन कर रहे हैं, जो ग्राउंड वाटर के लिए खतरा है। इससे आसपास के किसानों के लिए भी दिक्कतें बढ़ रही हैं।”

95.18 लाख हेक्टेयर जमीन ही खेती में इस्तेमाल

उत्तर प्रदेश कृषि विभाग के अनुसार उत्तर प्रदेश में 95.18 लाख हेक्टेयर जमीन ही खेती के लिए इस्तेमाल हो रही है। चिंता इस बात की है कि अगर खेती योग्य जमीनों को गैर कृषि में इस्तेमाल में नहीं रोका गया, तो प्रदेश में कृषि के लिए संकट उत्पन्न हो जाएगा। ऐसे में कृषि योग्य जमीन को बचाने के लिए भूमि सेना को एक सुसंगठित अनुशासित और क्रियाशील कार्यबल के रूप में गठित करके इसको भूमि और जल के संरक्षण का प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है। भूमि सैनिकों के समूह को भूमि सेना का नाम दिया गया है। इसके अध्यक्ष को टोलीनायक कहा जाता है। इसके लिए फोटोयुक्त पहचान पत्र भी जारी किया गया है।

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भूमि सेना योजना में ऊसर, बीहड़, बंजर और ग्रामसभा की ऐसी भूमि जिसपर खेती नहीं हो रही है, उसे भूमिहीन खेतिहर मजदूरों को, राजस्व विभाग के सहयोग से आवंटित कराकर खेती के लिए दिया भी जा रहा है। इस योजना में लघु और सीमांत किसानों की गैर उपजाऊ भूमि को उन्हीं के जरिए सुधार करके उपजाऊ बनाने की ट्रेनिंग और सुविधाएं भी दी जा रही हैं। साथ ही कृषि वानिकी को बढ़ावा भी दिया जा रहा है। इसके तहत प्रदेश के जलभराव वाले क्षेत्रों का उपचार भी होगा व वहां खेती करने के लिए किसानों को प्रोत्साहित किया जाएगा।

1990 में मुलायम सिंह यादव ने बनायी थी रणनीति

इस प्रकार की योजना सबसे पहले 1990 में बनायी गयी। उस वक्त उत्तर प्रदेश में बढ़ती हुई जनसंख्या और उद्योग धंधो की स्थापना से उपलब्ध कृषि योग्य भूमि निरंतर कम होती जा रही थी। इस विकट समस्या को देखते हुए प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने 9 अगस्त 1990 को भूमि सेना योजना लागू की। इस योजना का प्रारम्भ उन्होंने समाजवादी आंदोलन के संस्थापक आचार्य नरेन्द्र देव के जन्म दिन पर किया था। जबकि बसपा राज में यह योजना बंद कर दी गई।

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साल 2012 में दोबारा सपा के सत्ता में आने के बाद मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने इसे दोबारा शुरू किया। इस योजना के अंतर्गत प्रदेश की ऊबड़-खाबड़ पथरीली, बीहड़, ऊसर, जलमग्न और बंजर जमीन को कृषि योग्य बनाकर पात्र लोगों में वितरित किया जाना था। इस योजना में कृषि क्षेत्रफल में विस्तार के साथ जल स्रोतों के जीर्णोद्धार, कृषि उत्पादन में वृद्धि और गाँव में रोजगार के अवसर मुहैया कराना था।

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