गोरखपुर इनसाइड स्टोरी : पैसे मेडिकल कॉलेज के अकाउंट में थे, फिर भी उखड़ गईं बच्चों की सांसें 

गोरखपुर इनसाइड स्टोरी :  पैसे मेडिकल कॉलेज के अकाउंट में थे, फिर भी उखड़ गईं बच्चों की सांसें बच्चों की मौत जिम्मेदार कौन है, पढ़ें इनसाइड स्टोरी 

गोरखपुर। बीआरडी अस्पताल में जिन बच्चों की आॅक्सीजन के गडबड़झाले में मौतें हुईं, अगर तत्कालीन प्रिंसिपल राजीव मिश्रा चाहते तो मेडिकल कॉलेज के अन्य मद का पैसा आॅक्सीजन सप्लाई करने वाली कंपनी को ट्रांसफर करके बच्चों की ज़िंदगी बचा सकते थे। आरोप है कि आॅक्सीजन सप्लाई करने वाली कंपनी के 63 लाख रुपए न मिलने पर बच्चों की मौतें हुईं।

गाँव कनेक्शन से बात करते हुए महानिदेशक मेडिकल शिक्षा केके गुप्ता ने बताया, "अस्पताल के अकांउट में दूसरे मदों के करीब 1.25 करोड़ रुपए थे, जो प्रिंसिपल चाहते तो कंपनी को ट्रांसफर कर सकते थे।" साथ ही वह आगे बताते हैं, "कंपनी को पेमेंट के भुगतान का पत्र विभाग को दो अगस्त, 2017 को मिला था। हमने पांच तारीख को पेमेंट करा दिया।"

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गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज को अब तक 3.78 करोड़ रुपए जारी किए गए थे, जिसमें से 2.5 करोड़ खर्च होने के बाद 1.25 करोड़ अन्य मदों का पैसा मेडिकल कॉलेज के पास था। "प्रिंसिपल को पता था कि आॅक्सीजन लाइफलाइन है तो उन्होंने इस पैसे से कंपनी को पेमेंट क्यों नहीं किया?" डीजीएमई केके गुप्ता ने सवाल उठाते हैं।

इस पैसे के इस्तेमाल के लिए किसी लिखित इजाजत की जरुरत नहीं थी क्योंकि सरकार ने साफ कर रहा था कि आॅक्सीजन जैसे जरुरी कार्य किसी हालत में बंद न हों। राजीव मिश्रा ने पैसा ट्रांसफर क्यों नहीं किया इसके तत्कालीक रुप में उनका छुट्टी पर जाना कारण बताया जा रहा है, लेकिन मीडिया में लगातार कमीशऩबाजी की खबरें आ रही हैं। ये पहली बार नहीं है जब मेडिकल कॉलेज के खाते में पैसे होते हुए थे चिकित्सीय काम रुके हैं।

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2016-17 का साढ़े छह करोड़ रुपये खर्च नहीं होने पर वापस चला गया था, आॅक्सीजन सप्लाई करने वाली कंपनी के लाखों रुपए बाकी थे। डायरेक्टर मेडिकल एजुकेशन ने वर्ष 2016-2017 का 6.50 करोड़ रुपए वापस होने पर 25 अप्रैल, 2017 को दो सदस्यीय जांच कमेटी बनाई कर जांच शुरू की थी, जिसने 13 अगस्त 2017 को रिपोर्ट सौंपी है। उस दौरान भी पुष्पा सेल्स प्रा. लिमिटेड के 27 लाख रुपए बाकी थे और मोदी गैस के 10 लाख बाकी थे। इस रिपोर्ट में दो बाबुओं को दोषी पाया गया है, लेकिन वो कभी बयान के लिए कमेटी के सामने नहीं पहुंचे।

बीआरडी अस्पताल के बच्चा वार्ड में तैनात एक कर्मचारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, "इस पूरे वाक्ये के लिए प्रिंसिपल साहब और इंसेफेलाइटिस डिमार्टमेंट के हेड जिम्मेदार हैं। इऩ लोगों ने बहुत नुकसान पहुंचाया है। नौ अगस्त, 2017 को जब मुख्यमंत्री योगी आए थे, इऩ्होंने पूरी बात छिपाई, तब सब बढ़िया- सब बढिया बोल रहे थे। सरकार को चाहिए इऩ दोनों की जांच कराए, बड़ा घपला निकलेगा।

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