गोरखपुर में कोहराम मचाने वाली वो बीमारी जिससे खौफ खाते हैं पूर्वांचल के लोग 

गोरखपुर में कोहराम मचाने वाली वो बीमारी जिससे खौफ खाते हैं पूर्वांचल के लोग गोरखपुर के मेडिकल कॉलेज में भर्ती बच्चा। 

लखनऊ। 'ये एक ऐसी बीमारी है, जिसमें 30-40 फीसदी लोगों को ही बचाया जा सकता है, 30 फीसदी मरीजों की मौत हो जाती है, बाकि 30 फीसदी किसी न किसी तरह की शारीरिक विक्षिप्ता का शिकार हो जाते हैं। जिनमें सबसे ज्यादा बच्चे होते हैं।’ डॉ. केपी कुशवाहा, गोरखपुर मेडिकल कॉलेज के पूर्व प्राचार्य गांव कनेक्शन को बताते हैं।

डॉ. कुशवाहा उसी बीआरडी मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य रह चुके हैं, आक्सीजन खत्म होने पर बच्चों की मौत पर हंगामा मचा है। वो उसी बीमारी की बात कर रहे हैं, जो पू्र्वांचल के कई जिलों के लिए मौत कही जाती है। हम आपको बताते हैं, पूर्वांचल में कोहराम बचाने वाली बीमारी के बारे में जो हर साल हजारों बच्चों की जान लेती है। इसने न जाने कितनी माताओं की गोद सूनी की है तो न जाने कितने बच्चे अस्पताल से घर तो लौट आए लेकिन दिव्यांगता का शिकार हो गए।

जापानी एंसेफेलाइटिस यानि दिमागी बुखार एक ऐसी बीमारी है जो मच्छर के काटने से होती है। इस बीमारी का वाहक जापानी एंसेफेलाइटिस वायरस (जेईवी) जिसे फ्लैवीवायरस भी कहते हैं, होता है जो डेंगू के संक्रमण का कारण भी होता है।

गोरखपुर मेडिकल कॉलेज के पूर्व प्रचार्य डॉ. केपी कुशवाहा के मुताबिक, ‘यह जीव जंतुओं और पक्षियों में मच्छर के जरिए फैलता रहता है। सुअर के खून में इसका प्रजनन सबसे तेज़ी से होता है। जब सुअर के खून से मच्छर किसी व्यक्ति में यह वायरस फैलाता है तो यह काफी घातक होता है। डॉ. केपी कुशवाहा बताते हैं कि इसका मच्छर धान के खेत में ही होता है वह घरों में नहीं आता।

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डब्यलूएचओ के आंकड़ों 2015 के अनुसार, जेईवी के कारण हर साल एशिया के कई देशों में लगभग 68,000 लोग इसका शिकार होते हैं जिनमें से 20,400 लोगों की मौत हो जाती है। जापानी एंसेफेलाइटिस का पहला मामला जापान में 1871 में दर्ज किया गया था। भारत में सबसे पहले 1955 में तमिलनाडु राज्य में इस बीमारी का पता चला था।

वैसे तो बिहार, उड़ीसा, झारखंड, पश्चिम बंगाल और देश के पूर्वोत्तर राज्यों के लोग भी इस बीमारी का शिकार होते हैं लेकिन पूर्वी उत्तर प्रदेश में बीमारी हर साल माहमारी के रूप में फैलती है। पिछले पांच दिनों में ही गोरखपुर में 60 बच्चों की मौत इस बीमारी से हो चुकी है।

पूर्वी उत्तर प्रदेश में 1978 में एक साथ 528 लोगों की इस बीमारी से मौत हुई थी, तभी पहली बार ये बीमारी यहां प्रकाश में आई थी। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, जनवरी 2005 से अक्टूबर 2014 के बीच पूर्वी उत्तर प्रदेश में कुल 6370 बच्चों की इस बीमारी से मौत हो चुकी है। 1978 से लेकर अब तक यहां पर 39,100 एंसेफेलाइटिस के मरीज भर्ती हुए और इसमें से 9286 बच्चों की मौत हो गई।

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क्या हैं बीमारी के लक्षण

इस बीमारी में रोगी को सिर दर्द के होता है वह बुखार होता है। इसके अलावा इसका कोई प्रत्यक्ष लक्षण नहीं होता। कुछ छोटे बच्चों में गर्दन में अकड़न, कंपकंपी, शरीर में ऐंठन जैसे लक्षण होते हैं।

इस तरह करें बचाव

इस बीमारी का वाहक मच्छर होता है इसलिए ज़रूरी यही है कि मच्छरों से बचाव किया जाए। इसके लिए घर में मच्छर और कीटनाशकों का छिड़काव करें। घर से बाहर निकलते वक्त खुद को ढक कर निकलें। सोते समय मच्छरदानी लगाएं। घर के आस-पास पानी का जमाव न होने दें। इसके साथ एंफेलाइटिस से बचाव के लिए वैक्सीन लगवाएं।

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