उत्तर प्रदेश

बलात्कारी बाबा का सबसे पहले भांडाफोड़ करने वाले पत्रकार के बेटे ने कहा-“मुझे गर्व है पिता का बलिदान व्यर्थ नहीं गया”

लखनऊ। "हमारे पिता ने जिस लड़ाई को लड़ते हुए बलिदान दिया, लेकिन कोर्ट के फैसले के बाद मुझे गर्व है कि पिता जी का बलिदान व्यर्थ नहीं गया," ये मनोभाव अंशुल छत्रपति के मन में उस वक्त थे जब सीबीआई कोर्ट ने गुरुमीत राम रहीम को सजा सुनाई।

अंशुल छत्रपति (36 वर्ष) उसी साहसी पत्रकार राजचंदर छत्रपति के बेटे हैं जिन्होंने अपने अखबार 'पूरा सच' में गुरुमीत राम रहीम का कच्चा चिट्ठा छापने का साहस दिखाया था, जिसकी कीमत उन्हें अपनी जान देकर चुकानी पड़ी थी। गाँव कनेक्शन से विशेष बातचीत में अंशुल ने बताया, "मैं उस समय 21 साल का था। पिता जी 24 अक्टूबर, 2002 को आफिस से घर शाम को पहुंचे, तो उस समय घर के बाहर गली में काम हो रहा था, पिता जी उसे ही देखने बाहर निकले थे, तभी दो लोगों ने उन्हें आवाज दी और गोली मार दी।"

ये भी पढ़ें- उस पत्रकार को भी जानिए, जिनकी हत्या का आरोप राम रहीम पर है, खोली थी बाबा के करतूतों की पोल

इसके बाद पत्रकार रामचंदर छत्रपति 28 दिन अस्पताल में भर्ती रहे, लेकिन पुलिस ने मजिस्ट्रेट के सामने उनके बयान नहीं दर्ज कराए। रामचंदर ने हमले के लिए डेरा प्रमुख का नाम भी लिया था, लेकिन एफआईआर में पुलिस ने उनका नाम तक शामिल नहीं किया।

जेल ले जाये जाते बाबा राम रहीम।

"पिताजी को जब धमकियां मिल रही थीं, तब उन्होंने सुरक्षा के लिए एसएसपी को लेटर भी लिखा था, लेकिन हुआ कुछ नहीं। पिताजी को सभी ने रोका था कि खतरनाक संगठन (डेरा सच्चा सौदा) है, इससे दूर रहो, लेकिन वह पीछे नहीं हटे और लगातार छापते रहे। वह अपनी खबरों में छाप रहे थे कि डेरे के अंदर सबकुछ ठीक नहीं है। पिताजी के खिलाफ डेरा की ओर से झूठा इस्तगासा (मजिस्ट्रेट से शिकायत) भी डाला गया।"

ये भी पढ़ें- आस्था के नाम पर हिेंसा करने का अधिकार किसी को भी नहीं: मोदी

रामचंदर छत्रपति पत्रकारिता में आने से पहले वकालत करते थे, इसके साथ-साथ कई अखबारों में लिखा भी करते थे। लेकिन वर्ष 2000 में अपना न्यूज पेपर 'पूरा सच' निकालना शुरू कर दिया। इसके बाद वह ऐसे मुद्दे उठाते रहे और कई लोगों की आंखों की किरकिरी बन गए।

''पिताजी के पास जब किसी साध्वी का लेटर पहुंचा तो उन्होंने इसे छापने का निर्णय लिया। इसके बाद 24 सितंबर, 2002 को पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने स्वत: संज्ञान लेते हुए जांच के आदेश दे दिए," अंशुल छत्रपति ने बताया।

तत्काली प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेई को संबोधित साध्वी के इस पत्र में बताया गया था कि डेरे के अंदर सब कुछ ठीक नहीं है। कैसे वहां काम कर रही साध्वियों को डेरे के मुखिया बाबा राम रहीम अपनी हवस का शिकार बनाते हैं।

ये भी पढ़ें- हरियाणा हिंसा : रेल, बस सेवाएं बहाल, डेरा मुख्यालय छोड़ रहे समर्थक

बलात्कारी बाबा गुरूमीत राम रहीम को उसके अंजाम तक पहुंचाने के लिए पत्रकार रामचंदर छत्रपति, सीबीआई जज गुरुदीप सिंह, दो साध्वियों के साहस को सलाम करने के साथ ही अंशुल की मां की हिम्मत की दाद देनी होगी। पति की मौत के बाद इस केस की पैरवी के लिए उन्होंने अपने बेटे को कभी पीछे नहीं खींचा।

स्वर्गिय पत्रकार राम चंदर छत्रपति।

"पिताजी की मौत के बाद मेरी मां ने मुझसे ये कभी नहीं कहा कि बेटा पीछे हट जाओ, खतरा है। हमने ही सबसे पहले हाईकोर्ट में इस केस की सीबीआई से जांच कराने के लिए याचिका दी थी," अंशुल ने कहा, "हम उन जज साहब की हिम्मत को सलाम करते हैं जिन्होंने ऐसा फैसला दिया। दो साध्वी जिन्होंने ऐसी हिम्मत दिखाई। ऐसे ही लोगों को देखकर लगता है कि सब कुछ खत्म नहीं हुआ है। इस फैसले से यह संदेश मिलता है कि हमारी न्यायिक प्रणाली इतनी कमजोर नहीं कि ऐसे पाखंडियों पर नकेल न डाली जा सके।"

पिता रामचंदर छत्रपति की मौत के बाद अंशुल ने वर्ष उनके द्वारा शुरु किए गए अखबार 'पूरा सच' को लगातार छापते रहे। लेकिन वर्ष 2014 में आर्थिक संकट के चलते उन्हें अखबार छापना बंद करना पड़ा।

ये भी पढ़ें- गुरमीत राम रहीम अब कैदी नंबर 1997, जेल में टहलते हुए कटी रात

अंशुल आगे बताते हैं, "इसी कोर्ट में मेरे पिताजी की हत्या का मुकदमा भी चल रहा है, जिसका फैसला 16 सितंबर, 2017 को आना है। लेकिन इस फैसले के बाद हमें न्यायिक प्रक्रिया पर पूरा भरोसा है।" रामचंदर छत्रपति की हत्या मामले में भी गुरुमीत राम रहीम आरोपी हैं।