यूपी की आधे से ज्यादा आबादी हर साल होती बीमार, केवल सरकारी अस्पतालों में 11 करोड़ मरीज

Rishi MishraRishi Mishra   12 Aug 2017 5:43 PM GMT

यूपी की आधे से ज्यादा आबादी हर साल होती बीमार, केवल सरकारी अस्पतालों में 11 करोड़ मरीजप्रदेश में करीब 200 बड़े सरकारी अस्पताल हैं।

लखनऊ। उत्तर प्रदेश, एक ऐसा प्रदेश जहां कुल आबादी के 50 फीसदी लोग हर साल केवल सरकारी अस्पतालों में इलाज के लिए जाते हैं। इस आंकड़े से अवगत होने के बावजूद मरीजों के लिए जरूरी संसाधनों को जुटाने में सरकार मीलों पीछे है। प्रदेश में करीब 200 बड़े सरकारी अस्पताल हैं। मगर गंभीर बीमारियों के इलाज की बात की जाए तो यूपी में ऐसे सरकारी अस्तपालों की संख्या एक दर्जन से अधिक नहीं है।

हजारों की संख्या में गांवों के आसपास स्वास्थ्य केंद्रों में सामान्य बीमारियों का इलाज करने में भी चिकित्सक हाथ खड़े कर देते हैं। प्रदेश में चिकित्सकों के सात हजार से अधिक पद खाली हैं। अब सरकार ने केंद्र सरकार के सामने गुहार लगाई है कि, उनको अधिक संसाधन उपलब्ध करवाए जाएं। ई हास्पिटल सेवा के तहत प्रदेश के 100 अस्पतालों को विकसित करने की तैयारी की जा रही है।

यह भी पढ़ें : गोरखपुर : पिछले चार दशक में इंसेफेलाइटिस से 10 हजार बच्चों की मौत

प्रदेश की आबादी 22 करोड़ हैं, जिसमें 11 करोड़ लोग हर साल सरकारी अस्पतालों में इलाज के लिए जाते हैं। लखनऊ के ट्रामा सेंटर जहां पूरे प्रदेश से गंभीर मरीजों को इलाज के लिए लाया जाता है, वहां रुई, पट्टी, बेटाडिन और थर्मामीटर ही वेलफेयर मेडिकल स्टोर से मिलते हैं। बाकी सभी महंगी दवाएं बाहर के मेडिकल स्टोर से ही मरीज खरीदते हैं।

चौक के 43 वर्षीय श्याम वर्मा की मां माया वर्मा का निधन करीब एक महीने पहले इसी ट्रामा सेंटर में हुआ था। उन्होंने बताया कि बहुत मुश्किल से उनको पहले ट्रामा सेंटर में बेड मिला। फिर ऑक्सीनज सिलेंडर के लिए संघर्ष शुरू किया। वह मिला तो उसके बाद में लगातार बाहर से महंगी दवाइयां लिखी गईं। कोई भी दवा ट्रामा के वेलफेयर मेडिकल स्टोर से नहीं मिल सकीं।

खुर्रम नगर के रहने राजेश विश्वकर्मा बताते हैं कि लखनऊ के ही बलरामपुर अस्पताल में उनकी मां को देखने के लिए चिकित्सक भर्ती होने के 24 घंटे बाद उपलब्ध हो सके। उनकी मां को वे नहीं बचा सके। ये दो बस नजीरें हैं, पूरे उत्तर प्रदेश में इस तरह से सरकारी अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों में ऐसी ही बदहाली आम है। हमने तो बात राजधानी की उठाई है। मगर जिलों में और सुदूर गांवों में तो और भी बुरा हाल है।

यह भी पढ़ें : गोरखपुर में कोहराम मचाने वाली वो बीमारी जिससे खाैफ खाते हैं पूर्वांचल के लोग

स्वास्थ्य महानिदेशालय के आंकड़ों के मुताबिक उत्तर प्रदेश के सरकारी अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों में प्रत्येक वर्ष 12 करोड़ मरीज आते हैं। बीमार होने वालों की आबादी उत्तर प्रदेश की कुल आबादी के 50 फीसद से भी ज्यादा है। अब तक सरकारें बीमारियों का इलाज करने के इतर लोग अस्पतालों तक कम से कम पहुंचे, इसका इंतजाम भी नहीं कर सकी हैं।

प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री सिध्दार्थनाथ सिंह ने बताया कि उनके अनुरोध पर केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने उत्तर प्रदेश के अन्दर 100 डिस्ट्रिक्ट हास्पिटल में ई-व्यवस्था का आश्वासन दिया, जिसमें टेक्नोलॉजी एवं ट्रेनिंग की व्यवस्था भारत सरकार का आई टी विभाग करेगा। सिद्धार्थ नाथ सिंह ने इस आश्वासन के लिए केन्द्र सरकार एवं विशेष रूप से रविशंकर प्रसाद व नड्डा का धन्यवाद दिया। उन्होंने कहा कि ई- हास्पिटल के कारण गांव से जिला अस्पताल आने वाले व्यक्तियों को काफी लाभ होगा। मरीजों को पहले से ही डाक्टर से मिलने का समय मिल जायेगा और उन्हें इंतजार भी नही करना पड़ेगा। साथ ही साथ डायग्नोस्टिक रिपोर्ट भी उपलब्ध हो जायेंगी।

उप्र में हर साल फैलने वाली संक्रामक बीमारियां

डेंगू (लखनऊ, कानपुर, बाराबंकी, सीतापुर, पश्चिम उत्तर प्रदेश), इन्सेफ्लेलाइटिस (पूर्वांचल), स्वाइन फ्लू, बर्ड फ्लू, पीलिया, डायरिया जैसे रोग प्रत्येक वर्ष उत्तर प्रदेश में फैलते हैं। अकेले राजधानी लखनऊ में पिछले वर्ष डेंगू के चलते करीब 150 मौतें हुई थीं। इस साल प्रदेश में स्वाइन फ्लू से 10 के करीब जानें जा चुकी हैं।

उत्तर प्रदेश सरकार ने आज कहा कि राज्य के शासकीय अस्पतालों में इस समय 7348 डाक्टरों की कमी है और इन रिक्त पदों को भरने की दिशा में कार्यवाही की जा रही है। प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री सिद्धार्थनाथ सिंह ने करीब दो महीने पहले विधान परिषद में सपा सदस्य शशांक यादव के प्रश्न के जवाब में ये बताया था। राज्य में चिकित्सकों के 18 हजार 382 पद सृजित हैं। जबकि केवल 11 हजार 34 पद ही भरे हैं। इस प्रकार कुल 7348 डाक्टरों की कमी है।

यह भी पढ़ें : चिकित्सा मंत्री बोले- गैस की कमी से नहीं हुई बच्चों की मौत, BRD कॉलेज के प्रिंसिपल निलंबित

उन्होंने बताया था कि इस समय लोकसेवा आयोग के माध्यम से सरकारी डाक्टरों की नियुक्ति की जाती है। इतनी बडी संख्या में चिकित्सकों की कमी होने के मद्देनजर अब यह देखने वाली बात है कि जब लोकसेवा आयोग अपेक्षित संख्या में भर्तियों की प्रक्रिया नहीं कर पा रहा था तो सम्बन्धित नीति में बदलाव क्यों नहीं किया गया। इस पर नेता प्रतिपक्ष अहमद हसन ने आरोप लगाया कि मंत्री ने सदन को ठीक जानकारी दी लेकिन वह कुछ छिपा भी रहे हैं।

राज्य की पूर्ववर्ती अखिलेश यादव सरकार ने चिकित्सकों की कमी से निपटने की दिशा में बहुत काम किया। मेडिकल कालेजों में सीटों की संख्या दोगुनी की और चिकित्सकों की सेवानिवृत्ति की आयु 60 से बढाकर 65 वर्ष की। हालांकि इसके बावजूद समस्या बनी हुई है और इस पर काम करने की जरुरत है। वर्ष 2011 में राज्य में चिकित्साधिकारियों के 2090 पदों पर भर्ती की प्रक्रिया शुरु हुई थीए जिनके सापेक्ष 1784 अभ्यर्थियों का चयन हुआ थाए मगर उनमें से भी केवल 608 ने ही तैनाती ली थी। जिस वक्त यह प्रक्रिया मुकम्मल हुईए उस समय अखिलेश सरकार सत्ता में आ चुकी थी।

यूपी की सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं पर एक नजर

  • प्रदेश के सरकारी अस्पतालों कुल मरीज 11 करोड़ प्रति वर्ष
  • कुल बड़े सरकारी अस्पताल 200
  • प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र 3600
  • सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र 800
  • अन्य छोटे स्वास्थ्य केंद्र 1000
  • प्रदेश में कुल सरकारी चिकित्सक 12000

हम हर तरह से बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं देने की कोशिश कर रहे हैं। प्रदेश में हजारों की संख्या में नये चिकित्सकों की भरती जल्द की जाएगी। इसके अतिरिक्त अस्पतालों में ई सेवाओं को दुरुस्त किया जा रहा है। नये केंद्र भी बनाए जाएंगे। टीकाकरण कार्यक्रम भी तेजी से संचालित किये जा रहे हैं।
सिध्दार्थनाथ सिंह, स्वास्थ्य मंत्री, उप्र

More Stories


© 2019 All rights reserved.

Top