उत्तर प्रदेश विधान सभा के अध्यक्ष बनें हृदय नारायण दीक्षित, बोले अंग्रेजों की परंपरा करें खत्म 

उत्तर प्रदेश विधान सभा के अध्यक्ष बनें हृदय नारायण दीक्षित, बोले अंग्रेजों की परंपरा करें खत्म हृदय नारायण दीक्षित।

लखनऊ। भगवंतनगर उन्नाव से विधायक बने भाजपा के वरिष्ठ नेता ह्दयनारायण दीक्षित बृहस्पतिवार को विधानसभा के अध्यक्ष चुन लिये गये। वो निर्विरोध अध्यक्ष निर्वाचित किये गये हैं। चुने जाने के बाद उन्होंने कहा कि सभा की गरिमा और महिमा हमेशा बनी रहे, इसकी वे कामना करते हैं। इसके साथ ही अंग्रेजों के समय से चल रही विधानसभा अध्यक्ष को खोज कर आसान पर बैठाने की परंपरा को खत्म करने का अनुरोध भी उन्होंने किया।

नामांकन के बाद बुधवार को ही ह्दयनारायण दीक्षित का विधानसभा में अध्यक्ष चुना जाना तय था। दोपहर एक बजे चुनाव शुरू होने तक किसी और नामांकन नहीं किया, जिसके बाद दीक्षित के नाम पर मुहर लगा दी गई। अध्यक्ष चुने गए हृदय नारायण दीक्षित ने कहा कि आप सबका अत्यधिक आभार, साथ ही उन्होंने पूर्व में चली आर ही यूरोपीय परिपाटी जिसमें की अध्यक्ष कहीं छुप जाया करता था और नेता सदन, नेता प्रतिपक्ष के साथ उन्हें ढूंढ़ कर लाते थे। अध्यक्ष के आसन पर बिठाने के लिए, उस परिपाटी को अब बदलने की आवश्यकता बतायी। उन्होंने कहा कि ऐसा नहीं कि मैं उस परिपाटी का विरोध करता हूँ, परंतु आज के समय में इस की आवश्यकता नहीं है।

उन्होंने कहा कि जब कभी सभा का महत्त्व घटता है, सभा की शक्ति कम होती है। तब महाभारत जैसे युद्ध की स्थिति बनती है। सभा की गरिमा, सभा की महिमा पूरे देश में वाद-संवाद और निपुणता के लिये जानी जाए ऐसी मेरी कामना है। आम जनता जोकि सभी कामों की कुंजी विधायक को मानती है, और संसदीय नियमावली को अपनी अपेक्षाओं के सामने रखकर नहीं सोचती, इस सदन की जिम्मेदारी उनकी आशाओं के लिये काम करना रहा है। आज हम यहां बैठकर जो भी बातचीत कर रहे हैं, या हंस मुस्कुरा रहे हैं, यह सब जनता देख रही है, इसलिए किसी सरकार का नाम लिए बिना मई आज पहले दिन ही चाहूंगा कि पूर्व में इस सदन में पूर्व में हुए अप्रिय और सदन की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाली स्थिति अब न बने।

अध्यक्ष ने कहा कि आपने पढ़ा होगा कि भारतीय परंपरा में जब काग भुसुंडि और गरुड़ जो पक्षी के रूप में उल्लिखित हैं आपस में बिना लड़ाई के बात-विवाद संवाद कर सकते हैं, तो हम सभी जो लाखों जनाकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं बिना लड़े संवाद क्यों नहीं कर सकते। नए सदस्यों के लिये उन्होंने कहा कि उन्हें थोड़ा पढ़ना जरुर चाहिए, विधानसभा की लाइब्रेरी बहुत शानदार और समृद्ध है, तथा वहां की पुस्तकें और कुर्सियां उदास होकर भी आप सब का इंतज़ार करती हैं। क्योंकि सदस्य प्रायः वहां कम ही जाते रहे हैं। अंत में उन्होंने कहा कि मैं शीश झुकाकर सभी का आभार प्रगट करते रहे हैं।

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