अब कागजों पर नहीं खोदे जा सकेंगे मनरेगा के तालाब, जियोटैगिंग के जरिए जनता भी देखेगी कहां, कितना हुआ काम

Shefali SrivastavaShefali Srivastava   25 April 2017 3:51 PM GMT

अब कागजों पर नहीं खोदे जा सकेंगे मनरेगा के तालाब, जियोटैगिंग के जरिए जनता भी देखेगी कहां, कितना हुआ कामजियो टैगिंग के जरिए एक करोड़ परिसंपत्ति को किया गया टैग।   फोटो: विनय गुप्ता

लखनऊ। इसरो और एनआरएससी की मदद से अब आम लोग भी मनरेगा के कार्यों की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। यानी अब सिर्फ कागज़ पर ही तालाब नहीं खोदे जाएंगे बल्कि किसी खास क्षेत्र में मनरेगा के तहत क्या काम हुआ है, उसकी लागत और काम पूरा होने के बाद उसका स्वरूप क्या है इन सबको आप जियोटैग के जरिए देख सकते हैं।

मनरेगा के जरिए ग्रामीण इलाकों में तालाब खुदवाने से लेकर सड़क बनवाने तक तमाम काम कराए जाते हैं, इन पर करोड़ों रुपये की लागत भी आती है, बावजूद इसके कई बार वो तालाब जमीन पर नहीं दिखते थे, मनरेगा में फर्जीवाड़ा से कागजों ही काम कराया जा रहा था लेकिन अब ऐसा नहीं हो सकेगा, कौन सा तालाब कब बनकर तैयार हुआ या किस पर काम हुआ, इसकी पूरी जानकारी ऑनलाइन होगी। सरकारी अधिकारी ही नहीं आम आदमी भी अपने इलाके में हो रहे काम को देख सकेंगे। सरकार ने इसके लिए तकनीकी का सहारा लिया है।

दरअसल पिछले साल केंद्र सरकार ने मनरेगा के तहत होने वाले कार्य व संपत्तियों पर नज़र रखने के लिए ऑनलाइन रिकॉर्डिंग व मॉनीटरिंग के प्रभावी मानचित्रण पर जोर दिया था। इसके लिए इसरो ने एक महत्वाकांक्षी योजना बनाई। इसरो के वैज्ञानिकों ने 28 जिलों में एक पायलट प्रोजेक्ट के तहत जियो-मनरेगा के तहत कामकाज की बेहतर निगरानी के लिए इंडियन रिमोट सेंसिंग सैटेलाइट से हजारों हाई-रिज़ोल्यूशन तस्वीरें लेनी शुरू कीं और उन्हें जियो-टैग किया गया।

उत्तर प्रदेश में मनरेगा के जॉइंट कमीशनर एसके चंदेल बताते हैं कि मनरेगा की रचनाओं के फोटोग्राफ को जियोटैग टेक्नीक के जरिए यह पता किया जा सकता है कि कितने अक्षांश और देशांतर में मनरेगा में कौन सा काम कराया गया है और कार्य पूरा होने के बाद उसका स्वरूप क्या है, यह सब अब उस फोटो में दिखेगा। साथ ही मनरेगा कार्यों में क्या लागत आई है इसका बोर्ड भी लगा हुआ दिखेगा।

ये इस बात का सबूत है कि मनरेगा में स्थायी परिसंपत्तियों का सृजन हो रहा है जिसे कोई भी देख सकता है। कोई डुप्लीकेसी न हो, एक काम हो जाए उसके बाद कोई उसे दोबारा नहीं करा सकता।
एसके चंदेल, जॉइंट कमीशनर, मनरेगा

पिछले वर्ष महोबा जिले में तालाबों की खुदाई के दौरान ही इस संबंध में काम शुरू कर दिया गया था। फोटो- विनय गुप्ता

अब तक इस टेक्नीक की मदद से करीब एक करोड़ संपत्ति को जियोटैग किया गया है। खास बात ये है कि अब इसे पब्लिक डोमेन में डाल दिया गया है जहां आम लोग भी देख सकते हैं।

इस बारे में एसके चंदेल बताते हैं कि ये इस बात का सबूत है कि मनरेगा में स्थायी परिसंपत्तियों का सृजन हो रहा है जिसे कोई भी देख सकता है। इसके साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाएगा कि मनरेगा कार्य की किसी तरह कोई डुप्लीकेसी न हो, यानी एक बार काम हो जाने के बाद उसे दोबारा नहीं कराया जा सकता। एसके चंदेल आगे बताते हैं कि और उस अक्षांश और देशांतर से उस प्रकृति का दोबारा काम नहीं कराया जा सकता क्योंकि उसकी आईडी ही जनरेट नहीं होगी।

महोबा में ही एक प्राचीन तालाब की खुदाई करते लोग।

30 लाख रचनाओं का होता है निर्माण

मालूम हो कि देश में मनरेगा के तहत साल में 30 लाख रचनाओं का निर्माण होता है। इन लाखों निर्माण कार्यों की बेहतर निगरानी के लिए सरकार ने पिछले साल इन सबका डाटाबेस बनाने की इच्छा जाहिर की।

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