पूर्वांचल में आज भी खुले में शौच के वक्त महिलाएं नहीं ले जाती पानी 

Neetu SinghNeetu Singh   19 Nov 2017 7:47 PM GMT

पूर्वांचल में आज भी खुले में शौच के वक्त महिलाएं नहीं ले जाती पानी पूर्वांचल में महिलाएं खुले में शौच के दौरान नहीं ले जाती हैं पानी 

स्वच्छ भारत अभियान में जहाँ सरकार एक तरफ शौचालय निर्माण पर जोर दे रही हैं वहीं दूसरी तरफ पूर्वांचल के कई जिलों में महिलाओं के द्वारा शौच के दौरान पानी न ले जाना सदियों पुरानी परम्परा आज भी बरकरार है। आज विश्व शौचालय दिवस पर हर जगह शौचालय निर्माण को लेकर कार्यक्रम हो रहे हैं। पूर्वांचल की ये महिलाएं इस बात से पूरी तरह से बेखबर हैं कि खुले में शौच के दौरान पानी न ले जाने से वो कई तरह की बीमारियों की शिकार हो रही हैं।

बलिया जिले से 30 किलोमीटर दूर गढ़वाल ब्लॉक से पश्चिम-उत्तर दिशा में बहादुरपुर गाँव में रहने वाली शकुंतला शर्मा (45 वर्ष) का कहना है, “अगर पानी लेकर जाएंगे तो सबको पता चल जाएगा कि हम कहाँ जा रहे हैं, हमारे यहां कभी कोई पानी लेकर नहीं जाता, पानी लेकर जाना बहुत ही शर्म की बात मानी जाती है, पानी ले जाना हमारी आदत में नहीं है।” शकुन्तला आज भी इस बात से अनजान है कि पानी न ले जाने से बीमारी भी हो सकती है।

जब उनसे ये पूछा गया कि क्या तुम्हे कोई बीमारी है जिससे तुम परेशान हो, तो इस सवाल के जबाब में उन्होंने कहा, “मुझे कई वर्षों से सफेद पानी की दिक्कत है, सफेद पानी से सिर्फ मैं ही नहीं हमारे आसपास के ज्यादातर लोग ल्यूकोरिया से परेशान है। डाक्टर को भी दिखा रहे हैं पर अभी तक ठीक नहीं हुआ है, पर ये हमने कभी नहीं सोचा कि पानी न ले जाने से ये बीमारी हुई है, किसी भी महिला में सफेद पानी निकलना हमारे यहाँ सामान्य बात मानी जाती है।” ये सोचना पूर्वांचल की सिर्फ शकुंतला शर्मा का नहीं है बल्कि यहां की ज्यादातर महिलाएं यही सोचती हैं और ल्यूकोरिया जैसी गम्भीर बीमारी से परेशान हैं।

बहराइच के एक गांव में महिलाओं की बैठक।

विश्व स्थास्थ्य संगठन और यूनिसेफ की रिपोर्ट के मुताबिक, गांवों में 65 प्रतिशत से ज्यादा लोग खुले में शौच जाते हैं। प्रदेश के मुख्यमंत्री ने ये घोषणा की है कि वर्ष 2018 तक पूरे प्रदेश को खुले में शौच मुक्त करा देंगे जबकि वर्तमान समय में छह जिले ही शौच मुक्त हुए हैं। मुख्यमंत्री की घोषणा के बात पूर्वांचल के लोगों की उम्मीदें जरूर बढ़ गयी हैं कि अब उनका खुले में शौच जाना जल्द ही बंद होगा। जिससे वो कई तरह से होने वाली अनचाही बीमारियों से बच सकेंगी।

बलिया जिले के पंचायत राज अधिकारी अभी कुमार यादव ने गाँव कनेक्शन को फोन पर बताया, “खुले में शौच के दौरान पानी न ले जाना सिर्फ बलिया जिले की बात नहीं है, पूर्वांचल के जितने भी जिले हैं वहां की ये सदियों पुरानी प्रथा है। ये यहाँ का कल्चर है और इसे परिवर्तन करने में अभी समय लगेगा। हमारी तरफ से पूरा प्रयास किया जा रहा है कि जिला जल्द से जल्द से खुले से शौच मुक्त हो।” उन्होंने आगे कहा, “जिले में 85 मास्टर ट्रेनर हैं और 185 टीमें हैं, हर ब्लॉक में सात से आठ टीमें हैं जो गाँव-गाँव जाकर लोगों को जागरूक करने का काम कर रहे हैं। अभी जिले में 50 प्रतिशत शौचालय निर्माण हुआ है कोशिश है जल्द ही जिला शौच मुक्त हो जाये।”

भारत की 2011 की जनगणना के अनुसार गांवो में 67 प्रतिशत और शहरो में 13 प्रतिशत परिवार खुले में शौच करते हैं। गैरसरकारी संगठन रिसर्च इंस्टीटीयूट ऑफ कंपेशनेट इकोनामिक्स के मुताबिक देश के 40 प्रतिशत जिन घरो में शौचालय है इसके बावजूद उनमे से प्रत्येक घर से एक सदस्य नियमित रूप से खुले में शौच के लिए जाता है। पूर्वांचल जैसे क्षेत्र में सरकार को शौचालय निर्माण से ज्यादा इनकी सोच परिवर्तन पर ध्यान देना होगा जिससे ये कई तरह की बीमारियों से बच सकें।

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बलिया के उपमुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ संजय सिंह ने कहा, “यहाँ महिलाओं में इन्फेक्शन के बहुत ज्यादा खतरे रहते हैं, साफ़-सफाई न रखने की वजह से इन्हें कई तरह की बीमारियाँ हो जाती हैं, यूटीआई के चांसेज भी बढ़ जाते हैं। औरतों में ल्यूकोरिया भी बहुत ज्यादा है लेकिन ये कह पाना मुश्किल है कि ये शौच के दौरान पानी न ले जाने की वजह से है।”

बहादुरपुर गाँव की गायत्री पटेल ने कहा, “अगर दिन में शौच जाना होता है तो बहुत मुश्किल होती है, सुबह चार बजे जातें हैं और रात में अँधेरे होने का इन्तजार करते हैं, दिन में डर की वजह से कई बार भरपेट खाना नहीं खाते हैं। घर के अंदर शौचालय बनवाना यहाँ अभी भी गंदगी से जोड़ा जाता है। बरसात के दिनों में बहुत परेशानी होती है क्योंकि खेतों में पानी भर जाता है, सड़क के किनारे ही सभी लोग बैठते हैं, दिन में सड़क पर आवागमन बहुत ज्यादा रहता है इसलिए दिन में नहीं जा पाते हैं।”

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गोरखपुर जिले के खजरी ब्लॉक के कटघर गाँव में रहने वाली महिला समाख्या की अनारकली (35 वर्ष) का कहना है, “हमारे यहां महिलाएं पानी लेकर इसलिए नहीं जाती हैं क्योंकि उन्हें लगता है पुरुषों को पता चल जाएगा कि हम शौच करने जा रहे हैं तो ये उनके लिए शर्म की बात होती है, अगर पानी लेकर नहीं जाते तो किसी को पता नहीं चलता कि हम खेत में काम करने जा रहे हैं या फिर शौच।”

बलिया जिले से 27 किलोमीटर दूर गढ़वाल ब्लॉक से पश्चिम दिशा में रतसर न्याय पंचायत की ग्राम प्रधान स्मृति सिंह (23 वर्ष) का कहना है, “हमारी पंचायत में 35 हजार आबादी है पर एक भी सरकारी शौचालय ऐसे नहीं बने है जिनका इस्तेमाल किया जा सके, अब नये ढंग से काम शुरू हुआ है, जबसे हमारा जन्म हुआ है तबसे लोगों को खुले में जाते और पानी न ले जाते देखा है।” उनका कहना है, “इस बार जब स्वच्छ भारत अभियान इतनी तेजी से चल रहा है हो सकता है पूर्वांचल की स्थिति बेहतर हो, यहां की महिलाएं और लड़कियाँ बीमार रहती हैं, ल्यूकोरिया की शिकायत तो ज्यादातर सभी को है पर उन्हें ये पता नहीं कि ये शौच के दौरान पानी न ले जाने से है।”

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