लखनऊ बना ‘मोगली गर्ल’ का नया आशियाना 

लखनऊ बना ‘मोगली गर्ल’ का नया आशियाना रेनू और माया के साथ मोगली गर्ल।

बहराइच। जिले के कतर्नियाघाट सेंचुरी के जंगलों में मिली आठ साल की‘मोगली गर्ल’को जिला अस्पताल से छुट्टी मिल गई। अब उसका नया घर नवाबों का शहर लखनऊ होगा।

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जुवेनाइल कोर्ट ने ‘मानसिक मंदता’ को ध्यान में रखते हुए मोगली गर्ल यानी वन दुर्गा (डीएम द्वारा दिया गया नाम) को लखनऊ के जानकीपुरम स्थित दृष्टि सामाजिक सेवा संस्थान में भेजने का फैसला किया है। चाइल्ड लाइन ने उसे लखनऊ ले जाने की हामी भरी थी जहां उसे बाकी बच्चों के साथ रखा जाएगा जिससे कि वह इंसानों जैसा व्यवहार करना सीखे। इसके साथ ही उसका कुशल मानसिक चिकित्सकों से इलाज भी कराया जाएगा।

जिला अस्पताल की स्वीपर रेनू और माया, मोगली की करीबी थीं। इनके साथ अस्पताल कर्मियों के चेहरे भी मोगली के जाने से मायूस हुए। मीडिया के सवाल पर रेनू ने कहा, “ढाई महीने से मैं और माया ही इसकी सेवा कर रही हैं। आज लग रहा है, जैसे मेरी बेटी मुझसे अलग हो रही है।” मोगली के लखनऊ रवाना होने के बाद डॉ. सिंह ने भी कहा, “आज वह लखनऊ जा रही है। कुछ अच्छा नहीं लग रहा है। मैं और मेरे स्टाफ ने उसका अपनी बेटी से ज्यादा ख्याल रखा।” डॉ. सिंह ने स्वीपर रेनू और माया को मोगली की अच्छी देखरेख के लिए एक-एक हजार रुपए का पुरस्कार दिया है।

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कतर्नियाघाट सैंक्चुअरी के मोतीपुर रेंज के एसआई सुरेश यादव को 25 जनवरी को यह बच्ची जंगल में बंदरों से घिरी मिली थई। सुरेश ने जब बच्ची को अपने साथ लाना चाहा तो बंदर विरोध पर उतर आए और चीखना शुरू कर दिया। बच्ची भी पुलिसकर्मियों को देख बंदरों की तरह चीखने लगी, लेकिन पुलिसकर्मियों ने कड़ी मशक्कत के बाद उसे साथ लिया और जिला अस्पताल लाकर भर्ती कराया। बच्ची न तो इंसानी भाषा समझ पाती है और न ही बोल पाती है।

ढाई महीने के दौरान उसके व्यवहार में कुछ बदलाव आया है। उसका इंसानों से डरना कुछ कम हुआ है। अब खड़े होकर पैरों के बल चलना सीख गई है, लेकिन कभी-कभी हाथों और पैरों के बल भी चलती है और अभी भी बंदरों की तरह आवाजें निकालती है।

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