दाल में नमक कम हुआ तो तलाक? अब नहीं होगा

Neetu SinghNeetu Singh   30 Aug 2017 4:51 PM GMT

दाल में नमक कम हुआ तो तलाक? अब नहीं होगामंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने एक साथ तीन तलाक को असंवैधानिक बताया था (फोटो : गांव कनेक्शन)

स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क

लखनऊ। क्या घर पर की गई छोटी सी गलती के कारण मिनटों में तलाक़ दे दिया जाएगा? लाखों मुस्लिम महिलाएं वर्षों से इसी डर में जीती रही हैं। सर्वोच्च न्यायालय के तीन तलाक पर फैसले के बाद शायद उन्हें उम्मीद है कि उन्हें सम्मान से जिन्दगी जीने का हक़ मिल जाएगा।

“पहली बार कोई ऐसा फैसला आया है जिसमें हमें आजादी का अहसास महसूस हो रहा है, इस फैसले के बाद हर उस आख़िरी महिला को जिन्दगी जीने का अधिकार मिलेगा जो अपने ही घर में हर छोटी सी गलती पर डरी सहमी रहती थी। ” लखनऊ के कैसरबाग में रहने वाली हमीदा खातून ने गाँव कनेक्शन को बताया, “जो भी कानून बने वो किसी मजहब हो ध्यान में रखकर न बने, महिलाओं के संवैधानिक अधिकारों को ध्यान में रखकर कानून बने तो अच्छा रहेगा।”

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भारत में हजारों महिलाओं को सिर्फ तीन बार “तलाक” कह कर घर से निकाल दिया जाता है लेकिन अब तक ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड समेत अन्य मुस्लिम संस्थाओं ने इस मुद्दे पर किसी भी बहस को मुस्लिम समाज के शरियत से जुड़े कानूनों पर आघात माना है। सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद पहली बार एक बार में कहे गए तीन तलाक़ को एक धार्मिक मुद्दे के बजाय महिलाओं के मानवाधिकारों से जुड़े मुद्दे के रूप में स्वीकारा गया है।

ऑल इंडिया मुस्लिम महिला ला बोर्ड की अध्यक्ष और तीन तलाक को लेकर लंबी लड़ाई लड़ने वाली शाइस्ता अंबर बताती हैं, “दाल में नमक कम हुआ तो तलाक, थोड़ी सी बात तो तलाक। किसी ने पत्नी की तारीफ कर दी तो तलाक, मैसेज, फेसबुक और ईमेल पर तलाक.. कब तक सहें महिलाएं। ये फैसला महिलाओं की आजादी के हक में है। सुप्रीम कोर्ट का ये फैसला हौसला बढ़ाने वाला है और मैं मांग करती हूं कि सरकार हिंदू मैरिज एक्ट की तरह शरियत को ध्यान में रखकर मुस्लिम के लिए भी कानून बनाए।”

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अजरा खातून (35 वर्ष) एक तलाक शुदा महिला है वो अपनी जिन्दगी का अनुभव साझा करते हुए बताती हैं, “ पहले कई साल मारपीट, गाली-गलौच का सिलसिला चला, फिर एक दिन उसने (पति) ने तलाक दे दिया। मेरे हाथ में कुछ था नहीं, दो बच्चे थे। उनके लिए कुछ करना था तो काम करने लगी, पैसे भी कमाने लगी थी, कुछ साल बाद शौहर मांफी मांगते हुए मेरा पास आ गया लेकिन दुनियावाले (घर और रिश्तेदार) वाले बिना हलाला राजी नहीं थे। मैंने साफ कह दिया, रहना है तो ऐसे ही वर्ना नहीं और मैंने उन्हें रख लिया।”

रख लिया शब्द इसलिए महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि इस बार अजरा ने बहुत कुछ दांव पर लगाया था। वो कहती हैं, “घर वालों ने बोलना बंद कर दिया और कई लोगों ने ताने मारे कि ये अधर्म है। लेकिन मुझे वो ठीक लगा था क्योंकि वो तलाक ही अवैध था, जिसमें धर्म के अनुसार कुछ हुआ ही नहीं था।” अजरा के मुताबिक कुछ दिनों बाद उनका पति उन्हीं हरकतों पर उतर आया था और इस बार मैंने उसे निकाल दिया। अजरा अब सद्भभावना ट्रस्ट के साथ जुड़कर ऐसी तमाम महिलाओं को उनका हक दिलाने के लिए लड़ाई लड़ती हैं।

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ऑल इंडिया मुस्लिम महिला ला बोर्ड की सदस्य आयशा सुम्भुल (32 वर्ष) ने कहा, “हमने बहुत से केस देखे हैं ... एक छोटी सी गलती के पीछे एक झटके में महिला को घर से बाहर कर दिया जाता है। एक मुस्लिम महिला की जिन्दगी हमेशा असुरक्षित रहती थी उसे कब अपने घर से बाहर होना पड़े उसे खुद भी नहीं पता होता था।” वो आगे बताती हैं, “इस फैसले के बाद उन महिलाओं को राहत जरूर मिलेगी जो तीन तलाक की शिकार नहीं हुई हैं, पर जो इस पीड़ा को झेल रही है शायद उन्हें भी खुशी होगी क्योंकि उनकी तरह लाखों महिलाओं की जिन्दगी अब बर्बाद नहीं होगी।” वो आगे बताती हैं।

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डालीगंज के खदरा गाँव में रहने वाली शाजिया (27 वर्ष) की बड़े अरमानों से 2008 में शादी हुई थी। जिन्दगी में सबकुछ ठीक चल रहा था, दो बच्चे भी हो गए थे। इनके शौहर की जिन्दगी में चार महीने पहले कोई दूसरी लड़की आ गई और बिना किसी गलती के हर महीने एक तलाक देकर तीन महीने में छोड़ दिया और दूसरा निकाह कर लिया। शाजिया गुमसुम सी खामोश सोफे पर बैठी थी, उन्होंने गाँव कनेक्शन को बताया, “उनकी जिन्दगी में कोई और आ गया और उन्होंने मुझे तलाक दे दिया और मेरे दोनों बच्चे भी ले लिए। मेरे माँ-बाप नहीं है अभी भाई के साथ रहते हैं, केस मैंने इसलिए नहीं किया क्योंकि उस आदमी की मैं अब शक्ल भी नहीं देखना चाहती हूं।” सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद शाजिया के चेहरे पर मुस्कराहट नहीं आई क्योंकि उनकी जिन्दगी तो वीरान हो गयी है पर अब उनके जैसी कई शाजिया तलाक का शिकार अब नहीं होंगी।

महिला समाख्या की कहकशा परवीन बताती हैं, “छह महीने के लिए ही क्यों ये तो अब हमेशा के लिए बंद हो जाना चाहिए, इस्लाम तो हमे बराबरी की जिन्दगी जीने का हक़ देता है। मुझे लगता है तलाक देने में भी कहीं न कहीं पित्रसत्तात्मक सोंच ही हावी रहती है जिसे जब चाहे पुरुष दे सकता है।” वो आगे बताती हैं, “इस फैसले के बाद हमे लगता है जो पुरुषवादी सोंच हम पर पूरी तरह से हावी थी उसमे जरुर कमी आयेगी, एक महिला को उसकी छोटी सी गलती के लिए अब घर से बाहर नहीं निकाला जाएगा।”

वहीं डालीगंज में रहने वाली नसरीन (35वर्ष) बताती हैं, “बर्तन साफ़ से नहीं धुले, खाने में नामक नहीं पड़ा, किसी ने तुम्हारी तारीफ़ कैसे कर दी। शक के दायरे में भी कभी-कभी एक झटके में तलाक दे दिया जाता है। एक छोटी से गलती के पीछे जिसे माफ़ किया जा सकता है या नजरअंदाज किया जा सकता है पर ऐसा न करके उसे सिर्फ तलाक दे दिया जाता है।” वो आगे बताती हैं, “कमसेकम इस फैसले के बाद अब महिलाएं अपने घर में सकून से रह सकेंगी, अब उन्हें हलाला जैसी तकलीफ से होकर नहीं गुजरना पड़ेगा, सरकार के इस फैसले से वो हर मुस्लिम महिला खुश होगी जिसे लगता था तलाक देना और हलाला करना उसके अधिकारों का हनन है, आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाना है।”

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