घूर में जिस बच्ची को छोड़ा गया, उसने मरने से इंकार कर दिया

घूर में जिस बच्ची को छोड़ा गया, उसने मरने से इंकार कर दियासीतापुर में मिली नवजात बच्ची।

सीतापुर। कड़ाके की सर्दी में गुरगुजपुर गांव के दीपक कुमार रजाई में दुबके हुए थे। दीपक के आधी रात के आसपास उन्हें किसी बच्चे के रोने की आवाज आई। दीपक बताते है, “मैं अपनी मां साथ आवाज की वाली जगह पर पहुंचा और टार्च लगाकर देखा तो घूरे (कूड़ा-करकट) में दबे दो पैर दिख रहे थे। लड़की थी, शायद पता नहीं कौन छोड़ गया।”

बच्ची अपनी किस्मत लेकर आई

बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ वाले देश में एक बच्ची को मरने को हड्डियां गलाने वाली सर्दी में खुले आसमान के नीचे फेंका गया था। लेकिन बच्ची शायद अपनी किस्मत लेकर आई थी और पूरी तरह स्वस्थ है। दीपक कुमार का गांव दिल्ली से करीब 500 किलोमीटर दूर सीतापुर के रेउसा इलाके में है। नरेंद्र मोदी सरकार गिरते लिंगानुपात को देखते हुए बच्चियों के जन्म होने पर कई सुविधाएं देती हैं। लेकिन सीतापुर के इस गांव तक शायद सुकन्ना समृद्धि जैसी कोई योजना नहीं पहुंची।

बच्ची की जन्मनाल तक नहीं कटी थी

गुरगुजपुर गांव के लोगों के मुताबिक बच्ची आसपास के किसी घर की होगी। देररात से लेकर रविवार शाम तक लोग इस बच्ची के परिजनों को कोसते रहे। दीपक कुमार बताते हैं, बच्ची की जन्मनाल तक नहीं कटी थी, पूरा शरीर अकड़ा था,मेरी अम्मा (60 वर्ष की श्यामपति) ने कपड़ों सीने से लपेट कर रखा और रातभर हम लोगों ने आग में तपाया। मामले की जानकारी होने पर स्वास्थ्य विभाग की टीम बच्ची को सामुदायिक स्वास्थ केंद्र ले गई। जहां से देरशाम उसे बालगृह भेज दिया गया। सीतापुर के आशा ज्योति केंद्र की फैसिलिटेर रामलली बताती हैं, “ सिर्फ 2 किलो वजन था, टीकाकरण के बाद उसे बालगृह भेज दिया गया है।” (नीचे वीडियो देखिए)

ये ख़बर उसी यूपी से है जहां लड़कियां की संख्या लड़कों के अपेक्षा काफी कम है। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के सांख्यिकी रिपोर्ट के मुताबिक 0 से 6 साल की उम्र के प्रत्येक 1000 लड़के के अनुपात में लड़कियों की संख्या घटकर 902 रह गई है (2011 की जनगणना के मुताबिक), जबकि 2001 में 916 थी, 1991 में 927 और 1981 में 935 थी।

समय रहते रोने की आवाज सुन ली

इस बच्ची की किस्मत अच्छी थी कि समय रहते किसी ने उसकी रोने की आवाज सुन ली। कूढे के ढेर, तालाब, पोखरों, अस्पतालों की सूनसान जगहों पर बच्चियों के शव मिलना आम बात है। ये अनचाही बच्चियां और उनके शव बताते हैं किसी न किसी रुप में कन्ना भ्रूण हत्या जारी है। लेकिन अगर इन बच्चियों के माता-पिता थोड़ी समझदारी दिखाएं तो न ऐसी बच्चियों समय से पहले मौत का शिकार होने से बच जाएंगी और उन हजारों लोगों के घर किलकारी गूंज सकती है, जो इन बच्चियों को गोद लेकर उन्हें नई जिंदगी दे सकते हैं। ( वीडियो देखिए)

जब कभी अनचाही बच्चियां पॉलीबैग, नंगे बदन और कूड़ा-करकट में मिलती हैं तब भी सैकड़ों लोग उन्हें अपनाने के लिए हाथ बढ़ाते हैं, लेकिन गोद लेने की प्रक्रिया इतनी जटिल, पेचीदा और भ्रष्टाचार में लिपटी हुई है कि ज्यादातर लोगों को मायूसी हाथ लगती है।

गोद लेने की कड़ी शर्तों के चलते नि:संतान दंपत्ति मायूस लौटते हैं। यूपी में लखनऊ के अल्लापुर के दंपति ने भोपाल के मातृ छाया संस्था से बच्ची को गोद लिया, लेकिन उन्हें हर साल भोपाल जाना पड़ता है, ताकि बच्ची की उपस्थिति वहां दर्ज हो सके। नियम के साथ हर साल का खर्च उन्हें खलता है लेकिन वो मजबूर हैं। (नीचे वीडियो देखिए)

गोद लेने के नियमों में थोड़ा लचीलापन लाया जाए

पिछले दिनों गांव कनेक्शन से बातचीत में लखनऊ की जानी-मानी स्त्री रोग चिकित्सक अरुणिमा सक्सेना का कहना है, “गोद लेने के नियमों में थोड़ा लचीलापन लाया जाए। ये अच्छी बात है कि समाज की सोच बदली है, लोग सरकारी तौर पर गोद लेने के लिये आ रहे हैं, अगर गोद लेने की प्रक्रिया थोड़ी सरल हो तो ज्यादा बच्चों को घर मिल सकेंगे।”हालांकि वो प्रशासनिक निगरानी को बच्चों के हित में मानती हैं।

गलत हाथ में जाने से बच जाती हैं

हालांकि इलाहाबाद में उच्च न्यायालय के अधिवक्ता वाईपी सिंह का कहना है कि नियम भी जरूरी है विशेषकर लड़कियों के अडॉप्शन में। नियमों की निगरानी की वजह से वे गलत हाथ में जाने से बच जाती हैं। लेकिन विभाग के सामने बड़ी चुनौती, इन अनाथालयों में बढ़ती बच्चों की संख्या को कम करना है, जो नियमों में ढील और सामाजिक जागरुकता के बिना संभव नहीं। भारत में 341 जिला बाल सरंक्षण इकाइयाँ, लाइसेंस प्राप्त अडॉप्शन एजेंसिया हैं। केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी के मंत्रालय को काफी पहले लोगों ने सुझाव दिया था कि इस प्रक्रिया से अफसरशाही के दखल को कम किया जाए।

रिपोर्टिंग सहयोग- प्रेम बाजेई (रेउसा, सीतापुर)

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