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डेयरी संचालकों के पास नहीं है दुग्ध उत्पादन को बेचने के लिए बाजार 

पीलीभीत। उत्तर प्रदेश में पशुपालन को बढ़ावा देने और दुग्ध उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए 425 डेयरियां तो शुरू कर दी गईं, लेकिन दूध बेचने के लिए सही बाजार न मिलने से अब वो आधे दाम में दूध बेचने को मजबूर हैं।

पशुपालन को बढ़ावा देने के लिए व उत्तर प्रदेश को दूध के क्षेत्र में देश में अग्रणी बनाने के लिए 2012 में 425 डेरियों की स्थापना की गई थी, जिसे कामधेनु डेयरी प्रोजेक्ट का नाम दिया गया था। इसी योजना के अंतर्गत जनपद पीलीभीत में पांच कामधेनु डेयरी जिसमें पशुओं की निर्धारित संख्या 100 रखी गई थी। 15 मिनी कामधेनु डेयरियां जिनमें पशुओं की संख्या 50 निर्धारित की गई थी। वही 23 माइक्रो कामधेनु डेयरियां, इसमें पशुओं की संख्या 25 रखी गई थी, शुरू की गई थी।

इसमें कामधेनु डेयरी खोलने की लागत एक करोड़ 20 हजार रुपए आती थी। इसमें 25 प्रतिशत यानी 30 लाख 13 हज़ार की मार्जिन मनी डेयरी खोलने वाले व्यक्ति को जमा करनी होती थी। बाकी 75 प्रतिशत यानी 90 लाख 38 हज़ार सरकार ने डेयरी स्वामियों को बैंक से कर्ज दिलाया था। इस कर्ज़ की अदायगी पांच वर्ष में चुकता करनी थी।

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पांच साल का ब्याज जो करीब 33 लाख बनता है, ब्याज का भुगतान सरकार द्वारा किया जाना था। इस योजना के अंतर्गत डेयरी स्वामियों के लोन जमा करने की गारंटी सरकार द्वारा की जानी थी। उसके बाद भी बैंकों ने डेयरियां खोलने वाले व्यक्ति से व्यक्तिगत तौर पर भी गारंटी मांगी और डेयरी स्वामियों से गारंटी के तौर पर उनकी प्रॉपर्टी बंधक रखी।

इस बारे में जब जिला मुख्यालय से 25 किलोमीटर दूर कस्बा न्यूरिया में माइक्रो कामधेनु योजना के तहत डेयरी चल रही है। जो लगातार घाटे में जा रही है। इस माइक्रो कामधेनु डेयरी में 32 बड़े और 25 छोटे पशु हैं। लेकिन इस समय दूध देने वाले पशु मात्र आठ ही हैं। कुल दूध का उत्पादन केवल 100 लीटर ही हो पाता है। जो उत्तराखंड की कंपनी को 25 रुपए लीटर के हिसाब से बेच दिया जाता है।

इस डेयरी की देखभाल करने वाले मोहम्मद यूसुफ बताते हैं, “सिर्फ 25 रुपए लीटर में दूध बेचकर डेयरी का संचालन नहीं किया जा सकता। लगातार डेयरी घाटे में जा रही है। अब बैंक का लोन कैसे पूरा हो पाएगा खुदा ही जाने।”

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सहकारी क्षेत्र की पीसीडीफ डेरियां जनपद में कार्य नहीं कर रही

दुग्ध उत्पादन बढ़ाने के लिए डेरिया तो अनुदान पर खुलवाएं। लेकिन इन डेयरियों में पैदा होने वाले दुग्ध, दुग्ध उत्पादकों को बिक्री के लिए कोई बाजार उपलब्ध नहीं कराया। सहकारी क्षेत्र की पीसीडीफ डेरियां जनपद में कार्य नहीं कर रही है। इनमें उत्पादित दूध उत्तराखंड की प्राइवेट डेरियां 25 रुपण् लीटर के हिसाब से खरीद रही है। जो बाद में 50-55 रुपए लीटर के हिसाब से ग्राहकों को बेचती हैं। यहां करोड़ों रुपए लगाकर अपना दूध डेयरी स्वामी 25 रुपए लीटर के हिसाब से उत्तराखंड की इन डेरियों को बेच रहा है। वह लगातार घाटे में जा रहा है जबकि डेयरी स्वामियों से दूध खरीदने वाली कंपनियां मात्र दूध खरीदकर ही 25 रुपए लीटर का मुनाफा कमा रही हैं। आज जनपद में इन डेरियों की यह स्थिति है कि या तो यह बंद हो चुकी हैं या कुछ बंद होने के कगार पर हैं।

विभाग पूरी तरह इन डेयरी स्वामियों के साथ है। मेरे द्वारा कई बार इनकी समस्या प्रमुख सचिव स्तर तक उठाई गई हैं। लगातार हमारा यह प्रयास है, कि इनकी समस्याओं का समाधान किया जा सके।”
जीपी सिंह, मुख्य पशु चिकित्साधिकारी

वह आगे बताते हैं, “डेयरी स्वामियों के सामने अपने दूध को बेचने की बहुत बड़ी समस्या है। क्योंकि इनके पास कोई ऐसा बाजार नहीं है जहां इनको दूध का उचित दाम मिल सके। विभाग द्वारा अधिकतर डेयरी स्वामियों के खाते में सब्सिडी जा रही है। विभाग द्वारा डेयरी स्वामियों को दूध के प्रोडक्ट जैसे पनीर, खोया, मक्खन, घी आदि बेचने की सलाह दी जाती है।”

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