गाँवों में कभी नहीं दिखे फ़सल का बीमा करने वाले

गाँवों में कभी नहीं दिखे फ़सल का बीमा करने वालेहरिद्वार में चिंतन शिविर में मांगों को लेकर आवाज उठाते किसान।     फोटो: शुभम कौल

हरिद्वार। सरकार द्वारा वादों से मुकर जाना और समितियों एवं ख़रीद केंद्रों पर अधिकारियों की मनमानी एवं घूसखोरी और सरकारी योजनाओं का लाभ न मिल पाना किसानों की सबसे बड़ी समस्याएं हैं। हरिद्वार में चल रहे तीन दिवसीय किसानों के सम्मेलन में देशभर से पहुंचे किसानों ने एक सुर में अपनी समस्याओं को सामने रखा। सम्मेलन में अलग-अलग जिलों से आए किसानों से ‘गाँव कनेक्शन’ ने बात की तो सभी ने समय पर सरकारी योजना का लाभ न मिल पाना बताया।

महोबा ज़िला के मोहनलाल राजपूत कहते हैं, “हमें पता ही नहीं है कि बीमा के लिए सम्बंधित अधिकारी कौन है? जो हम बीमा का लाभ ले सकें, इसके लिए सरकार ने कोई भी उचित व्यवस्था नहीं की है।“ वहीं, अमेठी के 67 वर्षीय जगन्नाथ की फ़सल ओलावृष्टि की वजह से बर्बाद हो गयी थी, लेकिन उन्हें आज तक कोई मुआवज़ा नहीं मिला।

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जगन्नाथ कहते हैं, “प्रीमियम का पैसा हमारे अकाउंट से कटता रहता है, लेकिन मुआवज़ा एक भी नहीं मिलता है।“ ज़्यादातर किसानों का कहना है कि सरकारी ख़रीद केंद्रों पर छोटे और मंझोले किसानों के लिए कोई जगह नहीं है। महोबा के भोजपुरा गाँव से आए 55 वर्षीय स्वामी प्रसाद राजपूत बताते हैं, “ख़रीद केंद्र सिर्फ़ बिचौलियों और बड़े काश्तकारों की उपज को ख़रीदते हैं। अगर एकाध बार हमारी उपज को ले भी लिया तो उसका पैसा दो से तीन महीने बाद मिलता है।

किसान तीन महीने तक इंतज़ार नहीं कर सकता है, तभी औने-पौने दाम में बेचता है।“ स्वामी प्रसाद आगे कहते हैं, “किसान को बेबस कर दिया गया है। बैंक वाले हमारा पैसा हमें नहीं देते हैं, कह देते हैं कि अभी नहीं मिलेगा, बाद में आना।“ रायबरेली के 85 वर्षीय श्यामलाल विश्वकर्मा कहते हैं, “गेहूं का समर्थन मूल्य 1625 रुपया है, लेकिन हम मजबूर होकर अपनी उपज को 1300 रुपए में बेचना पड़ रहा है क्योंकि ख़रीद केंद्रों पर रिश्वत चलती है।

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यदि हम उन्हें प्रति कुंतल पर 100 रुपया नहीं दिए तो वे हमारी उपज नहीं तौलते हैं।” सम्मेलन में किसानों ने एक सुर में कहा कि खेती में लागत का बढ़ते जाना और उपज का सही दाम ना मिलना सबसे बड़ी समस्या है। अमेठी ज़िला से सम्मेलन में पहुंचे अवधेश कुमार मौर्य (52 वर्ष) बताते हैं, “उपज का सही दाम ना मिलने से किसान क़र्ज़दार हो रहा है। किसान सरकार से जो भी धन लेता है वो इसलिए नहीं चुका पता क्योंकि उसकी उपज का दाम लागत से भी कम मिलता है और इसी वजह से किसान आत्महत्या करता है।” इटावा से आए 38 वर्षीय किसान संजीव यादव कहते हैं, “सरकार की नीतियों ने हमें क़र्ज़दार बनाया है।“

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