बढ़ते आधुनिकीकरण से गुम हुआ अलाव पर कहानियों का दौर 

बढ़ते आधुनिकीकरण से गुम हुआ अलाव पर कहानियों का दौर सर्दी में अलाव पर अब नहीं दिखता ये जमावड़ा 

लखनऊ। सर्दियों के मौसम में गांव में मनोरंजन का साधन अलाव पर किस्से कहानियां हुआ करता था। कुछ समय पहले तक शाम होते ही हर मोहल्ले में अलाव जल जाता और धीरे-धीरे यहां लोगों का जमावड़ा बढ़ता जाता। गांव में अलाव एक ऐसा ठिकाना होता था जहां लोग एक दूसरे के हाल चाल लेने, किसी विषय पर राय मशविरा करने के लिए इकट्ठे होते थे। इसके साथ ही शुरू हो जाता था किस्से कहानियों का दौर। अलाव पर भीड़ और कहानियों का दौर अब गुजरे जमाने की बात लगने लगी है। बढ़ते आधुनिकी करण के साथ ये अलाव और किस्से कहानियों का दौर कम हो गया है।

“पहले हमारे पास मोबाइल टीवी नहीं था, उस समय हम लोग मनोरंजन के अलग-अलग तरीके खोजते थे। उनमें से एक तरीका कहानियों का भी हुआ करता था। जो गांव में कहानी कह लेता था उसकी बड़ी मांग रहती थी। हमने खुद अपने बाबा की बहुत कहानियां सुनी हैं।” ये कहना है श्याम किशोर कटियार (45 वर्ष) का। ये उत्तर प्रदेश के कानपुर देहात जिले के रहने वाले हैं। इनकी तरह आप में से कई लोगों ने बचपन में अलाव की कहानियों का आनंद लिया होगा।

वो आगे बताते हैं, “छह सात साल से अलाव पर किस्से कहने का सिलसिला बहुत कम हो गया है। अब तो जब कब भले ही कोई कहानी सुनने के लिए अलाव पर आए, लोगों को मोबाईल और टीवी से अब फुर्सत ही नहीं मिलती। पहले बूढ़े जवान सब सुनते थे, पूरे मोहल्ले की खबर अलाव पर आने से मिल जाती थी। अब तो ये नजारा कभी कभार ही देखने को मिलता है।

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कई मुद्दों पर होता था राय मशविरा।

कहानीकार राजेश का कहना है, “आज से पांच साल पहले तक जब मैं कहानियां सुनाने बैठता तो आस-पड़ोस के बच्चे मुझे घेर कर बैठ जाते थे और घंटों कहानियां सुनते थे। जबसे ये मोबाईल आया है तबसे बच्चे पूरे समय मोबाईल में किट-पिट करते रहते हैं, कुछ लोग फ़िल्में देखते और गाने सुनते रहते। अब कहानी सुनने का किसी के पास वक़्त नहीं बचा है।” उनका कहना है, “इन उपकरणों से जितनी हमारी जिन्दगी आसान हुई है उतना ही भाई-चारा कम हुआ है। अब एक साथ लोग अलाव पर देर तक बैठते ही नहीं हैं। पहले कहानी के शौक़ीन लोग अपने दरवाजे लकड़ी का इंतजाम करके अलाव लगवाते थे।” इन कहानियों में आल्हा, राजा रानियों की कहानियां, परियों की कहानियां, राजा विक्रमादित्य, पंचतंत्र, चार पाई के चार पाँव जैसी तमाम कहानियां हुआ करती थी।

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कुछ ऐसे लगता था सर्दियों में अलाव पर जमावड़ा

अलाव पर जमावड़ा लोगों के मिलने मिलाने का एक स्थान होता था। जहां ये न सिर्फ आग सेकते और कहानियां कहते बल्कि गांव की किसी समस्या पर घंटों विचार विमर्श किया करते थे। मोहल्ले में किसी एक व्यक्ति की समस्या से हर किसी का ताल्लुक होता था। कोई भी धार्मिक या पारम्परिक कार्यक्रम होता तो उसकी चर्चा भी यहीं पर होती, सबकी सहमति और मिल जुलकर काम होता था। अलाव का नजारा ही कुछ और होता था। कभी गम्भीर मुद्दों पर बात होती तो कभी हंसी-ठिठोली होती। आपस में लोग शकरकंद, आलू, मूंगफली भूनकर खाते कहानी सुनते, गप्पे लड़ाते। एक मोहल्ले में एक या दो अलाव लगते, पूरे गांव में जगह-जगह कई अलाव जलते। जिसका जहां मन होता वो उस अलाव पर जाकर बैठ जाता। इससे गांव के हर व्यक्ति को एक दूसरे की जानकारी रहती थी, सब एक दूसरे की मदद के लिए तैयार रहते थे।

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अलाव होता था मनोरंजन का ठिकाना ।

भारत में अलाव जलाकर मनाए जाते हैं कई त्योहार

ओडिशा में मनती है अग्नि पूर्णिमा

ओडिशा में माघ पूर्णिमा के दौरान जो फरवरी के मध्य में पड़ती है, अलाव जलाकर एक त्योहार मनाया जाता है जिसे अग्नि पूर्णिमा कहते हैं। वेदों में ऐसा कहा गया है कि साधु संत माघ और फाल्गुन के महीने में यज्ञ करते थे। यह त्योहार कड़ाके की ठंड से छुटकारा पाने के साथ मक्के की फसल को जंगली जानवरों व कीड़े मकौड़े से बचाने के लिए मनाया जाता है। शाम को गाँववासी सूखी लकड़ियां, धान और गेंहू की भूसी वगैरह एक जगह इकट्ठा करके जलाते हैं। सभी लोग इस मौके पर इकट्ठा होते हैं। गाँव के पुजारी प्रार्थना करते है, मंत्र उच्चारण करते हैं और प्रसाद देते हैं। इसी के साथ गाँव के पुरुष व महिलाएं अलाव के चारों ओर चक्कर लगाते हैं और मौसमी सब्जियों को अलाव में डालकर भूनते हैं। इस दौरान गाँव के वृद्ध बच्चों को कहानियां भी सुनाते हैं।

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गांव कनेक्शन के स्वयं फेस्टिवल के दौरान रायबरेली जिले में कुछ इस तरह अलाव पर लगा था जमावड़ा

आधुनिक युग के साथ रिश्ते भी आधुनिक हो गये

जब गांव कनेक्शन ने कई ग्रामीणों से बात की तो सबका एक ही कहना था कि आधुनिक युग के साथ हमारे रिश्ते भी आधुनिक हो गये हैं। अब किसी से कोई मतलब नहीं रहता, सब अपने आप में व्यस्त रहते हैं। कानपुर देहात के दिलीपी निवादा गांव में रहने वाले जयकरण कुमार का कहना है, “एक समय था जब जाड़े के दिनों में लोग कहानी सुनाने के लिए हमें खोजते थे, रात के 10-11 कब बज जाते पता ही नहीं चलता था। अब तो 7-8 बजे ही लोग अपने घरों में चले जाते हैं, किसी से कोई मतलब नहीं, सब टीवी और मोबाईल के दीवाने हो गये हैं।” वो आगे बताते हैं, “अभी भी कभी-कभी जब पुराने दोस्त इकट्ठा होते हैं तो अलाव जलाकर घंटो बैठकें होती हैं, ठहाके लगते हैं, लम्बी कहानियां होती हैं और एक बार फिर पुरानी यादें ताजा करके तनाव कम हो जाता है।”

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भांगड़ा और गिद्दा करके मनाते हैं लोहड़ी

मकर संक्रान्ति से एक दिन पहले सिख समुदाय के लोग लोहड़ी मनाते हैं। पंजाब और हरियाणा जैसे प्रदेश में यह बड़े धूमधाम से मनायी जाती है। इस दौरान सूखी लकड़ियों को इकट्ठा करके पिरामिड तैयार किया जाता है। उसके बाद इसकी पूजा की जाती है और उसे जलाया जाता है। इस अलाव में तिल के दाने के साथ मिठाई, गन्ना, चावल और फल भी डाले जाते हैं। इसके बाद लोग ढोल की थाम पर भांगड़ा और गिद्दा करते हैं। इस अवसर पर विवाहिता पुत्रियों को माँ के घर से 'त्योहार' (वस्त्र, मिठाई, रेवड़ी, फलादि) भेजा जाता है। नवविवाहित और बच्चे की पहली लोहड़डी खास मानी जाती है।

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