ताकि हमारा पर्यावरण सुरक्षित रहे : इन छात्रों ने सैनेटरी पैड को नष्ट करने का ढूंढा देसी तरीका

Mithilesh DubeyMithilesh Dubey   19 Nov 2017 3:20 PM GMT

ताकि हमारा पर्यावरण सुरक्षित रहे : इन छात्रों ने सैनेटरी पैड को नष्ट करने का ढूंढा देसी तरीकागांव में मटकी ले जाती छात्रा।

मिर्ज़ापुर। जब कोई महिला या लड़की डिस्पोजेबल सैनेटरी नैपकिन खरीदती है तो उसके दिमाग में लंबे समय तक चलने वाला, आरामदायक, दाग मुक्त और सस्ता होने की बात रहती है।

ज्यादातर महिलाएं यह नहीं जानतीं कि भारत में हर महीने एक अरब से ज्यादा सैनेटरी पैड गैर निष्पादित हुए सीवर, कचरे के गड्ढों, मैदानों और जल स्रोतों में जमा होते हैं, जो बड़े पैमाने पर पर्यावरण और स्वास्थ्य के लिए खतरनाक साबित हो रहे हैं।

साफ-सफाई के लिए सैनेटरी पैड का इस्तेमाल सही तो है लेकिन उसके दुष्प्रभाव का बारे में कौन सोचेगा। मिर्जापुर मुख्यालय से लगभग 40 किमी दूर मझवां ब्लॉक के पूर्व माध्यमिक विद्यालय बंधवा की छात्रों ने इसका देसी विकल्प ढूंढ लिया है। कक्षा सातवीं और आठवीं की इन छात्राओं ने सैनेटरी पैड के निस्तारण का देसी तरीका ढूंढ निकाला है, जो सस्ता और सुलभ है।

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भारत सरकार जहां सभी महिलाओं व लड़कियों को, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में, सैनेटरी नैपकिन उपलब्ध कराना सुनिश्चित कर रही हैं। वहीं सैनेटरी पैड के निस्तारण के मुद्दे पर खास ध्यान नहीं दिया, जो हर साल करीब 113,000 टन निकलता है।

सैनेटरी नैपकिन के निस्तारण की जानकारी के अभाव में अधिकांश महिलाएं या युवतियां इसे कचरे के डिब्बे में फेंक देती हैं, जो अन्य प्रकार के सूखे व गीले कचरे के साथ मिल जाता है। इसे रिसाइकिल नहीं किया जा सकता और खुले में सैनेटरी नैपकिन कचरा उठाने वाले के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक साबित हो सकते हैं।

पूर्व माध्यमिक विद्यालय बंधवा की छात्रा पायल मौर्य, कक्षा 8 (13), सुनीता बेलवंशी कक्षा 8 (14), कोमल गुप्ता कक्षा 7, (13), तेजस्वी तिवारी कक्षा 7 (12) और रूबीना अपने स्कूल के आसपस के गांवों में सैनेटरी नैपकिन के निस्तारण के लिए लोगों को जागरूक कर रही हैं। ये सभी छात्राएं मीना मंच से जुड़ी हैं। मीना मंच के कार्यक्रमों से इन्होंने पैड के निस्तारण की जानकारी ली और अब इसे दूसरों को भी दे रही हैं।

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सुनीता बताती हैं "अगर मैं अपने घर की बात करूं तो पहले मेरे यहां की महिलाएं पैड जहां मन मे आता था फेंक दिया करती थी। इससे तमाम तरह का प्रदूषण होता है। लेकिन अब ऐसा नहीं होता। हम इस्तेमाल किया हुआ पैड घर में जमीन के अंदर गड़े मटके में पैड को रख देते हैं, बाद उसे कहीं मिट्टी के अंदर डंप कर कर देते हैं।"

वहीं रूबीना कहती हैं "मैंने भी अपने घर में ऐसा करने का प्रयास किया। लेकिन पहले तो घर वाले के इसके लिए नहीं माने। मां ने कहा घर में भाई है, पापा हैं, उनके सामने ये पड़ेगा तो वे क्या साचेंगे, तुम्हे शर्म नहीं आएगी। फिर मीना मंच के अन्य बच्चे मेरे घर गए और उन्होंने मेरे घरवालों को इसके दुष्परिणामों के बारे मं बताया। अब मैंने भी अपने घर में के बाहर एक मटका गाड़ दिया है। यूज किया पैड हम उसी में रख देते हैं और बाद में डंप कर देते हैं।"

मिर्ज़ापुर जिला अस्पताल में बतौर महिला विशेषज्ञ पदस्थ मीना कुमारी कहती हैं "एक नैपकिन 80 प्रतिशत सामान प्रदूषित या संक्रमित होता है। उसकी खुशबु और सफेदी देख कर हम उसे साफ़ मानते हैं। अगर इन सबको हटा लें तो कुछ भी रिसायकेबल नहीं होता। असल भारत में माहवारी सम्बन्धी स्वच्छता की कमी है, उसे भरने हेतु सैनेट्री नैपकिंस की पहुँच बढ़ाने की मुहिम चल रही है। मगर असल में हम सब धरती को नुकसान पहुंचा रहे हैं। हर महीने अकेले हमारे देश में ही 60 लाख बिलियन से ऊपर माहवारी सम्बन्धी कचरा पैदा होता है जो कि सैनिटरी पैड्स और टैम्पून्स की देन है। सभी को देश के वेस्ट मैनेजमेंट सिस्टम का हाल मालूम है, यह इस्तेमाल किये हुए प्रोडक्ट्स बीमारियां बढाने में अभूतपूर्व योगदान देते हैं।"

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मटके में नैपकिन कैसे रखा जाता है ये देखने के लिए हम सुनीता बलवंशी के गांव सौला गये। वहां हमने देखा कि सुनीता के घर से बाहर मिट्टी के अंदर एक मटका रखा गया है। उसमें यूज किया हुआ पैड रखा है। बाद में इसे डंप कर दिया जाता है। इस मटके के बारे में सुनीता की माँ मुन्नी बेलवंशी कहती हैं " हमारे घर में आसान नहीं था। घर के पुरुष इसका विरोध कर रहे थे। लेकिन सुनीता की जिद के सामने सबको झुकना पड़ा। ये सही भी है। पहले हम लोग पैड या कपड़ा छिपाकर ले जाते थे और खेतों में फेंक देते थे। मीना मंच के बच्चों ने हमें समझाया कि इससे प्रदूषण फैलता है। तब से हम पैड मटके में ही रखते हैं।"

मीना मंच के बच्चे सफाई को लेकर कई गांवों में काम कर रहे हैं। वे महिलाओं और लड़कियों को जागरूक कर रही हैं। बीएसए मिर्ज़ापुर प्रवीण कुमार तिवारी कहते हैं "हम इन लड़कियों को प्रोत्साहित करते हैं। ऐसे पिछड़े इलाकों में इनका इस तरह का प्रयास सराहनीय है।"

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