अनुबंध खेती के जरिए किसानों की आय दोगुनी करने का लक्ष्य

Ashwani NigamAshwani Nigam   10 Dec 2017 9:58 AM GMT

अनुबंध खेती के जरिए किसानों की आय दोगुनी करने का लक्ष्यप्रतीकात्मक फोटो

लखनऊ। कांट्रैक्ट फार्मिंग यानि अनुबंध खेती के जरिए उत्तर प्रदेश के किसानों की आय बढ़ाने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार तैयारी कर रही है। प्रदेश के कृषिमंत्री सूर्य प्रताप शाही ने बताया, ''वर्ष 2022 तक किसानों की आय दोगुनी हो जाए और किसान विकास की मुख्य धारा का हिस्सा बनें, इसके लिए एक साथ कई योजनाओं पर काम किया जा रहा है। किसान विपणन उद्योग में शामिल होकर खेती का लाभकारी बना सकें इसके लिए कांट्रैक्ट फार्मिंग एक्ट का ड्राफ्ट तैयार किया जा रहा है।''

उत्तर प्रदेश में ऐसा पहली बार नहीं है जब सरकार ने अनुबंध खेती के बारे में सोच रही है, इसके पहले उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती के कार्यकाल में उनकी कैबिनेट की मंजूरी के बाद प्रदेश की नई कृषि एवं अवस्थापना निवेश नीति लागू की गई थी।

कृषि एवं अवस्थापना निवेश नीति के तहत निजी कंपनियों और किसानों के लिए अनुबंध खेती (कांट्रैक्ट फार्मिंग) का विकल्प खोल दिया गया था, जिसके तहत कम्पनियां सीधे किसानों को बीज, खाद और कर्ज सुविधा उपलब्ध कराकर उनके द्वारा उत्पादित गेहूँ, चावल, दाल, फल, फूल और सब्जी खरीदकर रिटेल बाजार में बेच सकती थी। सरकार ने तब दावा किया था कि बड़े निवेशकों को मंडी स्थल के बाहर खरीदने-बेचने की सुविधा होगी और सरकार इसके लिए लाइसेंस जारी करेगी। इसके लिए मण्डी परिषद एक्ट, 1964 में संशोधन किया गया था, लेकिन किसानों और जनसंगठनों के विरोध के कारण मायावती ने यह नीति वापस ले ली थी।

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कंपनी के मानदण्डों के अनुसार खेती

अनुबंध खेती के तहत किसान अपनी कृषि योग्य जमीन पर प्रायोजक कंपनी के मानदण्डों के अनुसार खेती करता है और मानदण्ड पर खरा उतरने पर ही उसके उत्पाद खरीदे जा सकते हैं। अभी तक कृषि व्यवसाय के खुदरा व्यापार में आईटीसी अपने ई-चौपाल, महिन्द्रा अपने शुभ-लाभ, गोदरेज एग्रोवेट अपने 'आधार', टाटा अपने टाटा किसान संसार, रिलायंस अपने रिलायंस फ्रेश, भारती इण्टर प्राइजेज अपने फील्ड फ्रेश के नाम से कृषि व्यवसाय में स्थापित हैं।

ठेके पर खेती का कानूनी स्वरूप देने की तैयारी

केन्द्रीय कृषि मंत्रालय ने वर्ष 2003 में बाजार सुधारों को लागू करने के उद्देश्‍य से केंद्र सरकार की तरफ से एक मॉडल कृषि उत्पाद विपणन (नियमन) अधिनियम को राज्यों के बीच प्रसारित किया था। इस मॉडल एक्ट तैयार कर राज्यों को अपने मंडी कानूनों में परिवर्तन करके अनुबंध खेती के बारे में मसौदा तैयार करने को कहा था। इसमें अनुबंध खेती के प्रायोजकों के पंजीकरण के साथ-साथ ठेके पर खेती से जुड़े समझौतों को दर्ज किए जाने, इस तरह के अनुबंधों के तहत भूमि पर किसानों के हक (टाइटिल) या अधिकारों की रक्षा करने, विवाद निपटारे की व्‍यवस्‍था करने और विभिन्न नियमों एवं शर्तों के बारे में सुझाव देने वाले एक मॉडल मसौदा समझौते के लिए प्रावधान हैं। कई राज्य सरकारों ने ठेके पर खेती को कानूनी स्‍वरूप प्रदान करने के लिए अपने एपीएमसी अधिनियमों में प्रावधान किए हैं।

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साठ के दशक से ही ठेके पर खेती का चलन

मार्च 2010 में हर्षवर्धन पाटिल की अध्यक्षता में एक इम्पावर कमेटी ऑफ स्टेट मिनिस्टर इन चार्ज आफ एग्रीकल्चर मार्केटिंग की स्थापना की गई जिसने 8 सितंबर 2011 को अपनी अंतरिम रिपोर्ट कृषि मंत्री भारत सरकार को सौंप दी, लेकिन इसपर कार्रवाई नहीं की। भारत में साठ के दशक से ही ठेके पर खेती का चलन रहा है और पिछले दशक में राज्यों के स्तरों पर एपीएमसी अधिनियम में किए गए संशोधन ने इसे कानूनी स्‍वरूप प्रदान कर दिया है।

अनुबंध पर खेती के तहत बीज, उर्वरक और कृषि मशीनें होगी उपलब्ध

देश में अनुबंध खेती पर शोध करने वाली अर्थशास्त्री जयश्री सेनगुप्ता ने बताया, ''अनुबंध पर खेती के तहत किसानों को बीज, ऋण, उर्वरक, मशीनरी और तकनीकी सलाह सुलभ कराई जा सकती है, ताकि उनकी उपज कंपनियों की आवश्यकताओं के ही बिल्‍कुल अनुरूप हो सके। इसमें कोई भी बिचौलिया शामिल नहीं होगा और किसानों को कंपनियों की ओर से पूर्व निर्धारित बिक्री मूल्य मिलेंगे।''

उन्होंने बताया कि इस तरह की खेती बढ़िया एवं सरल प्रतीत होती है और किसानों को मंडियों के चक्‍कर नहीं लगाने पड़ते हैं और न ही उन्‍हें खेती-बाड़ी से जुड़े कामों के लिए बीज और ऋण जुटाने की कोई चिंता करनी पड़ती है। इस तरह के अनुबंध से किसानों के लिए बाजार में उनकी उपज की मांग एवं इसके मूल्यों में उतार-चढ़ाव का जोखिम कम हो जाता है और इसी तरह कंपनियों के लिए कच्चे माल की अनुपलब्धता का जोखिम घट जाता है।

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अनुबंध खेती का हो रहा विरोध

कृषि मामलों के जानकार और किसान नेता अतुल कुमार अनजान ने बताया, ''अनुबंध खेती छोटे और सीमांत किसानों को बर्बाद कर देगी। इस तरह की खेती के लिए इन किसानों से अनुबंध नहीं किया जा सकता क्‍योंकि कंपनियां फसल की एक विशेष मात्रा उपलब्‍ध कराने की मांग कर सकती हैं, जिसका उत्‍पादन छोटे किसान अपनी जमीन के छोटे आकार के कारण नहीं कर सकते हैं। ऐसे में सबसे कमजोर माने जाने वाले किसानों को कॉरपोरेट खेती का लाभ कतई नहीं मिल पाएगा।'' उन्होंने बताया कि अनुबंध खेती से छोटे और मझोले किसान कंपनियों के जाल में फंस सकते हैं। छोटे किसान अक्‍सर इतने पढ़े-लिखे नहीं होते हैं कि वे अनुबंध और सभी धाराओं की बारीकियों को सही ढंग से समझ सकें। ऐसे में यदि उपज कंपनी के मानकों के अनुरूप नहीं होती है, तो उसे समूची फसल को अस्वीकृत किए जाने की स्थिति का सामना करना पड़ सकता है। तो वैसी स्थिति में उसकी नियति क्या होगी ? वह अपनी उपज कहां बेच सकता है ? यह निर्यात को रद्द करने जैसा होगा। खराब उपज को बेचना आसान नहीं होता। ऐसे में किसान को घाटा उठाना पड़ेगा।

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किसानों को नहीं मिलेगी मनमर्जी से खेती करने की आजादी

अनुबंध खेती का एक नुकसान यह भी है कि कंपनियों किसानों से लगातार कई वर्षों तक केवल टमाटर या प्याज का ही उत्पादन करने के लिए विवश कर सकती हैं, जिससे 'मोनोकल्चर' की स्थिति बन जाएगी और उसके पास कोई भी विकल्प शेष नहीं रह जाएगा। जिससे किसानों की खेती करने की आजादी या मनमर्जी खतरे में पड़ जाएगी और यह किसानों की व्‍यक्तिगत आजादी एवं उनके अधिकारों के लिए एक गंभीर झटका होगा। अनुबंध खेती में निर्धारित कीमतों में खाद्य संबंधी महंगाई का ख्याल नहीं रखा जाता है और अगर उपज का मूल्य बढ़ जाए, तो किसान उसका फायदा नहीं उठा सकते हैं और अप्रत्याशित लाभ नहीं कमा सकते हैं क्योंकि वह अनुबंध के तहत पहले से ही सहमत हुए दाम पर बेचने के लिए विवश होंगे।

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