भ्रष्ट नौकरशाहों पर सुप्रीम कोर्ट ने चलाया चाबुक  

भ्रष्ट नौकरशाहों पर सुप्रीम कोर्ट  ने चलाया चाबुक  प्रतीकात्मक फ़ोटो 

लखनऊ। प्रदेश में अफसरशाही के भ्रष्टाचार और सत्ताशीनों की पैरोकारी की कहानियां बहुत हैं। नोएडा से जुड़ीं नीरा यादव और राजीव कुमार हों या फिर यादव सिंह। एनआरएचएम में गड़बड़ियों में प्रदीप शुक्ला सभी ने सत्ता के सहयोग से भ्रष्टाचार की मलाई चखी। अब जेल उनकी मंजिल बन गया है।

इस पर भी प्रदेश में अनेक ऐसे अफसर हैं जिन पर आय से अधिक संपत्ति के मामले हैं मगर उनका बाल भी बांका नहीं हो रहा है। अदालतों के आदेश ही इनको जेल पहुंचा पाते हैं वरना सत्ता के गलियारों से सरकारी अफसरों के भ्रष्टाचार को केवल अभयदान ही मिलता रहा है।

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अपने पद का गलत तरीके से इस्तेमाल कर अपनी बेटियों के नाम दो भूखंड आवंटित करने के केस में पूर्व चीफ सेक्रेटरी नीरा यादव को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया है। उनको दो साल की सजा सुनाई गई है। सुप्रीम कोर्ट ने नीरा यादव की सजा को 3 साल से घटाकर 2 साल कर दिया है। नीरा यादव यूपी की पूर्व चीफ सेक्रेटरी हैं और उनपर भ्रष्टाचार के कई आरोप लगे थे। सीबीआई की विशेष न्यायाधीश एस लाल की अदालत ने नीरा यादव को नोएडा भूखंड आवंटन मामले का दोषी पाया था। जिसके लिए उन्हें तीन साल की सजा सुनाई गई थी। नीरा यादव ने अपनी सजा को खत्म किए जाने के लिए अर्जी लगाई थी। इसको लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई थी।

2005 में समाजवादी सरकार में नीरा यादव को मुख्य सचिव नियुक्त किया गया था। तत्कालीन मुख्य सचिव नीरा यादव को अशोक चतुर्वेदी की कंपनी को लाभ पहुँचाने का दोषी पाया गया था। नोएडा में कंपनी को जमीन देने के मामले में नीरा यादव को जस्टिस विनोद प्रसाद की बेंच ने जमानत दे दी है।

बिना अदालत की दखल भ्रष्ट अफसर लूटते हैं मजा

बिना अदालती दखल के भ्रष्ट अफसरों का बाल भी बांका नहीं होता है। यादव सिंह के मामले में अदालत के आदेश के बाद ही सीबीआई जांच शुरू की गई थी। वरना सत्ताधारियों का समर्थन लगातार 10 साल तक यादव सिंह को मिलता रहा। इसी तरह से उत्तर प्रदेश औद्योगिक विकास प्राधिकरण के मुख्य अभियंता अरुण मिश्र ने 2004 से लेकर 2012 तक कई बार निलंबित होने जेल जाने के बावजूद मलाई काटी। उन पर अनेक तरह के आरोप लगा कर खुद सरकारें चुप हो गईं। अनेक बार अरुण मिश्रा जेल गए। मगर बाद में यूपीएसआईडीसी के मुख्य अभियंता बने रहे। एक नाम आईएएस प्रदीप शुक्ला का भी इसमें जुड़ा है। बसपा काल में राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन कार्यक्रम के तहत बड़े घोटाले हुएए जिसमें प्रदीप शुक्ला आरोपी रहे हैं। उनको जमानत पर छोड़ा गया उसके बाद वे अखिलेश राज में दोबारा नई पोस्टिंग भी पा गए थे। मगर बाद में उन्हें दोबारा जेल जाना पड़ा अभी भी प्रदीप शुक्ला जेल में ही हैं।

दबा दी गई थी 20 महाभ्रष्ट आईएएस की सूची

उत्तर प्रदेश के बीस महाभ्रष्ट आईएएस और आईपीएस अफसरों के खिलाफ सीबीआई अथवा विजिलेंस जाँच की माँग करीब आठ साल पहले दबा दी गई थी। । गैर सरकारी संगठन इंडियन रिजुविनेशन इनीशियेटिव्सश्आ, ईआरआई ने तत्कालीन कैबिनेट सचिव शशांक शेखर सिंह को पत्र लिखकर इन अफसरों की सूची भी दी थी। आईआरआई के संस्थापक सदस्य प्रकाश सिंह की ओर से पत्र लिखा गया था। इसमें कहा गया है कि यूपी में महाभ्रष्ट अफसरों की सूची काफी लम्बी है पर सिर्फ बीस अधिकारियों को इसलिए चिन्हित किया गया है ताकि राज्य सरकार को कार्रवाई करने में दिक्कत न हो। इस पत्र में कहा गया था कि राज्य सरकार को इन भ्रष्ट अफसरों की सम्पत्ति की जाँच करानी चाहिए। इनके भ्रष्टाचार की जाँच सीबीआई से कराई जाए या फिर इस काम में राज्य के विजिलेंस विभाग की मदद भी ली जा सकती है। इसके अलावा विकल्प यह भी सुझाया गया है कि सरकार चाहे तो संविधान की धारा 311 का इस्तेमाल करते हुए इन्हें सीधे बर्खास्त भी कर सकती है।

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पत्र में कहा गया है कि अगर उत्तर प्रदेश की नौकरशाही में लगातार बढ़ रहे भ्रष्टाचार को नियंत्रित नहीं किया गया तो इस राज्य की बदहाली और भी बढ़ती जाएगी। इस संस्था में भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश आरसी लाहोटी पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त जेएम लिंग्दोह और कई अन्य सेवानिवृत्त नौकरशाह व न्यायविद शामिल रहे हैं। मगर इस पत्र और उसमें दर्ज अफसरों पर कभी कोई एक्शन नहीं लिया गया। उनमें से अनेक अभी भी उच्च पदस्थ हैं।

देश में 1800 और उत्तर प्रदेश के 255 अफसरों ने नहीं दिया संपत्ति का ब्योरा

देशभर के 1800 से ज्यादा अफसरों ने अपनी अचल संपत्ति का ब्योरा पेश नहीं किया है। मोदी सरकार ने इस साल जनवरी अंत तक भारतीय प्रशासनिक सेवा के सभी अधिकारियों से अपनी अचल संपत्ति रिटर्न का ब्योरा पेश करने को कहा था लेकिन देशभर के 1856 अधिकारी 2016 की अपनी रिटर्न के बारे में जानकारी देने में असफल रहे हैं। इनमें सबसे ज्यादा 255 अधिकारी उत्तर प्रदेश कैडर के हैं।

कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग के ताजा आंकड़ों के मुताबिक जिन आईएएस अधिकारियों ने 2016 में अपने आईपीआर जमा नहीं किये उनमे राजस्थान के 153 मध्य प्रदेश 118 पश्चिम बंगाल 109 अरुणाचल प्रदेश के गोवा मिजोरम के 104 कर्नाटक के 82 आंध्र प्रदेश के 81 बिहार के 74 ओडिशा के 72 असम मेघालय के 70 पंजाब के 70 महाराष्ट्र के 67 मणिपुर त्रिपुरा के 64 और हिमाचल प्रदेश के 60 अधिकारी हैं।

गुजरात कैडर के 56 झारखंड 55 हरियाणा 52 जम्मू और कश्मीर 51 तमिलनाडु 50 नागालैंड के 43 केरल 38 उत्तरांचल 33 सिक्किम 29 और तेलंगाना के 26 अधिकारियों ने 2016 में अपने आईपीआर जमा नहीं किए।

नियमों के मुताबिक अफसरों को भी सरकार के समक्ष अपनी संपत्ति और कर्ज का ब्योरा पेश करना होता है। यही नहीं सरकार के आदेश के बिना अधिकारी 5000 रुपये से अधिक कीमत का कोई गिफ्ट भी स्वीकार नहीं कर सकते। नियमों के मुताबिक अपने परिजन या मित्र की ओर से भी 25000 रुपये से अधिक का गिफ्ट मिलता है तो उसको रिटर्न में दाखिल करना आवश्यक है।

25 अप्रैल थी अंतिम तारीख

सरकार ने आइएएस अफसरों से 15 अप्रैल तक अपनी चल.अचल संपत्ति का ब्योरा मांगा था। बाद में मुख्य सचिव राहुल भटनागर ने अंतिम तारीख बढ़ाकर 25 अप्रैल कर दी थी। तारीख बढ़ाने के बाद भी 255 अफसरों ने अपनी चल संपत्ति का ब्योरा नहीं दिया। इसके बाद तीन मई को मुख्य सचिव ने प्रमुख सचिव नियुक्ति के जरिए सभी विभागों के प्रमुख सचिवों की एक बैठक बुलाई लेकिन यह बैठक नहीं हो सकी। इसके बाद अगले दिन पर बैठक टाली गई।

अफसरशाही के भ्रष्टाचार को रोकने के लिए प्रदेश सरकार हर संभव प्रयास कर रही है। यादव सिंह आज जेल में हैंए प्रदीप शुक्ला जेल में हैं इसके पीछे केंद्र की भाजपा सरकार की इच्छाशक्ति है। 50 साल के ऊपर के भ्रष्ट अफसरों को रिटायरमेंट देंगे। किसी को नहीं बख्शा जाएगा।

शलभमणि त्रिपाठी प्रवक्ता उप्र भाजपा

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