सड़क के किनारे रखी जाने वाली मूर्तियों की दुर्दशा देख तीन लोगों ने शुरू की ये अनोखी मुहिम

सड़क के किनारे रखी जाने वाली मूर्तियों की दुर्दशा देख तीन लोगों ने शुरू की ये अनोखी मुहिमपर्यावरण और आस्था को ध्यान में रखते हुए करते हैं विसर्जन

लखनऊ। नदियों और तालाबों में होने वाली गंदगी की एक वजह धार्मिक भी है। पूजा-पाठ के बाद प्रवाहित की गई मूर्तियां और फूल माला पर्यावरण को नुकसान पहुंचाते हैं। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद प्रशासन सख्त हुआ तो लोग ईश्वर के प्रतीकों को सड़कों के किनारे और पेड़ों के पास ढेर लगाना शुरु कर दिया। लखनऊ में तमाम सड़कों और लगभग हर गली-मोहल्ले में ऐसी पेड़ दिख जाएंगे।

खंडित मूर्तियों और ईश्वर के प्रतीकों की दुर्दशा देख लखनऊ के ट्रांस गोमती इलाके में कई लोगों ने अभियान शुुरू किया है। ये लोग अपनी गाड़ी में इन मूर्तियों को भर कर ले जाते हैं, साथ ही पर्यावरण और आस्था को ध्यान में रखते हुए उनका विसर्जन करते हैं।

सीतापुर रोड पर केशवनगर निवासी एक कारपोरेट कंपनी में बतौर फाइनेंस मैनेजर कार्यरत मूल रूप से बिहार निवासी प्रह्लाद सिंह पिछले कई महीनों से अपने साथियों से इस मुहिम में जुटे हुए हैं। वो बताते हैं, " पहले हम उन मूर्तियों को पूजा करते हैं, माथा नवाते हैं, लेकिन बाद में उन्हें या तो नदी तालाब में फेंक देते हैं या फिर घर के आसपास किसी पेड़ या मंदिर के बाहर रखकर अपनी ही आस्था का मजाक उड़ाते हैं। इनकी दुर्दशा देखी नहीं गई तो इन्हें इकट्ठा कर डिस्पोजल करना शुरु किया।" शुरुआत में वो अकेले ही थे लेकिन अब उन्हें कई लोगों का साथ मिला है। डालीगंज के पार्षद रणजीत सिंह और बक्शी का तालाब में सामाजिक कार्यकर्ता नागेंद्र सिंह चौहान भी उनके साथ इस काम को आगे बढ़ाने में जुटे हैं।

तीनों लोग खुद ही वक्त निकालकर गली-मोहल्लों में घूमकर प्रहलाद सिंह की खुली जीप में इन्हें एकत्र करते हैं फिर गोमती नदी के किनारे बने विसर्जन केंद्रों पर लाते हैं। इस जीप पर देवी-देवताओं की जगह देश का झंडा और देवी देश के महापुरुषों की तस्वीरें लगी हैं। रणजीत सिंह बताते हैं, ये काम सिर्फ आस्था ही नहीं पर्यावरण के लिए भी जरूरी था, इसलिए प्रहलाद का साथ देना शुरु किया। फिलहाल केशवगर, राम-राम बैंक, डालीगंज समेत कई इलाकों से मूर्तियां एकत्र कर गोमती नदी के किनारे खाटू श्माम मंदिर के पास नगर निगम ने एक जगह आवंटित की हैं वहीं सभी मूर्तियों-फूल माला को डाला जाता है।" शहर की तरह कस्बों में भी खंडित मूर्तियों और पूजा पाठ के बाद बची सामाग्री नदी-तालाब और सड़के देखने को मिल जाएगी।

बीकेटी में चंद्रिका देवी मार्ग पर ऐसी कई मूर्तियों को देखकर स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता और पत्रकार नागेंद्र सिंह चौहान भी इस मुहित में भागीदार बन गए हैं। वो बताते हैं, मिट्टी की मूर्तियां तो फिर ठीक हैं लेकिन आजकल प्लास्टर ऑफ पेरिस की ज्यादा मूर्तियां बनती हैं, जो पानी को नुकसान पहुंचाते हैं, इसलिए इनका सही निस्तारण जरूरी है। ईश्वरीय प्रतीकों की दुर्दशा दुर्भाग्यपूर्ण है। अब लोग लोग ऐसी मूर्तियां तो एकत्र करते हैं लोगों को जागरुक भी कर रहे हैं कि मूर्तियां, पोस्टर और पूजन सामाग्री को इस तरह न फेंके।" लखनऊ में नगर निगम ने भी पक्के पुल, डालीगंज पुल, हनुमान सेतु के आसपास बोर्ड लगाकर लोगों को पूजा-पाठ की सामाग्री नदी में न फेंकने और चिन्हिंत गड्ढ़ों में डालने की अपील वाले बोर्ड लगा रखे हैं।

मंदिरों के फूल-माला से बनाई जा रही हैं अगरबत्ती

लखनऊ के बीकेटी स्थित चंद्रिकादेवी मंदिर, खाटू श्माम समेत कई मंदिरों में चढ़ाए जाने वाले फूल माला से अगरबत्ती बनाई जा रही हैं। कई वर्ष पहले सीमैप ने ये तकनीकि विकसित कर बीकेटी में दर्जनों महिलाओं को अगरबत्ती बनाने की ट्रेनिंग दी थी। इससे न सिर्फ प्रदूषण की समस्या से निजात मिल रही है बल्कि कई महिलाओँ को रोजगार भी मिल रहा है।

First Published: 2017-05-01 15:32:29.0

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