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यूपी पंचायत चुनाव : ग्रामीणों की सेवा में जुटे प्रधानी के दावेदार- जिसके घर में जितने वोट, उसकी उतनी सेवा

उत्तर प्रदेश में ग्राम पंचायत चुनाव की सुगबुगाहट और बढ़ गई है। मौजूदा प्रधान और इस बार अपनी किस्मत आजमा रहे प्रत्याशियों की गांवों में हलचल तेज हो गयी है। ग्राम पंचायत चुनावों से पहले क्या है गाँव का हाल, चुनावों को लेकर क्या कह रहे हैं ग्रामीण, पढ़िए रिपोर्ट ...

Kushal MishraKushal Mishra   3 Nov 2020 2:31 PM GMT

यूपी पंचायत चुनाव : ग्रामीणों की सेवा में जुटे प्रधानी के दावेदार- जिसके घर में जितने वोट, उसकी उतनी सेवाउत्तर प्रदेश में पंचायत चुनावों को लेकर तेज हुईं तैयारियां, गांवों में लगने लगे उम्मीदवारों की होर्डिंग्स। फोटो : गाँव कनेक्शन

उत्तर प्रदेश में साल 2021 में होने वाले ग्राम पंचायत के चुनावों को लेकर सरगर्मियां तेज हैं। कोरोना के चलते प्रधान, बीडीसी, पंच और जिला पंचायत के चुनाव की तारीखों का अभी ऐलान नहीं किया गया है लेकिन दावेदारों ने अभी से ताकत लगा रखी है। कस्बों के चौराहों पर होर्डिंग नजर आती हैं तो गांव के नुक्कड़ों और चौपालों में बैठकें सजने लगी है। दावेदार मतदाताओं के सुख-दु:ख में भागीदार होकर उनकी सेवा में जुटे हैं।

दूसरी बार प्रधानी का चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे एक नौजवान दावेदार ने नाम न छापने की शर्त कहा- "प्रधानी का चुनाव सांसदी (लोकसभा) से ज्यादा मु्श्किल है। अब हमारे ही परिवार से 3 लोग दावेदार हैं और 1500 वोटर पर अब तक मोटा मोटी 10 जने (उम्मीदवार) सामने आ चुके हैं। एक-एक वोट का हिसाब रखना और उसको बात-बात समझानी है। पिछले एक साल से हमारा पूरा समय इसी में जा रहा है।" वो समय के बारे में तो बताते हैं, लेकिन कितना खर्च हुआ इस पर कुछ नहीं बोलते, बस इतना कहते हैं, "बस गांव वालों की सेवा में लगे हैं।"

उत्तर प्रदेश की 58,758 ग्राम पंचायतों, 75 जिला पंचायत और 821 क्षेत्र पंचायतों (बीडीसी) के प्रधान, पंच, सदस्यों और अध्यक्षों का कार्यकाल इसी साल 25 दिसंबर को समाप्त हो रहा है। राज्य निर्वाचन आयोग की ओर से उत्तर प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव को लेकर कार्यक्रम तय कर दिया है। वोटरों के नाम घटाने और बढ़ाने का पुनरीक्षण का कार्य लगभग पूरा हो गया है। 29 दिसंबर को मतदाता सूची को प्रकाशित किया जाएगा। कोरोना के चलते अभी चुनाव की तारीखों का ऐलान नहीं किया गया है, लेकिन माना जा रहा है साल 2021 में फरवरी से अप्रैल के बीच कभी भी चुनाव हो सकते हैं।

इसके अलावा नगर निकायों के सीमा विस्तार से प्रदेश की राजधानी लखनऊ समेत 42 जिले समेत प्रभावित हुए हैं। ऐसी ग्राम पंचायतों के परिसीमन का कार्य भी नवम्बर के महीने में पूरा किये जाने हैं। पहले चरण में गोंडा, संभल, मुरादाबाद और गौतमबुद्ध नगर जिलों में ग्राम पंचायतों के पुनर्गठन का कार्य शुरू किया जाना है। ऐसे में मौजूदा प्रधान जिन्हें फिर से चुनाव लड़ना है वो अपने विकास कार्यों और किन्हीं कार्यों से रुके पड़े कार्यों को जल्द से जल्द पूरा करवाने में जुटे हैं तो बाकी चुनाव में उतरने को तैयार दावेदार न सिर्फ वोटरों को खुश करने कोशिश में है बल्कि वो मौजूदा प्रधानों के कमियां भी गिना रहे हैं।

अपने कार्यों से राष्ट्रीय स्तर पर तीन बार दीन दयाल उपाध्याय पंचायत सशक्तिकरण और दो बार नानाजीद देशुमख राष्ट्रीय गौरव ग्राम प्रधान पुरस्कार जीत चुके सिद्दार्थनगर जिले के हसुडी औसान ग्राम पंचायत के प्रधान दिलीप त्रिपाठी कहते हैं, "अब दिसंबर में कार्यकाल खत्म हो रहे हैं तो नए चुनाव तो होने ही हैं। लेकिन हमारा फोकस अभी अपनी ग्राम पंचायत के बाकी पड़े विकास कार्यों को पूरा करने पर हैं, चुनाव जब होंगे तब होंगे। कोरोना के चलते कई लंबित रह गए हैं उन्हें पूरा कराना है।"

बाराबंकी जिले में सूरतगंज ब्लॉक के एक गाँव के बाहर चाय की दुकान पर चुनावों को लेकर चर्चा करते ग्रामीण। फोटो : गाँव कनेक्शन

यूपी के गांवों में इन दिनों धान की कटाई लगभग हो चुकी है। किसानों की नई फसल की बुवाई के साथ ही प्रधानी के चुनाव को लेकर बैठकों का दौर भी चल रहा है। ब्लॉक और तहसीलों की हर चाय की गुमटी और मिठाई की दुकानों पर चुनाव के ही चर्चे सुनने को मिलते हैं। बाराबंकी जिले में सूरतगंज ब्लॉक के एक गाँव के बाहर चाय-समोसे की छोटी सी दुकान पर इस बार के प्रत्याशी मो. शरीफ के साथ ग्रामीणों की यह चर्चा और जोर पकड़ने लगती है।

कोयले की भट्टी पर चाय को खौलाते हुए रामू यादव (46 वर्ष) हल्के-फुल्के अंदाज में कहते हैं, "आजकल प्रधान जी की मोटरसाइकिल की टंकी बिल्कुल फुल रहती है। प्रधान जी किसी को न नहीं कहते हैं, अस्पताल से लेकर ब्लॉक (ब्लॉक मुख्यालय) तक जिसको जहां जाना होता है प्रधान जी तैयार हैं।" दुकान पर बैठे और लोग उनकी हां में हां मिलते हैं तो प्रधान पद के उम्मीदवार मो. शरीफ भी तपाक से कहते हैं, "जब जनता हमें प्रधान बनाएगी तो जनता की सेवा के लिए जो कुछ होई, हम करेंगे।"

त्रिस्तरीय चुनाव में ग्राम प्रधान,वार्डों के पंच के साथ ही क्षेत्र पंचायत सदस्य, जिला पंचायत सदस्यों का भी चुनाव होता है। इसलिए चुनाव की तैयारियां जिला मुख्यालय से लेकर गांव की नुक्कड़ तक नजर आती हैं। कई जिला पंचायत के सदस्यों ने जिला मुख्यालय में सड़कों और हाईवे के किनारे बड़ी-बड़ी होर्डिंग लगवाई हैं तो बीडीसी और प्रधान के दावेदारों ने कस्बों से लेकर बाजारों के बाहर बोर्ड लगाकर अपने को दावेदार घोषित किया है। कई होर्डिंग से राजनीतिक पार्टी के नेताओं के भी फोटो नजर आते हैं, लेकिन असल चुनाव लड़ाई गांव के अंदर लड़ी जा रही है।

खुले शब्दों में कोई कुछ नहीं बोलता है लेकिन दबे शब्दों में कई लोग बताते हैं कि कैसे प्रधानी के दावेदारों की गाड़ियां इन दिनों टैक्सी नजर आती हैं तो शराब और मुर्गों की पार्टियां भी चलती हैं। चार साल तक सीधे मुंह बात न करने वाले प्रधान लोगों के घर-घर जाकर दिक्कतें पूछ रहे हैं।

बाराबंकी के सूरतगंज ब्लॉक में एक गाँव के बाहर चाय की दुकान पर मौजूदा प्रधान द्वारा गांव में कराए गए कामों की चर्चा करते ग्रामीण। फोटो : गाँव कनेक्शन

बाराबंकी के ही सूरतगंज ब्लॉक के छेदा गाँव के बाबादीन (55 वर्ष) बताते हैं, "अभी यह मानिए कि हमारे ग्राम पंचायत में मौजूदा प्रधान और जो भी पांच-छह लोग पंचायत चुनाव लड़ना चाह रहे हैं, वह जब भी सामने पड़ जाते हैं तो बिना हालचाल लिए आगे नहीं बढ़ते। कई लोग पूछ चुके हैं कोई समस्या हो तो बताना। मैं आसपास भी देख रहा हूं, मुंडन से लेकर दसवां-तेरहवीं तक दावेदार सबके सुख-दु:ख में शामिल हो रहे हैं। और यहां भी गाहे-बगाहे चुनाव की चर्चा चल ही पड़ती है।"

सुबह से शाम तक लोगों के काम करवाने की कोशिश करता हूं, जो हमसे बन पड़ता है वह हम लोगों के लिए करते हैं, अगर हमारी पंचायत के लोगों ने हमें एक मौका दिया तो हर समस्या का निदान करूंगा।

मो. शरीफ, प्रधान पद के उम्मीदवार, सूरतगंज, बाराबंकी

बाराबंकी से करीब 100 किलोमीटर दूर सीतापुर के पिसावां ब्लॉक के नेरी ग्राम पंचायत निवासी टिंकू अर्कवंशी (32 वर्ष) बताते हैं, "अब तक हमारे घर में आधा दर्जन लोग अपनी उम्मीदवारी जताने आ चुके हैं। मतलब जो कभी भी हालचाल नहीं पूछते थे, वो नेता जी लगातार बड़े-बुजुर्गों के चरणवंदना किये जा रहे हैं।"

पंचायत चुनाव की चर्चा के बीच इसी गाँव के कुछ युवक दबी जुबान में यह भी बताते हैं कि एक प्रत्याशी ने तो गाँव में लोगों से मिलने-जुलने के लिए हाल में आल्हा गीतों का ख़ास कार्यक्रम भी रखा था, मगर कार्यक्रम के बीच पुलिस आ पहुंची और सारा कार्यक्रम बंद करा दिया।

जो भी प्रत्याशी प्रधानी का चुनाव लड़ने के बारे में सोच रहे हैं, वह अपने-अपने लोगों के वोटर लिस्ट में शामिल करने के प्रयास शुरू कर दिए हैं, लोगों से मिलना-जुलना भी बढ़ा दिया है। सब जोड़-तोड़ तो शुरू हो चुका है।

रजनीश सिंह, ग्राम पंचायत सलेमपुर, सीतापुर

सीतापुर जिले में ही मुख्यालय से सटी हुई ग्राम पंचायत सलेमपुर के रहने वाले रजनीश सिंह (28 वर्ष) बताते हैं, "जो भी प्रत्याशी प्रधानी का चुनाव लड़ने के बारे में सोच रहे हैं, वह अपने-अपने लोगों के वोटर लिस्ट में शामिल करने के प्रयास शुरू कर दिए हैं, लोगों से मिलना-जुलना भी बढ़ा दिया है। सब जोड़-तोड़ तो शुरू हो चुका है।"

सीतापुर से करीब 95 किलोमीटर दूर शाहजहांपुर की ग्राम पंचायतों में भी चुनावी सरगर्मियां तेज हैं। शाहजहांपुर के तिलहर ब्लॉक के बतलैया गाँव पहुँचने पर पंचायत चुनाव को लेकर कुछ प्रत्याशियों के रंग-बिरंगे पोस्टर चौराहों पर लगे दिखाई दिए।

शाहजहांपुर के तिलहर ब्लॉक के बतलैया गाँव में पंचायत चुनाव को लेकर गांवों में बढ़ती सरगर्मियों के बारे में चर्चा करते ग्रामीण। फोटो : गाँव कनेक्शन

गाँव में अपने घर के बाहर हाथ में लट्ठ लिए बैठे रोशन लाल पंचायत चुनाव पर सवाल पूछने पर पास में बैठे एक और बुजुर्ग के कानों में कुछ बुदबुदाने लगते हैं। तभी पास में बैठे एक युवा ओम प्रकाश गंगवार पंचायत चुनावों में रुपये-पैसे ले देकर मतदाताओं का वोट अपनी तरफ करने की घटनाओं का जिक्र करते हैं।

ओम प्रकाश (34 वर्ष) बताते हैं, "कई बार लोग पाँच सौ से लेकर एक हजार रुपये तक में अपना मत बेच देते हैं, प्रधानी के चुनाव में ऐसी घटनाएँ अकसर होती हैं, लेकिन इसका बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है। जिन लोगों ने पैसे ले लिए होते हैं वह दोबारा गाँव में विकास संबंधी कोई बात भी नहीं कर पाते हैं क्योंकि उन्होंने पैसे जो लिए थे। चुनावों में यह सब नहीं होना चाहिए।"

जब तक चुनाव हैं तब तक प्रधान आपका हर काम करवा देगा, कहो तो आपके घर का भी काम करा देवे, एक बार चुनाव जीत जाते हैं तो फिर पूछने नहीं आते कि सब सही है, कोई दिक्कत तो नहीं।

रोशन लाल, बतलैया गाँव, तिलहर, शाहजहांपुर

ओम प्रकाश के बगल में बैठे रोशन लाल कहते हैं, "जब तक चुनाव हैं तब तक प्रधान आपका हर काम करवा देगा, कहो तो आपके घर का भी काम करा देवे, एक बार चुनाव जीत जाते हैं तो फिर पूछने नहीं आते कि सब सही है, कोई दिक्कत तो नहीं।"

शाहजहांपुर जिले के ही तिलहर तहसील के ही ग्राम सभा हाजीपुर में एक देव स्थान पर पेड़ के नीचे बैठे ग्रामीण पंचायत चुनाव पर चर्चा करते नजर आये। इसी बैठक में शामिल महेंद्र पाल से पंचायत चुनाव पर सवाल पूछने पर वह सामने लगे एक प्रत्याशी के पोस्टर की ओर इशारा करते हैं।

शाहजहांपुर जिले के तिलहर तहसील के ग्राम सभा हाजीपुर में पंचायत चुनावों को लेकर चर्चा करते ग्रामीण। फोटो : गाँव कनेक्शन

महेंद्र पाल कहते हैं, "गाँव में अभी कुछ दिनों पहले ही कई जिला पंचायत सदस्य के प्रत्याशी अपने अपने पोस्टर लगा चुके हैं। मगर देखो भइया चुनाव आते ही पान-पुड़िया चलने लगती है। यह सब खिलाना-पिलाना शुरू कर देते हैं लोग, खर्चा पानी करते हैं। मगर देखो वोट केवल विकास पर ही नहीं मिलता है।"

"वोट पाने के लिए व्यवहार भी देखना पड़ता है। अब पीछे के ही कुछ चुनाव देख लो। जिन्होंने विकास कराया लेकिन अपना व्यवहार खराब किया, वह हार गए," महेंद्र कहते हैं और पास में बैठे अन्य ग्रामीण उनकी बात पर हाँ में हाँ मिलाते दिखे।

वोट पाने के लिए व्यवहार भी देखना पड़ता है। अब पीछे के ही कुछ चुनाव देख लो। जिन्होंने विकास कराया लेकिन अपना व्यवहार खराब किया, वह हार गए।

महेंद्र पाल, ग्राम सभा हाजीपुर, तिलहर, शाहजहांपुर

फिलहाल उत्तर प्रदेश के पंचायत चुनावों में वोट को लेकर जाति समीकरण भी बड़ा मुद्दा रहा है। कई बार जातीय विवाद के मामले भी गांवों में तनाव का रूप अख्तियार करते हैं। ऐसे में ग्राम पंचायत के चुनावों की तैयारी के बीच इस बार यूपी पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने ऐसे घटनाओं से बचने के लिए इंटेलिजेंस और एलआईयू को गांवों में अवैध संबंधों को लेकर भी जानकारी एकत्र करने के आदेश दिए हैं।


राजधानी लखनऊ से सटे उन्नाव जिले के सिकंदरपुर कर्ण ब्लॉक के मैकुआ खेड़ा गाँव के युवा अंकित यादव भी इस बार पंचायत चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हैं। अंकित (28 वर्ष) बताते हैं, "अगर चुनाव लड़ना है तो लोगों से प्यार से मिलना पड़ेगा, उनका दुःख-दर्द सुनना पड़ेगा। अगर किसी का राशन कार्ड नहीं बना है तो अपने पैसे से ऑनलाइन उसका कार्ड बनवा रहा हूं। पेंशन नहीं आ रही है तो उसकी सिफारिश कर पेंशन शुरू करा रहा हूं। आखिर यही सब देख कर तो लोगों को मदद का भरोसा होगा।"

अगर चुनाव लड़ना है तो लोगों से प्यार से मिलना पड़ेगा, उनका दुःख-दर्द सुनना पड़ेगा। अगर किसी का राशन कार्ड नहीं बना है तो अपने पैसे से ऑनलाइन उसका कार्ड बनवा रहा हूं। पेंशन नहीं आ रही है तो उसकी सिफारिश कर पेंशन शुरू करा रहा हूं। आखिर यही सब देख कर तो लोगों को मदद का भरोसा होगा।

अंकित यादव, मैकुआ खेड़ा गाँव, सिकंदरपुर कर्ण, उन्नाव

दूसरी ओर उन्नाव के ही बिछियां विकासखंड के बेहटा नथई सिंह के मजरा शिवदीन खेड़ा के ऋषिराम शर्मा का सात लोगों का परिवार आज भी छप्पर के नीचे कच्चे घर में रहता है। अब तक उनके परिवार को आवास नहीं मिल सका।

पंचायत चुनाव की सुगबुगाहट को लेकर ऋषिराम बताते हैं, "अब फिर चुनाव आने वाला है तो लोग हमारे दुःख को पहचानने लगे हैं, हमारा टूटा जर्जर घर दिखाई देने लगा है। चुनाव की तैयारी कर रहे लोग अब अक्सर आते हैं और हमारे दुःख को अपना बताते हैं।"

"पहले जिनके पास हम मिलने जाते थे आज वो हमारे घर चलकर हमसे मिलने आ रहे हैं। लोगों के स्वभाव में यह परिवर्तन देख कर अब लगने लगा है कि शायद पंचायत चुनाव नजदीक आ गया है," ऋषिराम कहते हैं।

उत्तर प्रदेश में नेहरु युवा मंडल की सरकारी नौकरी छोड़ कर पिछले कई वर्षों से ग्राम पंचायतों के कार्यों और जिम्मेदारियों को लेकर पंचायतों में तीसरी सरकार नाम से जागरुकता अभियान चला रहे डॉ. चंद्रशेखर प्राण अभी भी चुनावों को लेकर ग्रामीणों में जागरुकता का आभाव होने की बात कहते हैं।

वास्तव में एमएलए-एमपी के चुनाव में आप अपना प्रतिनिधि चुनते हैं जो जाकर निर्णय लेगा, मगर ग्राम पंचायत में निर्णय का अधिकार तो खुद ग्रामीणों को है और उन्हें क्रियान्वित करने वाला प्रधान होता है, इसलिए मतदाताओं को ऐसे प्रधान को चुनना चाहिए जो गांवों के विकास के लिए अपनी पंचायत में सही तरीके से क्रियान्वयन करा सके, यहाँ तक कि ग्रामीणों के पास यह भी अधिकार है कि प्रधान को हटा सके, इसलिए मतदाताओं को बहुत सूझ-बूझ कर मत देना चाहिए, न कि जाति समीकरण में फंसकर।

डॉ. चंद्रशेखर प्राण, प्रमुख, तीसरी सरकार अभियान

डॉ. चंद्रशेखर प्राण 'गाँव कनेक्शन' से बताते हैं, "लोग ग्राम पंचायत के चुनाव को आम तौर पर सिर्फ प्रधानी का चुनाव कहते हैं, जो गलत धारणा है। यह ग्राम पंचायत का चुनाव है और एक प्रधान ग्राम सभा के लिए गए निर्णयों को पंचायत में सिर्फ क्रियान्वित करने का काम करता है।"

"वास्तव में एमएलए-एमपी के चुनाव में आप अपना प्रतिनिधि चुनते हैं जो जाकर निर्णय लेगा, मगर ग्राम पंचायत में निर्णय का अधिकार तो खुद ग्रामीणों को है और उन्हें क्रियान्वित करने वाला प्रधान होता है, इसलिए मतदाताओं को ऐसे प्रधान को चुनना चाहिए जो गांवों के विकास के लिए अपनी पंचायत में सही तरीके से क्रियान्वयन करा सके, यहाँ तक कि ग्रामीणों के पास यह भी अधिकार है कि प्रधान को हटा सके, इसलिए मतदाताओं को बहुत सूझ-बूझ कर मत देना चाहिए, न कि जाति समीकरण में फंसकर," डॉ. चंद्रशेखर कहते हैं।

चुनाव की तैयारियों को लेकर सवाल करने पर कन्नौज के जिला निर्वाचन अधिकारी बिनीत कटियार कहते हैं, "मतदाता सूची पुनरीक्षण का कार्य लगभग पूरा हो चुका है। बीएलओ (बूथ लेवल ऑफिसर) ने उन्हें बृहस्पतिवार (4 नवंबर) से जमा करना शुरू कर दिया है।"

गांवों में वोटर लिस्ट में नए नाम जोड़ने और मृतक मतदाताओं आदि के नाम हटाने को लेकर लिस्ट को अपडेट किया जा रहा है। ये काम दो तरीके से हो रहा है एक तो डोर टू डोर, दूसरा ऑनलाइन भी लिस्ट अपडेट कराई जा सकती है। तैयार सूची को कंप्यूटर में फीड कर 29 दिसंबर को अंतिम मतदाता सूची को प्रकाशित किया जाएगा।

पंचायत के चुनाव बैलेट पेपर से होते हैं, जिसके लिए जिलों में मतपेटियों की मरम्मत शुरू हो गई है तो कई जिलों में बैलेट पेपर मंगवाने की तैयारियां जारी है। बैलेट पेपर में छपे चिन्हों को ही प्रत्याशियों को अलॉट किया जाएगा।

(इनपुट : बाराबंकी से वीरेन्द्र सिंह, शाहजहांपुर से राम जी मिश्रा, उन्नाव से सुमित यादव और सीतापुर से मोहित शुक्ला)

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