यूपी पशुपालकों के लिए मुसीबत बनी कामधेनु योजना, इस तरह हो रहा घाटा

यूपी पशुपालकों के लिए मुसीबत बनी कामधेनु योजना, इस तरह हो रहा घाटाइस योजना से पशुपालकों को हो रहा घाटा।

स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क

लखनऊ। दुग्ध व्यवसाय को बढ़ावा देने के लिए पिछली सरकार की तरफ से वर्ष 2013 में कामधेनु योजना, वर्ष 2014 में मिनी कामधेनु योजना और वर्ष 2015 में माइक्रो कामधेनु योजना की शुरुआत की गई थी। इस योजना को शुरू तो किया लेकिन धरातल स्तर पर यह पशुपालकों को लाभ नहीं पहुंचा पाई।

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“जब कामधेनु योजना आई थी तब बड़े-बड़े सपने दिखाए गए थे, ये लाभ होगा वो लाभ पर हकीकत में कुछ नहीं हुआ। आज हम कर्ज में डूबे हुए हैं। हमारे ऐसोसिएशन के पांच लोगों की डिप्रेशन में आकर मौत हो गई।” ऐसा बताते हैं, अमरोहा जिले के ‘कामधेनु डेयरी फार्मर्स वेलफेयर एसोसिएशन’ के सदस्य डॉ. सुरेश चंद्र (55 वर्ष)।

सुरेश ही नहीं बल्कि प्रदेशभर के कामधेनु लाभार्थिंयों ने अपनी समस्याओं को सरकार के सामने रखा। डॉ. सुरेश आगे बताते हैं, “हर महीने घाटे में रहते हैं। हर महीने पशुओं के चारा में करीब एक लाख रुपए का खर्च आता है। भले ही लोगों तक 50 से 55 रुपए लीटर के बीच दूध मिलता हो पर हम लोगों से 20 से 25 रुपए लीटर तक ही दूध खरीदा जाता है।”

लखनऊ के डालीबाग में स्थित गन्ना संस्थान में प्रदेशभर से कामधेनु योजना के पशुपालकों की बैठक का आयोजन किया गया। बैठक में दुग्ध विकास मंत्री लक्ष्मीनारायण चौधरी, राज्यमंत्री पशुधन जय प्रकाश निषाद, प्रमुख सचिव पशुधन डॉ. सुधीर एम बोबडे के साथ कई अधिकारी मौजूद रहे।

मथुरा जिले से आए तेज पाल सिंह (50 वर्ष) ने बताया, “इस योजना के तहत जो भी गाय आई वो यहां की जलवायु के अनुकूल ही नहीं है। दूध का सही रेट मिलना डेयरी संचालकों की सबसे बड़ी समस्या है। जितनी लागत आती है उतने आधा का भी रेट नहीं मिल पाता है। दूध के रेट से सिर्फ लेबर कॉस्ट और भैंस का चारा ही आ पाता है। बैंक में ऋण का भुगतान करना पड़ता है।” पिछले तीन वर्षों से तेजपाल डेयरी संचालित कर रहे है।

कामधेनु योजना की समस्याओं का दूर किया जाए

बैठक में दुग्ध मंत्री लक्ष्मी नारायण चौधरी ने कहा, “कामधेनु योजना को बंद नहीं किया जाएगा। आने वाले एक सप्ताह में इस पर कमेटी बनाकर इस समस्या का हल किया जाएगा। इसके अलावा प्रदेश में एचएफ ब्रीड को समाप्त किया जाएगा। देशी गायों को बढ़ावा देने के लिए गाय के दूध से बने उत्पादों का ऐसे प्रचार-प्रसार किया जाए ताकि आम जनता का आर्कषण बढ़े। लोगों तक गाय का दूध पंहुच सके। गाय और भैंस के दूध की अलग-अलग यूनिट लगाई जाएंगी, जिसमें दूध का सही मूल्य तय होगा।”

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