उत्तर प्रदेश

वर्ल्ड एनिमल डे : पशुपालन विभाग को विश्व पशु दिवस के बारे में पता ही नहीं

स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क

लखनऊ। देश में पशुधन के मामले में सबसे आगे रहने वाले उत्तर प्रदेश के पशुपालन विभाग को ही विश्व पशु दिवस के बारे में कोई जानकारी नहीं। यहां तक कि जिला स्तर से लेकर शासन तक पशु दिवस मनाए जाने जैसी कोई गतिविधि देखने को नहीं मिली।

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पशुओं के अधिकारों के बारे में जागरुकता फैलाने के लिये दुनिया भर में हर साल चार अक्टूबर के दिन को विश्व पशु दिवस के रूप में मनाया जाता है। इसकी शुरूआत 1931 में इटली के फ्लोरेंस शहर से हुई थी। विश्वभर में मनुष्यों के साथ-साथ अन्य जीव-जंतुओं के जीवन और अधिकारों की रक्षा के प्रति जागरूकता फैलाने और मानव जीवन में पशुओं के महत्व व योगदान को दर्शाने का प्रयास किया जाता है। चार अक्टूबर सैंट फ्रैंसिस का फीस्ट डे होता है। सैंट फ्रैंसिस को पशुओं और पर्यावरण का हितैषी संत माना जाता है।

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''इस बारे मे हमे कोई भी निदेशालय से सूचना नहीं प्राप्त हुई है। आदेश मिलने पर ही कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है। आज हम लोगों को फसल ऋण मोचन योजना के कार्यक्रम में ड्यूटी लगा दी गई है। पशुपालन विभाग द्वारा कभी भी इस दिवस नहीं मनाया गया है। तो हम जानते भी नहीं है।'' ऐसे बताते हैं, कानपुर देहात के मुख्यपशुचिकित्साधिकारी डॅा. कृपाल सिंह।

हमारे जिले आज ऐसे कोई भी दिवस का आयोजन नहीं किया गया है। कुछ गिने-चुने कार्यक्रम होते हैं जिनके लिए निदेशालय में पत्र भी आता है। इसके लिए कोई पत्र भी नहीं आया है। हम लोग ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों को जागरुक करते रहते है।
डॅा. आरपी यादव, पशुचिकित्साधिकारी, सीतापुर

हमारे देश में पशुपालन ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों की आय का एक बड़ा जरिया है। भारत में सबसे ज्यादा दुधारु पशु हैं और दुनिया में सबसे ज्यादा दूध का उत्पादन भी देश में ही होता है। 19वीं पशुगणना के अनुसार भारत में कुल 51.2 करोड़ पशु है जो कि विश्व के कुल पशुओं का लगभग 20 प्रतिशत है।

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पशुपालन विभाग के प्रशासन एवं विकास निदेशक डॅा. चरण सिंह ने बताया, "इसको मनाने के लिए कोई बजट नहीं आता है और पिछले कुछ समय से अपनी मांगों को लेकर पशुचिकित्सक हड़ताल पर है। पशुचिकित्सालयों में पशुचिकित्सक मौजूद ही नहीं है तो कोई कार्यक्रम का आयोजन नहीं हो सकता है।"

जहां अधिकारी ही विश्व पशु दिवस को लेकर जागरूक नहीं है, वहीं ग्रामीण क्षेत्रों के पशुपालकों को कौन जागरुक करेगा। बरेली जिले से करीब 15 किमी. दूर अखां गाँव के राजेश यादव डेयरी चलाते है। राजेश बताते हैं, ''शहर से बहुत करीब में हमारा गाँव लगता है पर कोई भी सरकारी डॅाक्टर यहां नहीं आता है तो दिवस मनाने कौन आएगा। इस दिवस के बारे में भी हमे कोई जानकारी नहीं है।"

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देश की लगभग 70 प्रतिशत आबादी कृषि एवं पशुपालन पर निर्भर है। छोटे और सीमांत किसानों के पास कुल कृषि भूमि की 30 प्रतिशत जोत है। इनमें से 70 प्रतिशत कृषक पशुपालन व्यवसाय से जुड़े है जिनके पास कुल पशुधन का 80 प्रतिशत भाग मौजूद है। इससे यह स्पष्ट है कि देश अधिकांश पशुधन आर्थिक रुप से निर्बल वर्ग के पास है। भारत की कुल राष्ट्रीय आय का दस फीसदी हिस्सा पशुधन से आता है।

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