कौन हैं ये प्रधानपति-प्रधानपुत्र?

Neetu SinghNeetu Singh   24 April 2017 2:42 AM GMT

कौन हैं ये प्रधानपति-प्रधानपुत्र?प्रतीकात्मक फोटो।

स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क

लखनऊ। “हम ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं है। प्रधानी के चुनाव में गाँव में महिला सीट अरक्षित थी। बेटे की जिद के कारण चुनाव लड़ी और जीत गई। जीत तो गये हैं पर प्रधानी का सारा काम मेरा बेटा ही देखता है। मैं घर का काम देखूं या प्रधानी करूं।” ये कहना है कानपुर देहात के रसूलाबाद ब्लॉक की लाला भगत ग्राम पंचायत की महिला प्रधान राम देवी (65 वर्ष) का।

उत्तर प्रदेश में रामदेवी पहली महिला ग्राम प्रधान नहीं हैं, जिनका ये कहना है, जिन गाँवों में महिला प्रधान हैं कमोवेश सबका ये ही हाल है।

कानपुर देहात के पंचायत राज अधिकारी अजय कुमार श्रीवास्तव ने फ़ोन पर बताया, “यदि महिला प्रधान शिक्षित हों तो उसे पंचायत के कार्य करने में कोई असुविधा नहीं होगी। जो पढ़ी-लिखी महिला प्रधान हैं वो सारा काम खुद करती हैं। यदि महिला सीट आरक्षित है तो वहां की उम्मीदवार की कितनी योग्यता हो, इसका भी नियम बनाया जाए।”

रामदेवी कानपुर देहात के रसूलाबाद ब्लॉक की लाला भगत ग्राम पंचायत की महिला प्रधान हैं। बुजुर्ग और निरक्षर होने की वजह से प्रधानी का सारा काम इनके बेटे दिनेश पाल (42 वर्ष) करते हैं। दिनेश पाल का कहना है, “ प्रधान के जिम्मे बहुत से काम होते हैं। काम की वजह से रोजाना कई जगह जाना पड़ता है। अब इस उम्र में अम्मा इतना काम तो कर नहीं सकती। जहां अम्मा के बिना काम नहीं चल सकता है, वहां इन्हें लेकर जाता हूं।” वो आगे बताते हैं, “घर के कामों की जिम्मेदारी भी तो इन्हें पूरी करनी होती है। यदि ज्यादा भागदौड़ कर लें तो बीमार पड़ जाती हैं।”

अब हम कहां-कहां जाएं। हमारे गाँव से 25 किलोमीटर दूर ब्लॉक है और 70 किलोमीटर पर जिला मुख्यालय। ऐसे में हर जगह मेरा पहुंचा पाना मुश्किल होता है। ज्यादातर जगहों पर मेरे पति ही जाते हैं। जहां पर मजबूरी होती है, वहां पर मुझे ही जाना पड़ता है।
गायत्री देवी, ग्राम प्रधान, मलपुर गाँव, कानपुर देहात

कानपुर देहात के जिला मुख्यालय से 70 किलोमीटर दूर रसूलाबाद ब्लॉक के कुर्सी भीतरगाँव की रहने वाली चन्द्रकान्ती देवी (65 वर्ष) को जब फ़ोन किया तो उनके बेटे ने फोन उठाया। प्रधान पुत्र ललित ने बताया, “कहीं मीटिंग या बैंक में साइन करने जाना होता है तो मां को लेकर जाता हूं। पंचायत के काम बहुत ज्यादा होते हैं। हर जगह मां को लेकर जाना संभव नहीं हो पाता है। प्रधानी का सारा काम मैं ही देखता हूं।”

इस संदर्भ में कानपुर देहात के झींझक ब्लॉक के एडीओ पंचायत मोहम्मद राशिद का कहना है, “ जिस पंचायत में महिला प्रधान शिक्षित है वहां अच्छा काम हो रहा है। पढ़ी-लिखी महिला प्रधान हमेशा अपने पतियों को गलत काम होने से रोकती हैं।” वो आगे बताते हैं, “एक निरक्षर और बुजुर्ग महिला प्रधान कहीं घूम नहीं सकती है। यदि महिला प्रधानों का अलग से प्रशिक्षण हो तो वो और बेहतर काम करें, क्योंकि पुरुषों के साथ ट्रेनिंग में वो खुलकर बोल नहीं पाती हैं। आधा-अधूरा सीखकर चली जातीं हैं, जिससे वो खुद काम नहीं कर पाती हैं।”

ग्राम पंचायतों के अधिकारों के लिए देश भर में तीसरी सरकार कार्यक्रम चला रहे हैं चंद्रशेखर प्राण बताते हैं, “73वें संविधान संशोधन के बाद उत्तर प्रदेश में पंचायत राज अधिनियम की स्थिति अभी बहुत कमजोर है। यदि महिला प्रधान की सीट आरक्षित की गयी है तो उनके लिए अलग से व्यवस्थाएं भी की जाएं।” वो आगे बताते हैं, “महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए पंचायत में भागीदारी हो इसके लिए सीट तो आरक्षित कर दी गयी हैं, जो खानापूर्ति ही साबित हो रही हैं। जो महिला प्रधान खुद सारा काम कर रही हैं, ऐसी महिलाओं का प्रतिशत अभी बहुत कम है। महिलाएं खुद बढ़-चढ़ कर अपनी जिम्मेदारी और काम को पूरा करें, इसके लिए उन्हें जागरूक और अलग से प्रशिक्षण देने की व्यवस्था करनी होगी।”

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