क्यों जारी है गाँव से शहरों की तरफ मजदूरों का पलायन 

क्यों जारी है गाँव से शहरों की तरफ मजदूरों का पलायन मजदूर दिवस... सैकड़ों मजदूरों की रातें यूं ही फर्श पर कट जाती हैं।

लखनऊ। मुख्यमंत्री आवास से महज़ कुछ दूरी पर सड़क किनारे एक ऐसा घर हैं, जिसे आप घर नहीं कह सकते है। पुल निर्माण में इस्तेमाल होने वाले सीमेंट पाइप को मजदूर घर बनाकर रहने को मजबूर हैं।

सीमेंट पाइप को अपना घर बनाकर रहने वाले रामू (19 वर्षीय) को आज काम नहीं मिला है, गमछा से अपना पसीना पोछते हुए बताते हैं, '' मजदूरी के लिए शहर आना हमारी मजबूरी है। हमको गाँव में 250रूपए मजदूरी मिलती है, लेकिन जरूरी नहीं है कि रोज वहां पर काम मिल ही पाए। शहर में काम करने पर मजदूरी 350 रूपए मिलती है और यहां रोजाना काम भी मिल जाता है।''

रामू आगे बताते हैं, ''सरकार हमारे लिए कुछ नहीं करने वाली है। सरकार अगर कोई ऐसा काम करे जिससे हम लोगों को अपने गाँव से शहर के लिए पलायन न करना पड़े। कोई अपने परिवार से दूर रहना नहीं चाहता है। मजबूर हैं पलायन के लिए क्या करें?"

‘गाँव में काम करने से पैसा बिल्कुल ही नहीं बचता, जितना कमाओ उतना खत्म हो जाता है। पहले गाँव में खेतो में काम करता था, लेकिन परेशान होकर शहर चले आए। यहां पर पैसे बचत जाते है। हम ही नहीं हमारे जैसे कई और मजदूर हैं जो खेतो से मजदूरी छोड़कर शहर आ गये हैं।
एक मजदूर

भारतीय जनगणना 2011 के अनुसार देश में वर्ष 2011 तक 45.36 करोड़ लोगों ने काम की तलाश में पलायन किया है। इससे में 68 प्रतिशत ऐसे लोग शामिल थे, जिन्होंने काम के लिए गाँवों से शहर में पलायन किया।

कुशीनगर जिला मुख्यालय से लगभग 60 किलोमीटर दूरी पर स्थित जमुआन में रहने वाले विजय खरवार (45 वर्ष) अपनी कन्नी से ईंट में मसाला लगते हुए बताते हैं ‘‘गाँव में काम करने से पैसा बिल्कुल ही नहीं बचता, जितना कमाओ उतना खत्म हो जाता है। पहले गाँव में खेतो में काम करता था, लेकिन परेशान होकर शहर चले आए। यहां पर पैसे बचत जाते है। हम ही नहीं हमारे जैसे कई और मजदूर हैं जो खेतो से मजदूरी छोड़कर शहर आ गये हैं।''

लखनऊ में काम करती एक महिला. फोटो- बसंत कुमार

2009-10 में यूपी और मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड के 13 जिलों से करीब 62 लाख किसान-मजदूरों के पलायन करने का मामला डॉ. मनमोहन सिंह की अगुआई वाले के केंद्रीय मंत्रिमंडल की आंतरिक समिति के सामने आया था।

आंतरिक समिति की इस रिपोर्ट यूपी के हिस्से वाले बुंदेलखंड के झांसी से पांच लाख, 58 हजार, 377, बांदा जिले से सात लाख, 37 हजार, 920, 801, हमीरपुर जिले से चार लाख, 17 हजार, 489, चित्रकूट से तीन लाख, 44 हजार, जालौन से पांच लाख, 38 हजार, 147,ललितपुर जिले से तीन लाख, 81 हजार, 316 और महोबा जिले से दो लाख, 97 हजार, 547 से किसान-मजदूरों के पलायन का जिक्र है।

सड़क किनारे खुले आसमान में मजदूरों का घर. फोटो- बसंत कुमार

ललितपुर के जिलाधिकारी रुपेश कुमार बताते हैं, बारिश होने के कारण अब यहाँ फसल अच्छी होने लगी है।मनरेगा में भी ठीक-ठाक काम चल रहा है। लोगों को अपने गाँव में ही काम मिल जाने के कारण पलायन रुका हुआ है। अब बहुत ज्यादा पलायन नहीं हो रहा है।

वा थोड़े ज्यादा पैसे कमाने के लिए शहरों की तरफ पलायन कर रहे हैं। पलायन करने वाले युवकों में से कुछ दो-चार साल दिल्ली और मुंबई में रहने के बाद वो वापस अपने पुस्तैनी कामों में वापस लौट जाते है और वहीं कुछ वहीं बस जाते है। सोनभद्र में भी पलायन बढ़ा है।
शुभा प्रेम, सचिव, वनवासी सेवा आश्रम

यूपी के सोनभद्र जिले में भी आदिवासी समुदाय के लोग अब काम के लिए बाहर जाने लगे है। आदिवासी समुदाय में भी पलायन जारी है। एक समय आदिवासी समुदाय की जीविका का मुख्य आधार रहा वनवासी सेवा आश्रम होता था लेकिन अब यहाँ गिने-चुने आदिवासी युवा ही काम करते है।

आश्रम की सचिव शुभा प्रेम बताती हैं, युवा थोड़े ज्यादा पैसे कमाने के लिए शहरों की तरफ पलायन कर रहे हैं। पलायन करने वाले युवकों में से कुछ दो-चार साल दिल्ली और मुंबई में रहने के बाद वो वापस अपने पुस्तैनी कामों में वापस लौट जाते है और वहीं कुछ वहीं बस जाते है। सोनभद्र में भी पलायन बढ़ा है।

सड़क किनारे मजदूरों का कपड़ा सुखता हुआ. फोटो- बसंत कुमार

लखनऊ में रहने वाले भरतीय मजदूर संघ के उपाध्यक्ष कैलाश नाथ शर्मा बताते है, ‘‘गाँव-गाँव खाली है। जो कुछ नहीं करना चाहते वहीं गाँव में बचे हुए है। गाँवों में मजदूर मिलना मुश्किल हो गया है। बिहार-यूपी से सऊदी अरब में जाकर लोग गुलाम की तरह रहते हैं। वहां उन्हें बंधक बनाकर रखा जाता है। देश अब तक तो नारे से चल रहा था लेकिन वर्तमान केंद्र सरकार ‘मेक इन इण्डिया’ के तहत जो काम शुरू की है, इससे फायदा होगा।’’

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