अखिलेश सरकार में 2012 के बाद हुई सभी भर्तियों की सीबीआई जांच कराएगी योगी सरकार

अखिलेश सरकार में 2012 के बाद हुई सभी भर्तियों की सीबीआई जांच कराएगी योगी सरकारअखिलेश यादव, अनिल यादव और योगी आदित्यनाथ।

लखनऊ। सपा सरकार के समय पीसीएस और अन्य भर्तियों में हुए घोटाले को लेकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बुधवार को सदन में सीबीआई जांच की सिफारिश करने का एलान कर दिया। सपा सरकार के समय में इन भर्ती को लेकर प्रदेश भर के युवाओं में जबरदस्त आक्रोश पनपा था। जिसको प्रचारित कर के भाजपा प्रदेश की सत्ता पर काबिज होने का अवसर पाया। अब सरकार इस मामले की जांच करा कर के युवाओं को किया गया वादा करने की ओर कदम बढ़ा रही है।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की ओर से विधानसभा में बजट पर दिये जा रहे जवाब में उन्होंने ये बात कही। उन्होंने कहा कि अपराधी चाहें जो भी हो, हमारी सरकार से बचेगा नहीं। इसीलिए यूपी लोकसेवा आयोग में हुए भरती घोटाले की जांच करवाई जाएगी।

अनिल यादव की कारगुजारियों से बदनाम हुआ था यूपीपीएसी

समाजवादी पार्टी की सरकार में यूपीपीएससी के तत्कालीन चेयरमैन अनिल यादव के कार्यकाल में हुईं कारगुजारियां भी कुछ कम नहीं हैं। पीसीएस और सब ऑर्डिनेट परीक्षाओं में जिस तरह की गड़बड़ियां सामने आईं उनमें हाईकोर्ट को भी दखल देना पड़ा। इससे ये बात तो तय है कि भविष्य में अगर प्रदेश की भाजपा सरकार ने इस तरह के मामलों में गंभीर जांच करवाई तो बहुत बड़े स्तर पर रहस्य की परतें खुलेंगी। साथ ही कई बड़ों पर गाज़ गिरेगी।

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मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस मामले में वर्तमान चेरयमैन अनिरुध्द यादव को सोमवार की शाम तलब किया था। जिसके बाद अब बड़ी जांच होने की संभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता है। भाजपा एमएलसी देवेंद्र प्रताप सिंह ने इस बारे में सीएम योगी को पहले ही पत्र लिखा दिया है। जबकि सेवानिवृत्त प्रशासनिक अधिकारी सूर्यप्रताप सिंह ने भी इस मसले पर लंबी लड़ाई लड़ी है।

साल 2013 में हाईकोर्ट के आदेश पर आयोग को 11 सवालों के उत्तर बदलने पड़े थे। ऐसे ही 2013 में पूर्व अध्यक्ष अनिल यादव को न्यायालय ने सवालों के गलत जवाब रखने के आरोप में न्यायालय में तलब भी था। शुचिता का दिखावा करने में भी आयोग पीछे नहीं रहता। इसके लिए आयोग ने उत्तर कुंजी जारी करने तथा छात्रों से आपत्ति लेने का एक प्रस्ताव बनाया लेकिन उसको अमल में तब लाया गया जब छात्र उस प्रस्ताव को लेकर न्यायालय की शरण में गए। लगातार इलाहाबाद हाईकोर्ट उत्तर प्रदेश लोकसेवा आयोग को आदेश देता रहा। पीसीएस-जे 2015 की प्रारम्भिक परीक्षा का संशोधित परिणाम फिर से जारी करने का आदेश दिया गया। अभयर्थियों ने हाईकोर्ट में आयोग के इस परीक्षा परिणाम को चुनौती दी थी कि सही जवाब होने के बावजूद आयोग ने नंबर नहीं दिए।

हर हाल में यूपीएससी मामले में बहुत बड़े स्तर पर जांच होगी। बड़े-बड़े लोग जो इस मामले में सामने आएंगे, उन पर कड़ी कार्रवाई की जाएगी। छोड़ा कोई नहीं जाएगा। उसकी पहुंच जितनी भी ऊंची क्यों न हो। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अभी शुरुआत की है, अब आगे-आगे देखते जाएं।
शलभमणि त्रिपाठी, प्रवक्ता, भाजपा

यह कोई पहला मौका नहीं है, इससे पहले पीसीएस-जे 2013 की प्रारम्भिक परीक्षा में भी ऐसे ही 15 सवालों के गलत जबाव को सही मानकर आयोग ने परिणाम जारी कर दिया था। आयोग यहीं नहीं रुका, बल्कि मनमाने तरीके से त्रिस्तरीय आरक्षण लागू कर दिया। जब इसको लेकर विवाद बढ़ा तो आयोग को पीसीएस 2011 के प्रारम्भिक परीक्षा के परिणाम दोबारा जारी करने पड़े।

43 बार प्रतियोगी अभ्यर्थियों पर हुआ लाठीचार्ज

संर्घष कर रहे छात्रों पर 43 बार लाठी चार्ज हुआ। तीन बार गोली चली। 5000 छात्रों को अभियुक्त घोषित किया गया। सैकड़ों छात्र जेल गए। सामान्य और गरीब छात्रों को उनका वाजिब हक दिलाने के लिए छात्र जीवन-मरण के इस संघर्ष में अपना कैरियर दांव पर लगाकर पुलिस और प्रशासन के साथ लुकाछिपी खेलते रहे। दूसरी तरफ छात्र न्यायालय में भी अपनी लड़ाई लड़ते रहे। लड़ाई जारी रखने के लिए प्रतियोगी छात्रों ने प्रतियोगी छात्र संघर्ष समिति का निर्माण किया। इसी समिति से जुड़े रहे अभिषेक तिवारी बताते हैं कि वह चाहते हैं कि विगत पंद्रह सालों से उत्तरप्रदेश लोकसेवा आयोग की सीबीआई जांच की जाए तो बड़े और चौकाने वाले घोटाले सामने आएंगे। वह कहते हैं कि भाजपा की सरकार में उनको उम्मीद है कि अब जांच जरूर होगी।

विवादित रही अध्यक्ष की कुर्सी

2 अप्रैल 2013 को उत्तरप्रदेश लोकसेवा आयोग का अध्यक्ष अनिल यादव को बनाया गया जिन्हें बाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश के बाद पद से मुक्त होना पड़ा। उनपर आरोप है कि आगरा के कई थानों में यूपी गुण्डा एक्ट सहित कुल 17 मुकदमे दर्ज हैं। आरोप है कि अनिल यादव के पद से इस्तीफा देने के बाद बनाए गए आयोग के अध्यक्ष सुनील कुमार जैन अपने छात्र जीवन में आलराउंड सेकेण्ड डीविजनर रहें हैं। इसके लिए प्रतियोगी छात्रों ने काफी मशक्कत करके जानकारी जुटाई है। छात्र कहते हैं कि सुनील कुमार जैन का भी लम्बा आपराधिक इतिहास है। इनके विरुद्ध भी आगरा के विभिन्न थानों में लगभग पांच से अधिक मुकदमे दर्ज हैं।

आयोग पर सवालिया निशान लगाते फैसले

अनिल यादव और सुनील कुमार जैन के कार्यकाल में रिजवानुर्रहमान सचिव का कार्यभार देखते रहे जो 1978 में निविदा पर नियुक्त क्लर्क हैं। रिजवानुर्रहमान 1980 में स्थाई क्लर्क हुए, जबकि आयोग का सचिव पद सिविल सेवा पद के किसी अधिकारी का पद होता है। अनिल यादव, सुनील कुमार जैन, रिजवानुर्रहमान की नियुक्ति के पीछे उत्तर प्रदेश शासन के प्रमुख सचिव नियुक्ति और कार्मिक राजीव कुमार का हाथ बताया जाता है। जिनको हाईकोर्ट ने नोएडा भूमि आवंटन घोटाले में 3 साल कैद की सजा सुनाई है।

बार-बार बदले नियम, अपनों तक पहुंचाया फायदा

पूर्व अध्यक्ष अनिल यादव ने अपने पद का दुरुपयोग कर उत्तर प्रदेश आरक्षण नियमावली 1994 में परिवर्तन किया ताकि जातिविशेष को अधिक से अधिक लाभ पहुंचाया जा सके। छात्रों के प्रचंड विरोध और आंदोलन के बाद त्रिस्तरीय आरक्षण व्यवस्था सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव के कहने पर तत्कालीन अध्यक्ष अनिल यादव ने निर्णय वापस लिया था। आयोग की ओर से आयोजित पीसीएस की मुख्यपरीक्षा दे चुके छात्र, उदय भान द्विवेदी कहते हैं, “2011 में एक खास सरनेम वाले अभ्यर्थियों को इन्टरव्यू में ज्यादा से ज्यादा नंबर दिया गया और दूसरी जाति को कम अंक दिया गया, क्यों? इतना ही नहीं मुख्य परीक्षा में जाति विशेष के छात्रों को एक ही विषय के एक ही पेपर में स्केलिंग की आड़ लेकर ज्यादा से ज्यादा अंक दिए गए जबकि दूसरी जाति के छात्रों को उसी नम्बर पर कम अंक मिले।”

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आयोग ने कैसे चली ‘शुतुरमुर्गी चाल’

आयोग पर उठने वाले सवालिया निशान के बाद एक प्रस्ताव लाया गया था जिसमें कहा गया था कि सफल अभ्यायर्थियों के नाम के आगे जातिवर्ग का उल्लेख नहीं किया जाएगा। छात्रों का आरोप हैं कि ऐसा आयोग इसलिए कर रहा था ताकि किसी भी वर्ग में जातिविशेष के लोगों को चुना जा सके। प्रतियोगी छात्र संघर्ष समिति ने जब पूर्व अध्यक्ष अनिल यादव के कार्यकाल में हुए 22 परीक्षा परिणाम को देखा तो बात साफ हुई कि कुल 124 पद में से एक खास सरनेम के 152 छात्र सफल हुए हैं।

अधीनस्थ कृषि सेवा वर्ग- 3 में केवल 13 फीसदी सामान्य छात्र सफल हुए हैं। इस परीक्षा के 6628 पदों की विज्ञप्ति में सामान्य के 3616 पद थे लेकिन आयोग के मनमाने रवैये के चलते क्षेत्रवार और जातिवार लोगों को ही प्राथमिकता दी गई। लोक सेवा आयोग ने एक और बदलाव किया। वो ये कि अब आखिरी परिणाम के बाद सफल छात्रों का नाम और स्थाई पता सार्वजनिक नहीं किया जाएगा। हांलाकि यह परंपरा साल दर साल से संघलोग सेवा आयोग और उत्तरप्रदेश लोकसेवा आयोग में चलती रही है लेकिन अब इसे यूपी में बंद कर दिया गया। इसके बाद यह पता करना मुश्किल हो गया कि किन-किन जिलों से और जातियों से चयन किया गया है।

पेपर लीक हुआ था या कराया गया था?

साल 1937 से काम कर रहे आयोग में पूर्व अध्यक्ष अनिल यादव के कार्यकाल में पहली बार पेपर लीक हुआ था। संघर्ष कर रहे छात्रों का तर्क है कि पेपर लीक कराया गया था जो आयोग के परीक्षा कराने संबंधित अनुदेश से ही साफ है। लखनऊ के जिस स्कूल में यह पेपर लीक हुआ है उसमें अधिकतर छात्र इटावा या मैनपुरी के थे। प्रश्नपत्र के अनुदेश के मुताबिक परीक्षा शुरू होने के आधे घंटे पहले प्रश्नपत्र स्कूल प्रबंधक को सौंपना था।

इसके साथ ही दो निरीक्षकों की मौजूदगी में 15 मिनट पहले पैकेट खोलने थे। नियम के मुताबिक कक्ष निरीक्षक का शिक्षक होना जरूरी था। परीक्षा 9.30 पर शुरू होनी थी लेकिन प्रश्नपत्र सुबह 8 बजे ही परीक्षा सेंटर पर भेज दिया गया था। कक्ष निरीक्षक इंटरमीडिएट पास व्यक्ति को बनाया गया था। अख़बारों में जब पेपर लीक होने की खबर आई तो उसके बाद 2 लोगों को गिरफ्तार करके खानापूर्ति कर ली गई।

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