वास्तविकता से परे ग्राम विकास का सपना

वास्तविकता से परे ग्राम विकास का सपनाgaonconnection

ग्रामीण विकास से जुड़ी एक रिपोर्ट (भारत ग्रामीण विकास रिपोर्ट 2012-13) कहती है ग्रामीण भारत बहुत व्यापक परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है। इस परिवर्तन के विवरण ‘ग्रामीण पुनरुत्थान’ की उत्साहजनक कहानियों और ग्रामीण उपयोग के तेजी से बढ़ते विस्तार से लेकर कृषि सम्बंधी अत्यधिक संकटों तथा बड़ी संख्या में किसानों द्वारा की जाने वाली आत्महत्याओं तक विस्तृत हैं। हम सुनते हैं भारतीय ग्रामीण बड़ी कॉर्पोरेट कम्पनियों द्वारा अपनी भूमि के अधिग्रहण को लेकर संघर्ष कर रहे हैं और ग्रामीण उग्रता ‘आतंरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा’ बन गई है। समकालीन ग्रामीण भारत वास्तव में बहुत जटिल है,  जिसमें परिवर्तन की कई नई शक्तियां कार्य कर रही हैं और यह किसी भी एक श्रेणी में पूरी तरह सही नहीं बैठतीं।

भारत के 69 प्रतिशत यानि 833 मिलियन (83.30 करोड़) लोग ग्रामीण क्षेत्रों में रहते हैं। इस ग्रामीण जनसंख्या में 1991-2001 की 1.7 प्रतिशत प्रतिवर्ष की वृद्धि दर की तुलना में 2001-2011 में काफी नीचे आ गई जबकि शहरी जनसंख्या की वृद्धि दर इन दोनों अवधियों में 2.8 प्रतिशत प्रतिवर्ष रही। अब सवाल यह उठता है इस ग्रामीण जनसांख्यिकीय कमी के कारणों को किस दायरे तक ले जाया जाए-ग्रामीण प्रजनन दर तक, स्वास्थ्य सम्बंधी विषयों तक, जीविका तक अथवा गाँवों से शहरों की ओर पलायन तक? एक बात और ग्रामीण भारत में समरूपता कम होती दिख रही है जिनके चलते भावी संघर्षों के टापुओं का निर्माण हो सकता है। ऐसे में जरूरी है कि सरकारें गाँवों की ओर गम्भीरता से देखें। 

पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने अपने अध्ययनों में ग्रामीण क्षेत्रों में किए जा रहे उपायों को गम्भीर नजर से देखा, व्याख्या की और कुछ सुझाव भी दिए। उनका कहना था कि दुनियाभर में सामाजिक रूपांतरण के नाम पर कई ऐसी योजनाएं जान-बूझकर या अंजाने में चलाई जाती हैं जो पूरी तरह से दिखावटी और खराब तरह से संचालित होती हैं। हालांकि उन योजनाओं पर होने वाले खर्च से ऐसा आभास होता है प्रयास किए जा रहे हैं। बहुत खर्चीला होने के अलावा वे इस मामले में फालतू भी होती है उनसे जमीनी स्तर पर कुछ भी हासिल नहीं होता। व्यवस्था से बाहर खड़े हितग्राही और योजनाओं के बीच कोई सम्बंध नहीं होता क्योंकि योजनाएं अफसरशाही के जाल में उलझी होती है और उसमें जवाबदेही बहुत ही कम होती है। सबसे ज्यादा और बार-बार अपनाए जाने वाले उपाय क्विक फिक्सेस की तरह किसी समस्या या मुद्दे के मूल कारणों और प्रभावों को तो हल नहीं करते लेकिन तात्कालिक राहत का काम अवश्य करते हैं। सच तो यह है कि वे सामान्यतः समस्याओं को अस्थायी रूप से छिपाने का काम करते हैं। इन पर काफी लागत आती हैं जिन्हें लम्बे समय तक नहीं चलाया जा सकता है फिर भी वे कुछ हद तक लोगों के जीवन को छूते हैं लेकिन लोगों के सशक्तीकरण में मददगार नहीं होते। इनका लाभ पाने वाला सिर्फ अल्पकालिक हितग्राही होता है। ऐसे में जरूरी यह है टिकाऊ उपाय किए जाएं। इनके लिए समस्याओं या मुद्दों के मूल कारणों के सावधानीपूर्वक अध्ययन की आवश्यकता होती है, समाधान स्थानीय क्षमताओं और परिस्थितियों के अनुरूप होने चाहिए। इनके लिए कम से कम लागत पर अच्छे से अच्छा नतीजा पाने के लिए अभिनव दृष्टिकोण की आवश्यकता होती है। टिकाऊ समाधान योजनाएं और क्रियान्वयन स्थानीय नेतृत्व में तैयार किए जाते हैं। इस प्रकार उनका दीर्घकालिक और उद्देश्यपूर्ण लक्ष्य होता है। हितग्राही स्वयं इन योजनाओं में प्रतिभागी होता है और इनका ढांचा उद्यमितापूर्ण और भागीदारीपूर्ण होता है। कुल मिलाकर भारत में इसी तरह के टिकाऊ उपायों को अपनाने की आवश्यकता है। इसके लिए छह तत्व आवश्यक हैं-स्वाभाविक सोच, गहरी समझ, एकीकृत समाधान, सामुदायिक भागीदारी, प्रौद्योगिकी और रचनाशील नेतृत्व। 

नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली भारत सरकार ने अब तक ग्रामीण क्षेत्र के लिए जो योजनाएं या कार्यक्रम निर्मित किए हैं, क्या वे उक्त प्रतिमानों पर पूरी तरह से खरे उतर रहे हैं? इस क्रम में हम पहली बार प्रधानमंत्री द्वारा शुरू की गई सांसद आदर्श ग्राम योजना को वास्तविकता के आईने में देखने की कोशिश करेंगे। सांसद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लोकनायक जयप्रकाश नारायणजी की जन्म जयंती के अवसर पर, जो आजादी के आंदोलन में मुखर युवा शक्ति और आजादी के बाद राजनीति से अपने आप को भिन्न रखते हुए रचनात्मक कार्यों में स्वयं को आहूत करते हुए, जिस प्रकार से एक सम्पूर्ण क्रांति के प्रणेता और भारतजन के प्रेरक बने उन्हीं के नाम पर 15 अगस्त 2015 को ‘सांसद आदर्श ग्राम योजना’ की घोषणा की। जयप्रकाश नारायण जी ने कहा था कि ग्राम धर्म एक महत्वपूर्ण बात है और जब तक एक समाज की तरह गाँव सोचता नहीं है, चलता नहीं है, तो ग्राम धर्म असंभव है और अगर ग्राम धर्म संभव है, तो ग्राम नई ऊंचाईयों को पाने का रास्ता अपने आप चुन सकता है। 

गांधी की भारतीय स्वराज्य के लिए बुनियादी लड़ाई ही ग्राम से शुरू हुई थी। इस योजना के तहत गाँव को आत्मशक्ति प्रदान कर आत्मस्फूर्त बनाने का उद्देश्य है। प्रधानमंत्री के अनुसार इस संसद के कार्यकाल में प्रत्येक सांसद कुल 3 गाँवों को इस स्तर तक ले जा सकता है। 2016 तक एक मॉडल गाँव खड़ा हो जाए, उसके अनुभव के आधार पर 2019 तक दो और गाँव हो जाएं और आगे चलकर फिर प्रतिवर्ष एक गाँव सांसद आदर्श ग्राम के रूप में विकसित व स्थापित हो। इस तरह से लगभग 800 सांसद 2019 तक 2400 गाँव आदर्श ग्राम के रूप में स्थापित कर सकेंगे। इसमें कोई संशय नहीं कि यदि उनकी यह घोषणा पूरी जमीन पर उतर पाई तो विकास का मॉडल ‘टॉप टु बॉटम’ से ‘बॉटम-टु-टॉप’ में परिवर्तित हो जाएगा लेकिन स्वप्नदर्शी बनने से पहले हमें देश के गाँवों की कुल संख्या पर ध्यान देना होगा और उसके साथ प्रशासनिक मशीनरी की विशेषताओं एवं मनादशाओं का। दरअसल प्रधानमंत्री के इस प्रकार की घोषणा करते समय शायद उनके मस्तिष्क में सिर्फ गुजरात रहा हो। इस योजना में अलग से धन का कोई प्रावधान नही किया गया था। सांसदों से अपेक्षा की गई थी कि वे अपनी ‘संसदीय क्षेत्र विकास निधि’ (एमपीलेड) से गाँव को गोद लेकर विकास कराएं। साथ ही ग्रामीण विकास से जुड़ी अन्य केन्द्रीय योजनाओं तथा ग्राम पंचायतों को उपलब्ध कोष को समन्वित करें। यह भी कहा गया यदि आवश्यक हो, तो कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी के तहत कंपनियों ने सामाजिक विकास के लिए जो धन रखा है, उसे जुटाने की कोशिश करनी चाहिए। यह आसान काम नहीं था। एमपीलेड पर दूसरे मंत्रालयों की भी निगाहें थीं/ हैं जैसे- मसलन, पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय, मानव संसाधन आदि। वास्तविकता यह है गाँव की इस समय सबसे बड़ी समस्या पेयजल और स्वच्छता सहित दूसरी आधारभूत आवश्यकताओं की है। दूसरी चुनौती यह थी यदि सांसद निधि से एक आदर्श गाँव बनाया गया तो दूसरे कार्यों का क्या होगा? यदि पांच वर्ष में तीन गाँव आदर्श गाँव के रूप में एक सांसद ने बना भी दिए तो शेष गाँव पूरी तरह से पिछड़ जाएंगे। क्या देश या उस कंस्टीटुएंसी के अंतर्गत आने वाले अन्य गाँव अविकास की धारा में चलकर अपने वर्तमान प्रतिनिधि के कार्यों से संतुष्ट होंगे? ऐसी स्थिति में उसका पुनःनिर्वाचित होना भी खतरे में पड़ जाएगा। 

कुल मिलाकर यह मॉडल ‘सोशियो-इकोनॉमिक कान्फ्लिक्टिंग मॉडल’ के रूप में न बदल जाए, ऐसी आशंकाएं इसके शुरू करने के समय थीं लेकिन चूंकि आदर्श ग्राम अब तक उस रूप में प्रकट ही नहीं हो पाए हैं, इसलिए निष्कर्षों को अभी गौण रखना होगा लेकिन यह कार्य गाँव स्वयं सम्पन्न कर सकते हैं, यदि वे अपनी ताकत पहचान लें तो। 

(लेखक राजनैतिक व आर्थिक विषयों के जानकार हैं। यह उनके निजी विचार हैं।)

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