वैध कारतूसों का अवैध गोरखधंधा!

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लखनऊ। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के मुताबिक वर्ष 2014 में देशभर में 17,490 हत्याएं बंदूक से की गई थीं, इनमें से 89 फीसदी हथियार अवैध थे। लेकिन इन हथियारों में लगे कारतूस वैध थे। कारतूस लाइसेंसधारी शस्त्र विक्रेता ही बेच सकते हैं। बिक्री का पूरा ब्यौरा रखे जाने के दावे किए जाते हैं, लेकिन इन ब्यौरों और दावों में कई दिक्कते हैं। शस्त्र विक्रेता का कहना है कि वो पुलिस और डीएम कार्यालय को बिक्री का पूरा आंकड़ा भेजते हैं लेकिन पुलिस का कहना है कि उन्हें जानकारी नहीं मिलती।

गाँव कनेक्शऩ में 22 अप्रैल 2016 को ‘अवैध असलहों में कहां से आ रहे वैध कारतूस’ प्रकाशित होने के बाद लखनऊ के एसएसपी राजेश कुमार पांडेय ने जिलाधिकारी राजशेखर को खत लिखा कि शस्त्र विक्रेता उन्हें कारतूस बिक्री का ब्यौरा उपलब्ध नहीं कराते। अगर डीएम कार्यालय को सूचना आती है तो हमें भी भेजी जाए।” 

नियमत: पुलिस के पास कारतूसों का ब्यौरा 24 घंटे के अंदर आना चाहिए ताकि इन्हे किसने खरीदा और कहां इस्तेमाल किया, इसकी पड़ताल की जा सके। लेकिन इस नियम को पूरे महकमे द्वारा नज़रअंदाज़ किया जाता है।

कानपुर के एसएसपी शलभ माथुर ने फोन पर बताया, “उन्हें बिक्री ब्यौरा नहीं मिलता। संबंधित थानों को शायद मिलता हो।” वहीं अलीगढ़ के एसएसपी जे. रविन्द्र गौड़ ने भी कहा, “उनके पास इस तरह का कोई ब्यौरा नहीं आता है। डीएम कार्यालय में असलहा बाबू के यहां इसकी सूची जाती है। वहां से सम्बंधित थाने पर जाता है।” 

थाने स्तर की ही बात करें तो लखनऊ जिले में भी मानकनगर थानाध्यक्ष वकील अहमद ने तो कहा कि उनके पास ब्यौरा आता है। लेकिन अति संवेदनशील क्षेत्र चौक कोतवाल सुधाकर पांडेय और मलिहाबाद कोतवाल उमाशंकर उत्तम ने बताया कि उनके पास कोई ब्यौरा नहीं आता है।

हालांकि उत्तर प्रदेश आर्म्स डीलर एसोसिएशन का कहना है कि उनके द्वारा पूरा ब्योरा समय से पुलिस व प्रशासन को पहुंचा दिया जाता है। उत्तर प्रदेश आर्म्स डीलर एसोसिएशन के अध्यक्ष चौधरी शर्फूद्दीन ने कहा, “एक बार में एक लाइसेंस धारक को 10 कारतूस दिए जाते हैं, और खोखे भी जमा कराए जाते हैं। इसकी पूरी जानकारी 24 घंटे के अंदर डीएम कार्यालय और संबंधित जिलों के पुलिस अधीक्षकों को भेजी जाती है। 

जिसमें साफ-साफ लिखा होता है लाइसेंस धारक कहां का रहने वाला है और अपने नाम अब तक कितनी कारतूस खरीद चुका है।”

लखनऊ में लाटूस रोड के शस्त्र विक्रेता शनि सरना बताते हैं, “हम पुलिस और प्रशासन दोनों को जानकारी भेजते हैं, आगे की जिम्मेदारी उनकी है। उनका दायित्व बनता है कि वह लाइसेंसधारी के पास मौजूद असलहा और कारतूस की जांच करें।” 

यदि पुलिस के पास पूरी जानकारी होगी तो अवैध हथियारों द्वारा किए जाने वाले बहुत से असलहों का वह कम समय में खुलासा कर सकने में सक्षम हो पाएगी। 

कारतूस की अवैध बिक्री और तस्करी पर अंकुश लगाना इसलिए भी जरूरूी हैं क्योंकि नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक वर्ष 2010 से 2014 तक यूपी में सबसे सबसे ज्यादा 6,929 हत्याएं गोलीमाकर की गई थीं। साथ ही इस दौरान देश में अवैध हथियार रखने के तीन लाख मुकदमें दर्ज किए गए इनमें से डेढ़ लाख यूपी में थे। 

लेकिन पुलिस का भी पक्ष है कि जानकारी मिल भी जाएगी तो भी उनके पास जांच का समय नहीं। 

एक पुलिस अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, “अगर ब्यौरा मिल भी जाएगा तो हमारे (पुलिसवालों) पास इतना वक्त कहां है कि एक-एक लाइसेंसधारी तक पहुंचे और उसकी पड़ताल करें।”

हालांकि राजधानी लखनऊ के सिटी मजिस्ट्रेट विनोद यादव ने बताया, “लखनऊ में असलहा बाबू के पास जिले का पूरा रिकार्ड आता है।

 महीने में एक बार हम चेंकिग भी करते हैं। प्रशासन के पास कई बोरे खोखे जमा हो रखे हैं।” सिटी मजिस्ट्रेट भी मानते हैं कि निगरानी बढ़ाने से कारतूस की बिक्री और तस्करी पर अंकुश लगा है।

प्रदेश में विगत चार वर्षों में पुलिस ने 24,583 बंदूकें जब्त की हैं इसमें से 62 फीसदी तमंचे थे, जबकि 31,554 कारतूस बरामद हुए। क्योंकि कारतूस सिर्फ लाइसेंसी दुकानों से ही खरीदे जा सकते हैं, यानि वारदातों में इस्तेमाल कारतूस अवैध रूप से खरीदे गए, तस्करी किए गए या फिर लूटे हुए हो  सकते हैं।

रिपोर्टर - गणेश जी वर्मा

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