वहम की बीमारी है डिल्यूशन डिसऑर्डर

वहम की बीमारी है डिल्यूशन डिसऑर्डरगाँव कनेक्शन

डिल्यूशन गलत और पक्के विश्वास के साथ बनी हुई सोच को कहते हैं, जिसकी कोई ठोस वजह नहीं होती है और मरीज उस सोच को पक्के यकीन के साथ मानकर चलते हैं। वे उस खयाल के विपरीत कोई जानकारी मानने के लिए तैयार ही नहीं होते हैं।

राजीव (30 वर्ष) को धीरे धीरे ऐसा महसूस होने लगा कि उसकी पत्नी का किसी दूसरे व्यक्ति के साथ अफेयर चल रहा है। ये शक

इतना ज्यादा बढ़ गया कि उसने उसका दूसरे मर्दों से जैसे दूधवाला, प्रेसवाला आदि से बात करवाना बंद कर दिया और उसके घर से बाहर निकलने पर भी नजरबंदी लगा दी, उसका फोन भी छीन लिया। इस बात का पता जब राजीव के घरवालों को चला तो उन्होंने उसे डॉक्टर के पास जाने के लिए कहा लेकिन वो ये मानने को तैयार नहीं था कि उसे कोई बीमारी है। डॉक्टर से मिलने के एक साल बाद उसने धीरे-धीरे अपने साथी पर भरोसा करना शुरू किया।

डिल्यूशन कई तरह के होते हैं। अगर इस गलत सोच के अलावा कोई और बात की जाए तो उन्हें ठीक लगेगा लेकिन जैसे ही रोगी के व्यवहार के बारे में बात की जाती है उनकी बातों का कोई कारण समझ नहीं आता।

बेज़ार डिल्यूशन

ऐसा विश्वास जो इंसान के सामाजिक संस्कृति के बिल्कुल खिलाफ हो। अगर मैं जम्हाई लूंगा तो सुनामी आ जाएगी।

डिल्यूशन जैलिसी

अपने साथी पति या पत्नी पर शक करना या उन पर दूसरे लोगों के साथ अफेयर होने का आरोप लगाना।

ऐरोटमनी

ये सोच रखना कि कोई व्यक्ति, जो उनसे औहदे में ऊंचा हो वो उनको प्यार करता है।

गैरेन्डीऑस

अपने आपको बहुत ऊंचा या बड़ा आदमी समझना, जिसके पास बहुत ताकत, जानकारी, हैसियत हो या उसके रिश्ते देवी, देवताओं से हों। जैसे कि खुद को शिवजी या श्रीराम की संतान समझना या फिर समझना कि शिवजी की तरह उनके पास भी तीन आंख हैं।

अपने आप को किसी और के नियंत्रण में समझना

ऐसा सोचना कि उनकी सोच, जज्बात, काम सब कुछ कोई और नियंत्रित कर रहा है और उनका इस पर कोई बस नहीं है। ऐसा लगता है कि जैसे उनके जीवन का रिमोट कंट्रोल किसी और के हाथ में है।

ये सोचना कि आस-पास की चीजें उन पर नज़र रख रही हैं या उनके बारे में ही बातें हो रही हैं। टीवी और रेडियो में भी उनके बारे में ही बातें हो रही हैं और ये ज्यादातर गलत बातें ही हो रही हैं।

इस बात का डर मन में बैठ जाना कि उनपर कोई हमला कर देगा या उनके साथ धोखा हो गया है या उनको कोई परेशान कर रहा है। अपने शरीर को लेकर भ्रम हो जाना कि कहीं कोई खराबी हो गई है या कोई बड़ी बीमारी हो गई है।

ये बीमारी ज्यादातर 40 वर्ष से शुरू होती है। ये 18 से 20 साल के लोगों में भी हो सकती हैं। ये औरतों में होने की संभावना ज्यादा होती है। लोगों के व्यक्तित्व में शक करना, चीजें छुपाना आदि। बीमारी का पूरी तरह से ठीक होना थोड़ा मुश्किल हो जाता है। कई बार दिमाग के नसों के असंतुलन के वजह से भी ये दिक्कत हो सकती है। इसका इलाज दवा और काउंसलिंग हैं।

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