विदेश यात्रा को नौटंकी में कौन बदल रहा है

विदेश यात्रा को नौटंकी में कौन बदल रहा है

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हर यात्रा विदेश नीतियों और संबंधों पर चर्चा करने का एक अच्छा मौक़ा होता है। इन विषयों में में मेरी कम दिलचस्पी है फिर भी आम दर्शकों को क्यों वंचित किया जाए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में एक बदलाव तो आया है। कारण जो भी रहा हो मगर हिन्दी चैनल वाले भी लाव लश्कर के साथ अपने पत्रकारों को विदेश भेजने लगे हैं। इन चैनलों के पास भले ही देश के सुदूर इलाक़ों में संवाददाता भेजने के पैसे न हों लेकिन अमरीका आयरलैंड और आस्ट्रेलिया भेजने में कोई संकोच नहीं करते। कम से कम रिपोर्टरों को भी मौक़ा मिल रहा है। हिन्दी में अंग्रेजी की तरह वही दो तीन लोग ही विदेश नहीं जा रहे हैं। कुछ नए चेहरों को भी मौक़ा मिल रहा है।

यह अच्छी बात है क्योंकि हिन्दी के पत्रकारों को मौक़ा मिल

रहा है कि वे इसी बहाने नई-नई दुनिया दर्शकों तक ले आएं। क्या ऐसा हो रहा है, मैंने चैनलों को ध्यान से नहीं देखा है लेकिन जितना देखा है उसके आधार पर कह सकता हूं कि ये उत्साही पत्रकार विदेश यात्रा की गंभीरता को हल्का करने में कोई कसर बाकी नहीं रखते। कुछ दोष विदेश यात्राओं के दौरान स्टेडियम से लेकर कंपनियों के दौरे का आयोजन करने वालों का भी है। हो सकता है कि अब दस्तूर बदल गया हो। विदेश यात्राएं और कूटनीतिक शब्दावलियां नीरस हो चुकी हैं जिसे बदलने के लिए ये सब किया जा रहा है। आज की जनता चकाचौंध की बातों से ही आकर्षित होती है मगर होता यह है कि चैनलों के उत्साही कवरेज के कारण सब कुछ स्टंट लगने लगता है। बहुत कुछ स्टंट होता भी है। विदेश में दिए गए प्रधानमंत्री के हाल के भाषणों को सुनिए तो एक किस्म का दोहराव नज़र आने लगा है। मां-बेटी और दामाद निरंतर रूप से आता है। वे इस बहाने लोगों को याद दिला देते हैं कि उन्हें क्यों वोट दिया और इसी वजह से उन्हें वोट देते रहना है।

पर राजनेता तो अपनी राजनीति करेगा। पत्रकारों को कम से कम रूटीन के कवरेज से बचना चाहिए। जितना ज़ोर नवाज़ शरीफ़ को दूर से हाथ हिलाने पर दिया गया उससे ज्यादा जोर अगर अन्य राष्ट्र प्रमुखों से बातचीत के मायने पर दिया जाता तो जनता भारत, पाक और अमरीका के अलावा भी अन्य देशों के साथ हमारे संबंधों को लेकर शिक्षित होती। संयुक्त राष्ट्र में भले स्थायी सदस्यता न मिले लेकिन प्रधानमंत्री ने इतना तो कर ही दिया है कि वे लगातार संयुक्त राष्ट्र की वैधानिकता पर हमला कर रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र पर सवाल उठाते हुए भारत के योगदान की बात कर रहे हैं। भारत का हक मांग रहे हैं। कई देशों को अच्छा नहीं लग रहा है। दुनिया की नज़र से देखिए तो भारत संयुक्त राष्ट्र को लेकर बहुत बड़ा वैचारिक दांव खेलता नज़र आ रहा है। लेकिन चैनलों पर इसे लेकर घनघोर चर्चा नहीं है। सकारात्मक या नकारात्मक कुछ भी नहीं। 

चैनलों ने जितनी ऊर्जा प्रधानमंत्री की मां पर खर्च की उससे आधी ऊर्जा में नए संबंधों और एलानों पर चर्चा करने में खर्च कर सकते थे। उनकी मां क्या करती थीं इसे कौन सत्यापित कर सकता है, न तो कांग्रेस ने देखा है न खुद बीजेपी के नेताओं ने। पत्रकार निलांजन मुखोपाध्याय का इस पर एक लेख भी है लेकिन इस बहस में प्रधानमंत्री या उनकी मां का पक्ष तो आ नहीं सकता। फिर बहस किससे हो रही थी। व्यक्तिगत होने का मौक़ा विरोधी दल भी तलाश रहे होते हैं और प्रधानमंत्री भी बिना नाम लिए व्यक्तिगत हमले कर और भड़का देते हैं। फिर कांग्रेस बीजेपी के प्रवक्ता स्टूडियो में भिड़ा दिए जाते हैं।

प्रधानमंत्री के समर्थकों को भी समझना चाहिए। टीवी के लिए विदेश यात्राओं को कवरेज योग्य बनाया तो जा रहा है लेकिन टीवी इन यात्राओं को हल्का भी बना रहा है। अति भक्ति का यह नुकसान है। इसलिए हर दौरा ईंवेंट में बदल जाता है और लोगों की निगाह में महत्वपूर्ण होने से रह जाता है। कोई यह गिन रहा है कि कितने बार कपड़े बदले तो कोई दिखा रहा है कि कैसे कैमरों के सामने बने रहने के लिए प्रधानमंत्री फेसबुक प्रमुख मार्क जुकरबर्ग का हाथ पकड़ कर उन्हें सामने से हटा देते हैं। यह सब बातें हल्की फुल्की चर्चाओं के लिए होती है मगर अब मुख्य चर्चा इन्हीं सब बातों पर होती है। बेहतर है आप अख़बार ही पढ़ें। टीवी के लिए विदेश यात्रा तमाशा भर है। वैसे कुछ लोगों ने गंभीर रिपोर्टिंग की लेकिन जंगल में मोर नाचा किसने देखा।

(लेखक एनडीटीवी में सीनियर एक्ज़ीक्यूटिव एडिटर हैं, ये उनके निजी विचार हैं।)

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