विकास का मॉडल जनता बताए, जनता बनाए, तब सार्थक होगा

विकास का मॉडल जनता बताए, जनता बनाए, तब सार्थक होगाgaonconnection

बिहार में सुशासन का वादा करने वाले नीतीश कुमार आज कल शान्त हैं। मोदी पर कटाक्ष भी नहीं कर रहे हैं। जिस प्रदेश में मोतीहारी जैसी यौन उत्पीड़न की घटनाएं हो रही हैं, टॉपर्स की छीछालेदर हो रही हो, चुने हुए नुमाइन्दों के बेटे पुलिस पर हमला कर रहे हों, सभी को लगने लगा हो कि जंगलराज वापस आ गया तो इसे विकास का मॉडल तो नहीं कहेंगे। जिस मॉडल को नीतीश कुमार सर्वस्पर्शी या इन्क्ल्यूसिव विकास कहते थे उसका पता नहीं क्या हुआ है।

पुराने समय में गाँव का मुखिया हर रात किसी को भेज कर पता लगवाता था कि उसके गाँव में कोई भूखा तो सोने नहीं जा रहा है, उसके बाद मुखिया स्वयं रात का खाना खाता था। प्रतिव्यक्ति औसत आय से विकास नहीं नापा जा सकता? विकास को नापने का तरीका है कि आप सबसे गरीब और तनहा व्यक्ति का ध्यान करें और सोचें कि उसका जीवन सुधरा है क्या। देश आजाद हुआ तो पहली बार विकास का एक मॉडल सामने आया— नेहरूवियन मॉडल। गांधी मॉडल को परखा नहीं जा सका क्योंकि वह व्यवहार में लाया नहीं गया। असली विषय है विकास का उद्देश्य, उसकी प्राथमिकताएं और फोकस। 

नेहरूवियन मॉडल एक नियंत्रित अर्थव्यवस्था थी जिसमें न्यायसंगत वितरण पर जोर था, जल्दी से जल्दी विकसित देशों की कतार में भारत को खड़ा करने की नेहरू की चाहत थी। लक्ष्य तो सराहनीय था परन्तु मार्ग जो अपनाया गया उससे मंजिल तक देश पहुंच नहीं सका। गाँव नजरअंदाज रहे, देश भूखा हो गया, अकाल पड़ा और विदेशी अनाज से पेट भरना पड़ा। भारत अविकसित देशों की कतार में चला गया साठ का दशक आते आते और नेहरूवियन मॉडल फेल हुआ परन्तु इसे स्वीकार करने में बहुत समय लगा। आखिरकार 1993 में इसे तिलांजलि दी गई। फिर शुरू हुई खुली अर्थव्यवस्था जिसके इर्द-गिर्द आज भी काम चल रहा। 

नरेन्द्र मोदी के गुजरात के विकास मॉडल में इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि सड़कें हैं, बिजली है, विदेशी मुद्रा आ रही है, उद्योगपति आकर्षित हो रहे हैं, नर्मदा का पानी सौराष्ट्र के दूर दराज के इलाकों तक पहुंचा है, शिक्षा की अच्छी व्चवस्था है, स्वास्थ्य सेवाएं अच्छी हैं, रोजगार के साधन उपलब्ध हैं और अर्थव्यवस्था की विकास दर अच्छी है। प्रशासन की दक्षता (इफीशियंसी) और जाति धर्म का भेद किए बिना सबके लिए समानरूप से योजनाएं भी लागू हैं। सोचना होगा क्या भय और भूख पर विजय मिली है और क्या गुजरात में सुख और शान्ति है, इसका आंकलन किसी ने नहीं किया है। 

उत्तर प्रदेश में अगले साल चुनाव हैं यहां सभी दल अपना विज़न डाक्युमेन्ट पेश कर रहे हैं। सरकार ने छात्र-छात्राओं को लैपटॉप देकर उन्हें कम्प्यूटर के प्रति आकर्षित किया है लेकिन इसका कितना लाभ गाँव के लोगों को मिला या मिलेगा यह देखना बाकी है। नीतीश कुमार बिहार के लिए विशेष दर्जा मांगते रहते हैं लेकिन विशेष दर्जा मिल जाने भर से उत्पादकता बढ़ना जरूरी नहीं है। मुफ्त की बिजली, बेरोजगारी भत्ता, कर्जा माफी जैसी खैरात से भी उत्पादकता नहीं बढ़ेगी। आवश्यकता होगी अधिकाधिक पूंजी निवेश, अच्छी कानून व्यवस्था, युवक-युवतियों को प्रशिक्षण, महिलाओं की बिना भेदभाव के विकास में भागीदारी और चुस्त दुरुस्त प्रशासन।

वास्तव में उत्तर प्रदेश और शायद पूरे देश को स्वावलम्बी गाँव, जाति विहीन पंचायती राज, महिलाओं की सुनिश्चित भागीदारी और ऐसी परियोजनाएं जिनमें धर्म और जाति के आधार पर गिनती न करनी पड़े। पूरे उत्तर प्रदेश में न तो एक समान परिस्थितियां हैं और न कोई अकेला मॉडल काम करेगा। बुन्देलखंड में पानी का अभाव रहता है तो पूर्वांचल में बाढ़ आती है। हमें विभिन्न मॉडलों से बिना संकोच अपने काम की बातें लेनी होंगी।

प्रायः देखा गया है कि गेहूं और चना शहर की मंडियों में जाता है और वहां से दलिया, सूजी, मैदा, बेसन, जानवरों का चोकर बनकर सब वापस गाँव को आते हैं। इनके अलावा भी अन्य कृषि आधारित उत्पादों के कारखाने जैसे जैम, जेली, पापड़, गुड़, तेल आदि गाँवों में बन सकते हैं। शहरों में लाइसेंस या परमिट पर रोक लगे और गाँव के लोगों को इन्स्पेक्टर राज ना सताए तो ग्रामीण क्षेत्रों में गतिविधियां बढ़ेंगी, रोजगार मिलेंगे और ग्रामवासियों का शहरों की तरफ पलायन भी रुकेगा। इन सब के लिए किसी मॉडल की आवश्यकता नहीं है, ये सब परम्परागत उद्यम हैं जिन्हें शहरों से हटाकर गाँवों में पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है। 

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