विश्वविद्यालयों में प्रवेश आरम्भ होगा, गाँवों के छात्र क्या पढ़ेंगे?

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अनेक बार छात्रों को कहते सुना है कि उच्च शिक्षा हमारा अधिकार है। आखिर उच्च शिक्षा से मतलब क्या है। सामान्यतः वह शिक्षा जो माध्यमिक के बाद दी जाती है वह उच्च शिक्षा गिनी जानी चाहिए। हमारे समाज में बीए, बीएससी, बीकॉम ही उच्च शिक्षा है चाहे वह बिहार के तथाकथित टॉपर्स की नींव पर ही क्यों न खड़ी हो। तकनीकी और प्राविधिक शिक्षा चाहे जितनी प्रशस्ति देने वाली क्यों न हो उसे उच्च शिक्षा नहीं कहते। आखिर उच्च शिक्षा का हकदार कौन है। 

दिल्ली जैसे शहरों के विश्वविद्यालयों में प्रवेश के लिए 100 प्रतिशत अंक पाने वालों को ही मौका मिलने की गारन्टी है, बाकियों को प्रतीक्षा करनी पड़ती है। गाँव के छात्र-छात्राएं अच्छे विश्वविद्यालयों में प्रवेश की उम्मीद नहीं कर सकते। सोचा जाए तो 100 प्रतिशत अंक मिल ही कैसे सकते हैं। उत्तर प्रदेश और बिहार शिक्षा बोर्डों में 90 प्रतिशत अंक बहुत अच्छे माने जाते हैं लेकिन इतने से दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रवेश नहीं मिल पाएगा। गाँवों से पढ़कर आने वाले छात्रों के अंक तो और भी कम होते हैं। 

देखा जाए तो 100 प्रतिशत अंक लाने वाले छात्र दिन-रात एक करके नम्बर बटोरने की मशीन बन गए हैं। भारतीय शिक्षा प्रणाली में उसी अनुपात में उनका बुद्धि विकास नहीं हो पाता है। पर हमारे देश के वही विद्यार्थी जब विदेश जाते हैं तो वहां के विश्वविद्यालयों में विदेशी छात्रों से हमेशा आगे रहते हैं। मैकाले द्वारा बताए गए रास्ते पर चलकर हम आज भी क्लर्क पैदा कर रहे हैं। मौलिक चिन्तन की कमी का प्रमुख कारण है कि परीक्षाओं में याद्दाश्त की जांच होती है, बुद्धि परीक्षा नहीं होती। पुरानी बात है जब मैं कनाडा में मेमोरियल विश्वविद्यालय में छात्र था और खनिज विज्ञान पर एक प्रश्न के उत्तर में मैंने पूरी तालिका लिख दी थी तो हमारे प्रोफेसर वीएस पेपेजिक को पहले तो विश्वास ही नहीं हुआ कि मैंने याद्दाश्त से लिखा है, जब भरोसा हुआ तो बोले हम लोग इसकी अपेक्षा नहीं करते।

एक्सेलेंस यानी विशेषज्ञता और उत्कृष्ट शिक्षा पर जोर देते हुए अनेक आईआईटी, आईआईएम, कृषि विश्वविद्यालय खोले जा रहे हैं। इनमें प्रवेश पाने वालों में देश की 70 प्रतिशत आबादी वाले गाँवों के कितने लोग होंगे? देश में उच्च शिक्षा तक अनुमानतः 10 प्रतिशत लोगों की पहुंच है जिसमें ग्रामीण आबादी का अंश तो चार प्रतिशत से भी कम है। इस विसंगति को दूर करने का तरीका है कि सुदूर गाँवों में महाविद्यालय और विश्वविद्यालय खोले जाएं, कम से कम कृषि विश्वविद्यालय तो गाँवों में ही खुलें। जिन देशों में औद्योगिक संस्थानों और विश्वविद्यालयों में तालमेल रहता हैं वहां सैद्धान्तिक रिसर्च के साथ औद्योगिक रिसर्च भी होती है और उसके बदले विश्वविद्यालयों को इंडस्ट्री से आर्थिक अनुदान मिलता है। उच्चतम न्यायालय के दिशा-निर्देशों को यदि हमारी सरकारें मानती तो उनकी समझ में आ गया होता कि भाई भतीजावाद और आरक्षण की जमीन पर शोध में मौलिक चिन्तन पनप नहीं सकता।

यही कारण है कि आजाद भारत में शिक्षा पाया हुआ कोई व्यक्ति नोबल पुरस्कार प्राप्त नहीं कर सका। रवीन्द्र नाथ टैगोर और सीवी रमन की शिक्षा आजादी के पहले हुई थी और डा. हरगोविन्द खुराना, चन्द्रशेखर तथा अमर्त्यसेन को विदेशों में की गई रिसर्च पर पुरस्कार मिला। इसके विपरीत अमेरिका से 309, इंग्लैंड से 114, जर्मनी से 101, फ्रांस से 57, हंगरी से 10 और   ऑस्ट्रिया जैसे छोटे देश से 19 नोबल पुरस्कार विजेता निकले हैं। यह उच्च शिक्षा की गुणवत्ता का द्योतक है।

उच्च शिक्षा का दरवाजा सभी के लिए समान रूप से खुला रहना चाहिए लेकिन बड़े शिक्षा संस्थानों में प्रवेश के लिए जो लोग जाते हैं वे विभिन्न प्रदेशों से अलग-अलग शिक्षा व्यवस्था से निकले छात्र होते हैं। उनकी पृष्ठभूमि एक समान नहीं होती, ऐसे में उचित होता कि एक सम्मिलित प्रवेश परीक्षा होती जिसमें पिछड़े क्षेत्रों से आए छात्रों को भी अपनी किस्मत आजमाने का मौका मिलता। उच्च शिक्षा पर दबाव घट सकता है यदि इन्टरमीडिएट के बाद छात्र-छात्राओं को स्किल विकास का अवसर मिले और नौकरियों के लिए डिग्री की अनिवार्यता समाप्त कर दी जाए जैसा लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने अनेक बार कहा था और यदि बौद्धिक क्षमता को नम्बरों के तराजू पर न तौलकर उनके बौद्धिक विकास को आंका जाए तो शायद गाँव के नौजवानों को भी उनका हक मिल सके। उच्च शिक्षा के लिए गहन चिन्तन की जरूरत है जो नहीं हो रही है। 

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