विश्वविद्यालयों में शिक्षक ही नहीं, छात्र कैसे पढ़ें खेती?

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लखनऊ। आज़ाद भारत के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ है कि चार कृषि विश्वविद्यालयों की मान्यता रद्द की गई हो। वो भी इसलिए क्योंकि इन विश्वविद्यालयों ने शिक्षकों की भर्ती की शर्तें पूरी नहीं कीं। 

कार्रवाई महाराष्ट्र में हुई है लेकिन इसके साथ ही सभी राज्यों में संचालित कृषि विश्वविद्यालयों में खतरे की घंटी बज गई है, क्योंकि देश भर के कई कॉलेजों में शर्तों को ताक पर रखा गया है। 

विश्वविद्यालयों द्वारा आधारभूत शर्तें पूरी ना करना भी एक कारण है जिसके चलते युवा कृषि शिक्षा में दाखिला नहीं लेते। ऐसे देश मे जहां लगभग 70 फीसदी जनसंख्या की आय का साधन कृषि हो, वहां युवाओं का खेती या उसकी पढ़ाई से दूर भागना चिंता का विषय है।

कृषि विश्वविद्यालयों को मान्यता देने वाले ‘राष्ट्रीय कृषि शिक्षा मान्यता बोर्ड’ (एनएईएबी) ने एक ऑर्डर पारित करके महाराष्ट्र के चार विश्वविद्यालयों (महात्मा फुले कृषि विद्यापीठ (राहौरी), डॉ पंजाब राओ देशमुख कृषि विद्यापीठ (अकोला),  वसंत राओ  नाइक मराठवाड़ कृष विद्यापीठ और डॉ बाला साहब सावंत कृषि विश्वविद्यालय) की मान्यता अस्थाई तौर पर रद्द कर दी। मान्यता की शर्तें पूरी होने पर ही रोक हटाई जाएगी।

“इन विश्वविद्यालयों में लगभग 1,000 से ज्यादा शिक्षकों के पद खाली पड़े थे, जिन्हें पिछले कई सालों से नहीं भरा गया था। आईसीएआर की ये सख्ती देश के बाकी कृषि विश्वविद्यालयों को शर्तें मानने के लिए मजबूर करेगी,” डॉ सहदेव सिंह, मुख्य नीति सलाहकार, ‘ऑल इंडिया एग्रीकल्चर स्टूडेंट्स एसोसिएशन’ ने बताया।

देशभर में केंद्रीय, डीम्ड और राज्य के कृष विश्वविद्यालयों को मिलाकर 71 कृषि विश्वविद्यालय हैं (देशभर की कुल 722 विश्वविद्यालयों में से)। एसोसिएशन के मुताबिक इन कृषि विश्वविद्यालयों में विभिन्न विषयों के 25,000 असिस्टेंट प्रोफेसरों तक के पद खाली पड़े हैं, जिन्हें एक दशक से ज्यादा समय हो गया है। कार्रवाई के मामले में अगला नंबर राजस्थान और अन्य बड़े राज्यों के विश्वविद्यालयों का हो सकता है। डॉ सिंह ने जानकारी दी कि राजस्थान में पहले तो आठ कृषि विश्वविद्यालयों को घटाकर उनकी संख्या पांच कर दी गई, उसके बाद भी पिछले सात-आठ सालों से प्रदेश में लगभग 1,000 शिक्षकों के पद खाली पड़े हैं। शिक्षकों  की भर्ती इतने सालों तक न हो पाने के पीछे केंद्र और राज्य के बीच का बजट बंटवारे को लेकर होने वाला विवाद भी है। राज्य भर्ती करने के लिए शिक्षकों के वेतन की मांग केंद्र से करते रहे हैं।

जानकारी के मुताबिक केंद्रीय मानव संसाधन मंत्रालय राज्य के तहत आने वाले विश्वविद्यालयों को वेतन का पैसा नहीं देता, केवल शोध का बजट जारी करता है। केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय के अनुसार देशभर में प्रतिवर्ष उच्च शिक्षा में दाखिला लेने वाले औसतन दो करोड़ 30 लाख बच्चों में से महज़  0.55 प्रतिशत यानि एक लाख 26 हज़ार छात्र ही कृषि में दाखिला लेते हैं।  कृषि में दाखिला लेने वाले बच्चों में से औसतन एक प्रतिशत यानि 1,265 छात्र ही परा-स्नातक में दाखिला लेते हैं। पीएचडी करने वाले छात्रों की औसतन संख्या तो और भी कम है।

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